चुनावी किस्सा: जब संजय गांधी की अटलजी ने की थी भरी संसद में तारीफ, चुनाव के बाद सत्ता वापसी का भी दिया श्रेय
Lok Sabha Election Chunavi Kisse: लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर इन दिनों देश का सियासी पारा हाई है। नेताओं में वार-पलटवार का दौर जारी है। एक तरफ जहां कांग्रेस सरकार में आने के बाद गरीबी को एक झटके में मिटाने का दावा कर रही है तो दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि 50 सालों से क्या किया था।
राजनीति में शब्दों के तीर एक दूसरे पर चलाना आम बात है, हां शायद ऐसा कम ही मौको पर देखा गया है, जब कोई किसी नेता पर जमकर हमला बोले, लेकिन दूसरी तरफ से सिर्फ और सिर्फ तारीफ मिले। ऐसा ही कुछ हुआ था साल 1980 के लोकसभा चुनाव के बाद संसद के सत्र के दौरान।

चुनावी किस्सों में बात होगी, संसद में संजय गांधी के ताबड़तोड़ हमलों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के जवाबों की, जिसमें उनका अंदाज पलटवार नहीं बल्कि संजय गांधी की तारीफ करना था। क्या था पूरा घटनाक्रम आइए बताते हैं।
1977 के बाद कांग्रेस की वापसी
1977 में हार का मुंह देखने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर सत्ता में जोरदार वापसी की। साल 1975 में लगे आपातकाल के कारण कांग्रेस का राजनीतिक रूप से माहौल उसके खिलाफ था, जिसके बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा था और जनता पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाई थी।
लेकिन इसके बाद साल 1980 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए बड़ी खुशियां लेकर आया था। क्योंकि पार्टी इस लोकसभा चुनाव में एक बार फिर सत्ता में लौटी। 1980 के चुनाव जीतने के बाद एक बार फिर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं और कांग्रेस में जोश की लहर थी।
अब जिस किस्से की चर्चा होने जा रही है, उसका जिक्र कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने अपनी ऑटोबायोग्राफी Azaad an autobiography में साझा किया।
गुलाम नबी आजाद ने बताया वो किस्सा
आजाद ने अपनी किताब में बताया कि उनको इस बात की सबसे ज्यादा खुशी थी कि 1980 के चुनावों में जनता ने इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर थोपी गई निगेटिव इमेज को नकार कर रख दिया था। दोनों नेता रायबरेली और अमेठी से चुनाव जीते। इसी के साथ चुनाव में 30-40 युवा कांग्रेस के नेता भी लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे।
आजाद ने अपनी बुक में बताया कि जनवरी 1980 में आम चुनावों के बाद उसी साल संसद का सत्र फरवरी के आखिरी दिनों में बुलाया गया था। सत्र राष्ट्रपति के अभिभाषण के साथ शुरू हुआ था और इसके बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस होनी थी, जिसमें सत्ता और विपक्ष के नेताओं को अपनी बात सदन में रखनी थी।
आजाद अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं कि लोकसभा हॉल में स्पीकर के दाईं तरफ प्रधानमंत्री, मंत्री और सत्तारूढ दल के सांसदों के बैठने की जगह थी। तो बाईं तरफ विपक्ष के सदस्य थे। जिनमें जनता पार्टी की सरकार में मंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे।
संजय गांधी को रखनी थी सदन में अपनी बात
गुलाम नबी आजाद ने बताया कि उस दौरान कांग्रेस पार्टी की बैठक में यह निर्णय किया गया था कि संजय गांधी अटल बिहारी वाजपेयी से पहले सदन में अपनी बात रखेंगे। हालांकि संजय गांधी ऐसे नेता थे, जो अपनी चुनावी सभाओं में भी 5 मिनट से ज्यादा नहीं बोलते थे। और उनका भी अनुमान था कि सदन में भी वो अपनी बात रखने के लिए इतना ही वक्त लेंगे।
लेकिन हुआ कुछ उससे उलट संजय गांधी ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलना शुरू किया और अटल बिहारी वाजपेयी पर जबरदस्त हमला बोलते हुए ताबड़तोड़ हमले किए। संजय ने अपने संबोधन में बीजेपी और उसके नेताओं को कांग्रेस और इंदिरा गांधी की आलोचना का मुद्दा उठाते हुए जमकर घेरा।
संजय ने जमकर बोला था अटल जी पर हमला
अपनी बुक में आजाद ने बताया कि उन्होंने संजय गांधी के कुर्ते को खींच कर उन्हें अपना भाषण खत्म करने के लिए कहा था, लेकिन वो रुके नहीं और लगातार 15 मिनट से ज्यादा बोले। किताब में आजाद ने अपनी मंशा का जिक्र करते हुए बताया कि उनको डर था कि संजय गांधी के बाद वाजपेयी जैसे कुशल और प्रखर वक्ता बोलेंगे तो उनको अपने तरह से अलग अंदाज में जवाब मिलेगा।
लेकिन हुआ इससे बिल्कुल उलट। अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संजय गांधी के भाषण के बाद अपनी बात रखना शुरू की तो उन्होंने कहा कि वो पहली बार संसद पहुंचे संजय गांधी के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोलेंगे। वाजपेयी ने अपने भाषण के दौरान इंदिरा गांधी की तरफ देखा और कहा कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत संजय गांधी और उनकी टीम की वजह से मिली है। अगर संजय गांधी 1977 में कांग्रेस को मिली हार के लिए जिम्मेदार हैं तो उन्हें 1980 में पार्टी को मिली जीत का श्रेय दिया जाना चाहिए।
जुबानी तीरों का बदला तारीफ से दिया
भरी संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि संजय गांधी और युवा कांग्रेस की उनकी टीम ने पिछले कुछ सालों में विपक्ष से मुकाबला करते हुए बहादुरी से लड़ाई लड़ी है और वो अपने आप में एक नेता बनकर उभरे हैं। इसी के साथ आजाद ने अपनी बुक में कहा कि अपने भाषण में वाजपेयी ने संजय गांधी के नेतृत्व का भी जमकर समर्थन किया।
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