वरुण गांधी को किसकी 'कीमत' चुकानी पड़ी, पीलीभीत के सांसद की चिट्ठी के मायने क्या हैं?
Lok Sabha Election Pilibhit 2024: पीलीभीत लोकसभा सीट से इस बार टिकट कटने के बाद बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने गुरुवार को अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के नाम एक चिट्ठी लिखी है। सरसरी तौर पर यह चिट्ठी एक सांसद की ओर से क्षेत्र के लोगों को भावुक संदेश है। लेकिन, इसकी एक पंक्ति ऐसी है, जो बीजेपी के लिए एक 'चेतावनी' की तरह है।
वरुण गांधी ने अपनी चिट्ठी में ही बताया है कि पीलीभीत से उनका नाता 41 साल पुराना है। चार दशक से ज्यादा पुराना रिश्ता स्वभाविक तौर पर काफी मायने रखता है। वरुण की पूरी चिट्ठी में इस भाव की भरपूर झलक भी मिली है। लेकिन, अंतिम पंक्ति से एक लाइन पहले उन्होंने जो कुछ लिखा है, पहले उसके शब्दों पर गौर करना जरूरी है।

'भले ही उसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े'
उन्होंने लिखा है, 'मैं राजनीति में आम आदमी की आवाज उठाने आया था और आज आपसे यही आशीर्वाद मांगता हूं कि सदैव यह कार्य करता रहूं, भले ही उसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े।'
टिकट कटवाकर 'कीमत' चुकाई!
यहां वरुण जिस कीमत शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसका सीधा मतलब उनके टिकट कटने से निकलता है। दरअसल, वरुण के टिकट कटने को लेकर पहले से ही सियासी गलियारों में चर्चा हो रही थी। क्योंकि, पिछले कुछ वर्षों से वे लगातार अपनी पार्टी और अपनी सरकार की नीतियों के खिलाफ काफी आलोचनात्मक रुख अपनाते रहे हैं।
सीएम बनने की महत्वाकांक्षा से शुरू हुई खटपट!
भाजपा के शीर्ष नेताओं और वरुण की खटपट की शुरुआत शायद पहली बार तब हुई, जब उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने नेतृत्व को असहज कर दिया। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले प्रयागराज में बीजेपी की एक अहम बैठक से पहले उनके कुछ पोस्टर सामने आए थे। इन पोस्टरों में उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ दिखाया गया था।
माना गया कि वह खुद को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर रहे हैं। जबकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें कहा जा रहा था कि वे अपने तबके चुनाव क्षेत्र सुल्तानपुर तक ही सीमित रहें।
सहयोगी सांसदों की नजर में आए
लगभग उसी दौरान वरुण ने अपने क्षेत्र में सांसद फंड से गरीबों के लिए कुछ घरों का भी निर्माण करवाना शुरू किया। कुछ अपने पैसे भी लगाए। जब उन्होंने लोगों को घरों का आवंटन किया तो कथित तौर पर इस तरह की बातें कहीं, जिससे उनके सहयोगी सांसदों के लिए असहज स्थिति पैदा हुई। पार्टी को उनका यह रवैया पसंद नहीं आया।
कोविड के दौरान अपनी ही सरकार को घेरने लगे
इसके बाद 2021 में कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान जब यूपी में रात का कर्फ्यू लगाया गया तो उन्होंने एक तरह से अपनी ही सरकार के खिळाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने सवाल उठाया था कि रैलियों के लिए लाखों लोगों को जुटाने के बाद आम लोगों पर रोक लगाने का क्या मतलब है। इससे पार्टी की काफी फजीहत हुई।
किसान आंदोलन के दौरान भी हुए मुखर
इसी तरह किसान आंदोलन के दौरान लखीमपुर खीरी की वारदात को लेकर भी वे अपनी सरकार और अपनी पार्टी के लिए काफी आोचनात्मक हो गए थे। इसकी वजह से कई मौकों पर बीजेपी की किरकिरी भी हुई। इसी के बाद 2021 के अक्टूबर में उन्हें और उनकी सांसद मां मेनका गांधी को 80 सदस्यी बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया गया था।
योगी सरकार पर हुए थे हमलावर
वरुण गांधी का यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार पर सबसे गंभीर हमला पिछले साल दिसंबर में देखने को मिला था। जब अमेठी के संजय गांधी अस्पताल का रजिस्ट्रेशन निलंबित किया गया तो उन्होंने इसे 'एक नाम से द्वेष' बता दिया।
2019 में पार्टी ने दिया मौका, लेकिन 2024 में कट गया टिकट
2019 के चुनावों से पहले वरुण ने जो भी तेवर दिखाए थे, बावजूद इसके पार्टी ने उन्हें पिछले चुनाव में सीट बदलकर फिर से चुनाव मैदान में उतरने का मौका दिया था। लेकिन, 2024 में शायद पार्टी नेतृत्व ने तय किया कि बस 'अब और नहीं।'
पार्टी की नीतियों की आलोचना करते रहने का दिया है संकेत
वरुण गांधी ने फिलहाल पार्टी से दूरी बनाने जैसे कोई संकेत नहीं दिए हैं। लेकिन, उन्होंने अपनी चिट्ठी के माध्यम से यह भी बताने की कोशिश जरूर की है कि वह अपनी बात सार्वजनिक तौर पर रखते रहेंगे। इसलिए आने वाले समय उनकी वजह से पार्टी के सामने कैसी चुनौती खड़ी होती है, ये देखने वाली बात है।
जितिन प्रसाद ने उनके कार्यकाल को कहा 'शानदार'
हालांकि, टिकट काटे जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की ओर से उनके प्रति किसी तरह की कड़वाहट नहीं दिखाई जा रही है। वरुण की जगह पीलीभीत से बीजेपी के नए प्रत्याशी बने जितिन प्रसाद ने उनकी तारीफ करते हुए न सिर्फ उन्हें पार्टी का एक 'कद्दावर' नेता बताया है, बल्कि ये भी कहा है कि उनका कार्यकाल 'शानदार' रहा है।
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