Lok Sabha Election 2024: दक्षिण भारत में बीजेपी से मजबूत है कांग्रेस, यह धारणा है या सच्चाई?
Lok Sabha Election Latest News: दक्षिण भारत आज भी कांग्रेस का गढ़ है और बीजेपी को वहां अभी भी संघर्ष ही करना पड़ रहा है, यह एक आम धारणा है। कांग्रेस ने पिछले साल कर्नाटक और तेलंगाना में जिस तरीके से शानदार जीत दर्ज की है, उससे यह धारणा और मजबूत हुई है।
यह भी सही है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों से मोदी लहर में जहां उत्तर भारत में कांग्रेस का लगभग सफाया हुआ है, वहां दक्षिण भारत ने ही अलग-अलग राज्यों के माध्यम से उसे विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी बने रहने का मौका दिया है।

दक्षिण में भी कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीती थी बीजेपी
लेकिन, अगर 2019 के चुनाव परिणामों पर गौर करेंगे तो हमें इस बनी-बनाई धारणा पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। हम दक्षिण भारत के पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश (केरल,तमिलनाडु,तेलंगाना,कर्नाटक और पुडुचेरी) के परिणाम देखते हैं, जहां लोकसभा की कुल 130 सीटें हैं। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी दोनों एक भी सीट नहीं जीती थी।
इनमें से पिछले चुनाव में कांग्रेस को कुल 28 सीटें मिली थीं, जिसके दम पर लोकसभा में पार्टी के कुल 52 सांसद पहुंच पाए थे। इनमें सबसे बड़ा रोल केरल (20) का रहा था, जहां से कांग्रेस को 15 सीटें मिलीं थीं। इसके बाद तमिलनाडु (39) में वह 8, तेलंगाना(17) में 3, कर्नाटक (28) में 1 और पुडुचेरी (1) में भी 1 सीट जीती थी।
लेकिन, तथ्य यह है कि पिछली बार भी सीटों के मामले में दक्षिण भारत में बीजेपी कांग्रेस से आगे रही थी और उसे कुल 29 सीटें मिली थी। इसमें सबसे बड़ा योगदान कर्नाटक का था, जहां भाजपा 25 सीटें जीत गई और तेलंगाना से भी उसके 4 सांसद निर्वाचित हुए थे।
कांग्रेस की तेलंगाना और कर्नाटक में बढ़ी है उम्मीद
बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीदें कर्नाटक और तेलंगाना से है, जहां पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनावों में बहुत ही शानदार प्रदर्शन करके दिखाया है।
कर्नाटक में बदल चुका है सियासी सीन
कर्नाटक की बात करें तो विधानसभा में कांग्रेस को करीब 43% वोट मिले थे। वहीं बीजेपी को 36% और जेडीएस को 13% से कुछ ज्यादा वोट आए थे। आज की तारीख में बीजेपी और जेडीएस हाथ मिला चुकी हैं। मतलब यहां पिछले कुछ चुनावों से जो त्रिकोणीय मुकाबले की परंपरा बनी थी, वह अब कांग्रेस और बीजेपी गठबंधन के बीच सीधा होने वाला है।
बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद एक तरह से सबकुछ येदियुरप्पा एंड कंपनी के भरोसे छोड़ दिया है। यानी कांग्रेस को आने वाले चुनावों में लिंगायत (येदियुरप्पा) और वोक्कालिगा (जेडीएस का देवगौड़ा परिवार) समुदाय की जुगलबंदी का मुकाबला करना होगा और सत्ताधारी दल होने की चुनौती भी उसके सामने होगी।
ऊपर से चुनाव देश के लिए हो रहा है तो बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही चेहरा भी बनाएगी। मतलब, पिछली बार के नतीजे पलट देना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
तमिलनाडु में बड़ा हो सकता है एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके गठबंधन का हिस्सा है। पिछले दो चुनावों (लोकसभा और विधानसभा) से यह गठबंधन जीत रहा है। विपक्षी एआईएडीएमके के पास किसी स्टार चेहरे की कमी तो जरूर है, लेकिन एंटी-इंकंबेंसी की वजह से सत्ता परिवर्तन इस दक्षिणी राज्य की परंपरा रही है।
ऊपर से एआईएडीएमके आज औपचारिक तौर पर बीजेपी से दूर हो चुकी है। ऐसे में 13% अल्पसंख्यक वोट बहुत मायने रखने वाला है, जो बीजेपी की वजह से ही इससे छिटक गया था।
वहीं पीएम मोदी तमिलनाडु और उत्तर भारत के बीच भावनात्मक और सांस्कृतिक लिंक जोड़ने के निजी पहल में भी जुटे हुए हैं। काशी तमिल संगम इसका बेहतरीन उदाहरण है। कांग्रेस को यहां पिछली बार जैसा प्रदर्शन करने की चुनौती होगी, तो बीजेपी की एक भी सीट पर जीत उसके आंकड़े को मजबूत ही करेगी।
कहा तो यहां तक जा रहा है कि अगर पीएम मोदी ने अगर दक्षिण में पार्टी के विस्तार के लिए दूसरे सीट से भी चुनाव लड़ने का दांव खेला तो वह सीट तमिलनाडु में ही हो सकती है।
कांग्रेस को केरल में पिछला प्रदर्शन बरकरार रखने की चुनौती
कांग्रेस के लिए दक्षिण भारत का तीसरा प्रमुख राज्य केरल है। बीजेपी यहां आजतक 'कमल' नहीं खिला सकी है। कांग्रेस का यहां सारा दारोमदार 44% से ज्यादा मुस्लिम-ईसाई वोट बैंक पर है।
लेकिन, 2021 में जिस तरह से एलडीएफ ने यहां कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ की हवा खराब कर दी थी, उसके बाद कांग्रेस के लिए उसी तरह के प्रदर्शन की चुनौती बढ़ गई है। हालांकि, यूडीएफ सरकार कई तरह के विवादों में घिरी है, लेकिन वह मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।
राम लला के प्राण-प्रतिष्ठा के लिए अयोध्या जाने पर फैसले में कांग्रेस नेताओं की ओर से जो देरी हो रही है, उसके पीछे भी केरल का चुनावी समीकरण बहुत बड़ी वजह है।
उधर बीजेपी ने जिस तरह से यहां हिंदुओं के साथ-साथ ईसाई वोट बैंक में सेंध लगाने की पहल की है, वह जमीनी समीकरण को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा कर रहा है। अगर बीजेपी का कार्ड चल गया तो मुश्किल कांग्रेस की ज्यादा बढ़ सकती है।
तेलंगाना से कांग्रेस को है ज्यादा उम्मीद
तेलंगाना अभी कांग्रेस के लिए अच्छी खबर जरूर है। लेकिन, यह भी तथ्य है कि बीजेपी का ग्राफ भी यहां लगातार बढ़ा है। पार्टी यहां आक्रमक चुनाव लड़ने की तैयारी में है, इसका संकेत वह गोशामहल के एमएलए टी राजा सिंह को हैदराबाद का चुनाव प्रभारी बनाकर दे चुकी है। जबकि, सत्ता से बेदखल हुई केसीआर की बीआरएस के पहले निशाने पर भी कांग्रेस है।
आंध्र प्रदेश में पूरा जोर लगा रही है कांग्रेस
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने वाईएस शर्मिला को शामिल कराकर चुनाव से पहले एक बड़ा दांव जरूर चला है। यहां फिलहाल बीजेपी कोई खास भूमिका में तो नजर नहीं आती, लेकिन चुनाव से पहले अगर टीडीपी से तालमेल हो गया तो यह भी रेस में जरूर आ सकती है।
हाल के दिनों में कांग्रेस और उसकी सहयोगी डीएमके नेताओं की ओर से कुछ ऐसे बयान दिए गए हैं, जिसको लेकर आरोप लगे हैं कि यह उत्तर-दक्षिण में टकराव पैदा करने की कोशिश है। कहीं न कहीं इन विवादों में दक्षिण भारत में भाजपा के संभावित विस्तार को रोकने की कोशिश ही नजर आती है।
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