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Lok Sabha Election 2024: क्या हैदराबाद में कांग्रेस-AIMIM की 'दोस्ती' के इजहार से डरती हैं दोनों पार्टियां?

Telangana Lok Sabha Election 2024 Hyderabad: तेलंगाना में कांग्रेस और एआईएमआईएम एक-दूसरे में नजदीकी बढ़ने की बातों को सिरे से खारिज कर रही हैं। जबकि, मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से लेकर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी तक आपसी तालमेल की जरूरत का साफ संकेत दे चुके हैं। सवाल है कि अगर दोनों दलों में दोस्ती हो चुकी है, तो इसे स्वीकार करने में दिक्कत क्या है।

तेलंगाना कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जी निरंजन ने दावा किया है कि उनकी पार्टी हैदराबाद लोकसभा सीट पर इस बार भी काफी गंभीरता से लड़ रही है। उनके मुताबिक, 'तेलंगाना के लोग जानते हैं कि एआईएमआईएम ने देश में पिछले 10 वर्षों में किस तरह से बीजेपी की बी-टीम की तरह काम किया है।'

congress aimim hyderabad

ओवैसी से तालमेल की अटकलों का दोष भी बीजेपी पर लगा रही है कांग्रेस
उन्होंने कांग्रेस और एमआईएम के बीच चुनावी तालमेल की अटकलों का दोष भी भाजपा पर मढ़ने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, 'पीएम मोदी ने बीजेपी उम्मीदवार माधवी लता की तारीफ में जो ट्वीट किया, उसका भी लक्ष्य मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए था, जिससे हैदराबाद लोकसभा सीट पर एआईएमआईएम को मजबूती मिल जाए।'

राज्य की सभी 17 सीटों पर गंभीरता से लड़ने के दावे के साथ, उनकी यह भी दलील है कि आर्थिक रूप से कमजोर मुसलमानों के 4% आरक्षण खत्म करने का भाजपा का प्रस्ताव भी ओवैसी की पार्टी की मदद के लिए है। निरंजन का आरोप है कि 'पीएम मोदी एआईएमआईएम के खिलाफ अल्पसंख्यकों में बढ़ते असंतोष को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।'

कांग्रेस नेता ही कह चुके हैं एआईएमआईएम से दोस्ती की बात
जबकि, तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस के महासचिव मोहम्मद फिरोज खान ये टिप्पणी कर चुके हैं कि 'कांग्रेस और एआईएमआईएम की दोस्ती हो गई...'। यही नहीं हैदराबाद सीट पर ओवैसी के खिलाफ खुद उतरने को लेकर उन्होंने कहा था, 'मैं, नहीं...एआईएमआईएम और कांग्रेस पार्टी के बीच समझौता हो गया है, इसलिए मैं रेस में नहीं हूं...'

इसी की वजह से अटकलें हैं कि हैदराबाद सीट पर कांग्रेस किसी डमी उम्मीदवार को उतार सकती है। राज्य में लोकसभा की 17 सीटें हैं और यहां कांग्रेस की ओर से सीटें जीतने के लक्ष्य में लगातार तब्दीली देखी गई है, लेकिन इसने कभी भी सारी सीटें जीतने का दावा नहीं किया है। कई जानकार मानते हैं कि जिन सीटों पर खुद कांग्रेस अपनी जीत की उम्मीद नहीं रखती, उनमें हैदराबाद भी शामिल है।

माधवी लता की उम्मीदवारी के चलते ओवैसी के लिए सबसे कठिन चुनाव
तथ्य यह है कि इस बार भाजपा ने हैदराबाद में स्थानीय तेज-तर्रार महिला उम्मीदवार माधवी लता को उतारकर चुनाव को काफी दिलचस्प बना दिया है। उनकी पैठ पुराने हैदराबाद के मुस्लिम बहुल मतदाताओं, खासकर महिलाओं वोटरों के बीच भी है। तभी से इस तरह की रिपोर्ट आ रही है कि यह चुनाव ओवैसी के लिए सबसे मुश्किल चुनाव साबित होने जा रहा है।

प्रदेश में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं-ओवैसी
लेकिन, कांग्रेस की तरह ही ओवैसी भी उसके साथ किसी तरह के तालमेल की बातों को सिरे से नकार रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस नेता फिरोज खान की टिप्पणी पर कहा है, 'कई बार वो (कांग्रेस) हमें बीजेपी की बी-टीम या ए-टीम कहती है। ऐसा लगता है कि वे कंफ्यूजन के शिकार हैं। लेकिन, हम स्पष्ट हैं। प्रदेश में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं है।'

कांग्रेस-ओवैसी एक-दूसरे की कर चुके हैं तारीफ
लेकिन, तथ्य यह है कि तेलंगाना विधानसभा चुनावों के बाद ओवैसी और उनके भाई मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के बेहद करीब दिखाई पड़े हैं। दोनों ओर से एक-दूसरे की शान में कसीदे पढ़े गए हैं। एक तरफ सीएम कह चुके हैं कि ओवैसी के समर्थन के बिना हैदराबाद का विकास मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ ओवैसी कहते हैं कि कांग्रेस के चलते प्रदेश में गंगा-जमुनी परंपरा को बल मिलेगा।

कांग्रेस को तेलंगाना की अन्य सीटों पर मिल सकती है मदद
जब तेलंगाना में बीआरएस सत्ता में थी तो ओवैसी की पार्टी के साथ उसके नेता के चंद्रशेखर राव का बहुत ही नजदीकी वाला राजनीतिक रिश्ता था। सरकार बदलते ही यह व्यवस्था कांग्रेस और एमआईएम के बीच नजर आई है। जहां तक ओवैसी की पार्टी की बात है तो उसका मुख्य फोकस हैदराबाद सीट है। जबकि, उनके अघोषित सहयोग से कांग्रेस को राज्य की अन्य सीटों पर मदद मिल सकती है।

'दोस्ती' के इजहार से डरती हैं दोनों पार्टियां?
लेकिन, अगर यह दोस्ती औपचारिक तौर पर घोषित हो गई तो तेलंगाना के बाहर कांग्रेस को यह सियासी तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है और ओवैसी के राष्ट्रीय मंसूबे को भी धक्का लग सकता है। शायद यही वजह है कि ये दोनों ही दल अपनी 'नजदीकियों' को कोई नाम देने से परहेज कर रहे हैं!

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