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Chunavi Kisse: मंसूर अली खान पटौदी को शर्मिला टैगोर और क्रिकेट का फेम नहीं आया काम, दो बार हारे थे चुनाव

Lok Sabha Chunavi Kisse: लोकसभा चुनाव 2024 में इस बार कई ऐसे दिग्गज हैं, जो पहली बार चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। एक्ट्रेस कंगना रनौत, पूर्व क्रिकेटर युसूफ पठान सहित भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह ने राजनीति में एंट्री मारी है। अब चुनाव नतीजे बताएंगे कि उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा? लेकिन एक ऐसे दिग्गज भी थे, जो सियासी पिच पर नहीं जम पाए और वो थे मंसूर अली खान पटौदी।

चुनावी किस्से में आज बात उसी दिग्गज क्रिकेटर की होगी, जिन्होंने महज 21 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी संभालकर उस वक्त के सबसे युवा कप्तान होने का रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन अपनी राजनीतिक पारी में कमाल नहीं कर पाए।

Mansoor Ali Khan Pataudi

दो बार लड़ा लोकसभा चुनाव

पहली बार मंसूर अली खान पटौदी, जिनको टाइगर पटौदी के नाम से भी पुकारा जाता था। उन्होंने क्रिकेट खेलते हुए सियासी पारी भी शुरू की। पटौदी ने दो बार अलग-अलग लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नसीब नहीं हासिल कर पाए।

यहां तक पटौती की पत्नी शर्मिला टैगोर का स्टारडम और कपिल देव जैसे नामचीन क्रिकेटरों का चुनाव प्रचार करना भी पटौदी के लिए कारगर साबित नहीं हुआ और वो संसद नहीं पहुंच पाए।

1971 में इस सीट पर मिली पहली बार

सबसे पहले उन्होंने 1971 में लोकसभा चुनाव लड़ा और सीट थी गुड़गांव। इसी वक्त उन्होंने अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से शादी की थी। टैगोर का गिनती सुपरहिट अभिनेत्रियों में होती थी। यहां तक की 1971 में शर्मिला टैगोर उनके लिए चुनाव प्रचार के लिए फरीदाबाद-गुरुग्राम में सड़कों पर उतरी थीं।

बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी ने अपना पहला चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री राव बीरेंद्र सिंह की पार्टी 'विशाल हरियाणा' के टिकट पर गुड़गांव सीट से लड़ा था। उस वक्त फरीदाबाद जिला गुरुग्राम का ही हिस्सा हुआ करता था। जहां पटौती के सामने कांग्रेस के टिकट पर तैयब हुसैन और निर्दलीय के. नरेंद्र थे।

नतीजों में तीसरे नंबर पर आए

बताया जाता है कि शर्मिला टैगोर के चुनाव प्रचार के दौरान जमकर भीड़ उमड़ी थी, लेकिन वो वोट में तब्दील नहीं हो पाई। नतीजों में पटौदी को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा और तैयब हुसैन ने जीत हासिल की, जबकि दूसरे नंबर पर निर्दलीय के.नरेंद्र आए। हालांकि इस चुनाव में हार के बाद फिर से टाइगर पटौदी ने क्रिकेट मैदान में वापसी की और फिर अगले चार साल तक और भारतीय टेस्ट टीम का प्रतिनिधित्व किया।

फिर एक बार आजमाया हाथ, लेकिन..

फिर पटौदी ने क्रिकेट से दूर होने के बाद साल 1991 में एक बार फिर नए सिरे से सियासी पारी का आगाज किया। इस बार उन्होंने हरियाणा छोड़कर मध्य प्रदेश को चुना और सीट थी भोपाल, जो कि उनकी जन्मभूमि थी। इस बार उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और मुकाबला भाजपा के सुशील चंद्र वर्मा के साथ था।

1991 के लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे देश में राम जन्मभूमि आंदोलन मुख्य केंद्र था। हालांकि टाइगर पटौदी के चुनाव प्रचार में राजीव गांधी, कपिल देव पहुंचे थे, लेकिन वो भी कुछ खास कमाल नहीं कर पाए और सुशील चंद्र वर्मा ने पटौदी को हरा दिया।

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