Form 17C को लेकर क्या विवाद है, मतदान के आंकड़ों वाले फॉर्म को चुनाव आयोग सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहता?

Lok Sabha Election: इस बार के लोकसभा चुनावों में कई तरह के विवादों ने जन्म लिया है। उसी में से एक है फॉर्म 17सी का विवाद, जिसपर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। याचिकाकर्ता फॉर्म 17सी के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन आयोग इसके लिए तैयार नहीं है और 225 पेज का हलफनामा देकर इसका विरोध किया है।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि नियम फॉर्म 17सी के आंकड़े सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं देता। जबकि, याचिका में आयोग से यह आंकड़े मतदान खत्म होने के 48 घंटे के भीतर सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

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फॉर्म 17सी क्या है?
फॉर्म 17सी में प्रत्येक मतदान केंद्र में रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या और डाले गए मतों और उससे संबंधित अन्य आंकड़ों का पूरा रिकॉर्ड रहता है। इस फॉर्म की मूल कॉपी स्ट्रॉन्गरूम में सुरक्षित रखी जाती है और प्रत्येक प्रत्याशी के पोलिंग एजेंट को इसकी कॉपी दी जाती है।

फॉर्म 17सी से ही मतदान का प्रतिशत निकलता है। इस फॉर्म के दो भाग होते हैं, जिसमें पहले में वोटर टर्नआउट और दूसरे में चुनाव परिणाम दर्ज होता है।

फॉर्म 17सी क्यों जरूरी है?
कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 के अनुसार हर मतदान केंद्र पर मतदान अधिकारी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह वहां डाले गए वोट का पूरा रिकॉर्ड रखे। इससे ईवीएम में पड़े हर वोट का फिजिकल रिकॉर्ड भी रहता है।

प्रत्येक उम्मीदवार का पोलिंग एजेंट इसकी कॉपी की मांग कर सकता है। अगर, किसी तरह की धांधली की शिकायत आती है तो इसके आंकड़े से ईवीएम में पड़े वोटों को मिलाया जा सकता है। इससे धांधली की आशंका दूर हो सकती है।

फॉर्म 17सी को लेकर विवाद क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से एक याचिका डाली गई है और फॉर्म 17सी की स्कैन्ड कॉपी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड करने की मांग की गई है। क्योंकि, कुछ विपक्षी पार्टियों की ओर से मतदान प्रतिशत के आंकड़ों में हेरफेर के आरोप लगाए जा रहे हैं।

दरअसल, पहले चरण का चुनाव 19 अप्रैल को हुआ था और दूसरे चरण का 26 अप्रैल को। चुनाव आयोग ने पहले चरण के मतदान प्रतिशत का अपडेटेड डेटा 11 दिन बाद और दूसरे चरण का 4 दिन बाद जारी किया। इसके बाद यहां तक दावा किया गया कि आयोग के फाइनल डेटा में 5% तक का अंतर आ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
इस मामले में एडीआर की याचिका पर 17 मई को सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने चुनाव आयोग से पूछा कि फॉर्म 17सी का डेटा क्यों नहीं सार्वजनिक किया जा सकता? इस पर ईसी ने 225 पन्नों का हलफनामा दायर किया है, जिसपर शुक्रवार यानी 24 मई को सुनवाई होनी है।

फॉर्म 17सी को सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहता चुनाव आयोग?
चुनाव आयोग की ओर से याचिका का विरोध किया जा रहा है। चुनाव आयोग के मुताबिक फॉर्म 17सी को अपलोड करने से चुनावी मशीनरी में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा स्कैंड कॉपी की तस्वीरों से छेड़छाड़ हो सकती है और इससे आम जनता का भरोसा चुनाव प्रक्रिया से उठ सकता है।

चुनाव आयोग का कहना है कि इसकी कॉपी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट को तो दी जा सकती है, लेकिन इसे सार्वजनिक करना मुमकिन नहीं है। इसकी मूल कॉपी वैसे भी स्ट्रॉन्गरूम में रखी जाती है।

'आंकड़ों में धांधली के आरोप भ्रामक, झूठे और महज संदेह पर आधारित'
मतदान प्रतिशत के आंकड़ों में भारी अंतर के आरोपों को भी आयोग खारिज कर चुका है। इसका कहना है कि टर्नआउट से जुड़े आंकड़ों में धांधली के आरोप भ्रामक, झूठे और महज संदेह पर आधारित हैं। आयोग का कहना है कि डेटा को अंतिम रूप देने से पहले कई स्तर पर परखने की आवश्यकता रहती है और इसमें समय लगना स्वाभाविक है।

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