Election 2024: नाम 'बांग्ला', भाषा 'ध्रुपदी' और 'हिंदुत्व', BJP को इस बार उसी के एजेंडे से मात देंगी ममता?

West Bengal Lok Sabha Election 2024: तृणमूल सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बार चुनाव से पहले ऐसे एजेंडे हाथ में लिए हैं, जो बीजेपी की विचारधारा से मेल खाते हैं। हालांकि, टीएमसी की मुखिया इसकी वजहें अलग तरह से पेश करने की कोशिश कर रही हैं।

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने पीएम मोदी से पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'बांग्ला' करने का अनुरोध किया है। इसके साथ ही उन्होंने बंगाली को शास्त्रीय (ध्रुपदी) भाषा के रूप में मान्यता देने की भी मांग की है।

mamata banerjee and bengal

पश्चिम बंगाल का नाम 'बांग्ला' करने की मांग
बनर्जी ने कहा है कि 'हमने विधानसभा से दो बार 'बांग्ला' नाम पारित किया है, लेकिन कई बार लिखने के बाद भी केंद्र सुन नहीं रहा है। अगर उड़ीसा और बॉम्बे का नाम बदला जा सकता है तो बंगाल का क्यों नहीं?'

नाम की वजह से बैठकों में करना होता है इंतजार- ममता बनर्जी
इसकी वजह बताते हुए सीएम ने कहा है, 'जब हम किसी बैठक में जाते हैं तो वर्णमाला की वजहों से वेस्ट बंगाल (पश्चिम बंगाल) को अंत तक इंतजार करना होता है। हमने कई बार (नाम बदलने के लिए) अपना अनुरोध भेजा है।'

बंगाली को शास्त्रीय 'ध्रुपदी' भाषा के रूप में मान्यता देने की मांग
तृणमूल कांग्रेस सरकार बंगाल गौरव वाले विषयों पर अचानक इस कदर मुखर नजर आ रही है। उन्होंने बंगाली भाषा को लेकर भी गंभीरता से मोर्चा खोल दिया है। यह बंगाली को शास्त्रीय 'ध्रुपदी' भाषा के तौर पर राष्ट्रीय मान्यता देने की मुहिम शुरू कर रही है।

ध्रुपदी बंगाली भाषा का 2,500 वर्षों का समृद्ध इतिहास है- मुख्यमंत्री
अपनी चिट्ठी में ममता ने लिखा है, 'मैं आपके सामने हमारी ओर से किए गए एक शोध का सारांश 4 वॉल्यूम में प्रस्तुत करती हूं, जो 'बांग्ला'/बंगाली भाषा की उत्पत्ति तीसरी-चौथी ईसा पूर्व बताता है। यह बताता है कि हमारी भाषा एक शास्त्रीय भाषा है और हम इसकी मान्यता चाहते हैं।'

उन्होंने कहा है, 'रिसर्च से पता चलता है कि ध्रुपदी बंगाली भाषा का 2,500 वर्षों का समृद्ध इतिहास है। हम केंद्रीय गृह मंत्रालय को शोध दस्तावेज का 4 वॉल्यूम भेज रहे हैं। बंगाल की शास्त्रीय (ध्रुपदी) भाषा को मान्यता मिलनी चाहिए।'

उनकी शिकायत है कि 'अन्य शास्त्रीय भाषाओं को मान्यता दिए जाने के बावजूद, बंगाली ध्रुपदी भाषा को अभी तक राष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है।' उनका कहना है कि केंद्र से मान्यता मिलने के बाद बंगाल सरकार इसके लिए एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करेगी।

गंगा सागर मेले को भी राष्ट्रीय मेला घोषित करने की मांग
लेकिन, ममता सिर्फ बांग्ला और बंगाली गौरव की ही बात नहीं कर रही हैं। उन्होंने केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को उसी की सियासी पिच पर चुनौती देने के लिए भी खुलेआम बैटिंग शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से चिट्ठी में विश्व प्रसिद्ध गंगा सागर मेले को भी राष्ट्रीय मेला घोषित करने मांग की है। हर साल खासकर संक्रांति के मौके पर देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए गंगा सागर में डुबकी लगाने पहुंचते हैं।

कुंभ मेले जैसा दर्जा चाहती हैं ममता
बनर्जी ने अपनी चिट्ठी में प्रश्न उठाया है कि 'हमने गंगा सागर मेले के लिए 250 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इस साल लगभग एक करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। बंगाल को कुंभ मेले की तरह सहायता और राष्ट्रीय दर्जा क्यों नहीं मिलता।'

र्म स्थलों के विकास में जुटने का टीएमसी सरकार का दावा
बनर्जी ने यह भी बताने की कोशिश की है कि उनकी सरकार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर काम कर रही है, धार्मिक सर्किट विकसित करने की योजना तैयार कर रही है।

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए धर्म आधारित सर्किट विकसित करने पर जोर
उन्होंने कहा है, 'हम काली घाट मंदिर के पुनरुद्धार पर 165 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं और 25 करोड़ रुपए रिलांयस की ओर से दिए गए हैं। अप्रैल तक हम मंदिर के नवीनीकरण को पूरा करना चाह रहे हैं।'

यही नहीं उन्होंने बताया है कि वे लोग दीघा में भी जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कर रही हैं। जबकि बीरभूम स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ तारापीठ मंदिर का पुनरुद्धार का काम पूरा किया जा चुका है। नादिया जिले में इस्कॉन मंदिर के निर्माण के लिए राज्य सरकार की ओर से 700 एकड़ जमीन दी गई है।

बीजेपी के हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर चोट करना चाहती हैं ममता?
बंगाल में लोकसभा चुनावों से ठीक पहले ममता की अगुवाई वाली टीएमसी सरकार बदली-बदली नजर आ रही है। हाल के दिनों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बार-बार बंगाल जाकर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) लागू करने की बात कर चुके हैं।

कहा जा रहा है कि इसपर चुनावों की घोषणा पहले ही अमल शुरू हो सकता है। ममता इस कानून की मुखर विरोधी रही हैं। वहीं बीजेपी हमेशा ममता बनर्जी पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती आई है। ऐसे में लग रहा है कि टीएमसी सुप्रीमो भाजपा के हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाले कार्ड की धार बंगाल में कुंद करने में जुट गई हैं।

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