लिंगायत संतों के साथ क्या हो रहा है, कर्नाटक में इनके मठों का इतना राजनीतिक महत्त्व क्यों है ?
Lingayat Seer Karnataka: कर्नाटक की राजनीति और लिंगायत समुदाय दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए रहे हैं। भाजपा की राजनीति पर पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा का जो प्रभाव रहा है, उसके पीछे भी यही संप्रदाय है। हाल के महीनों में लिंगायत संप्रदाय के कई संत हमेशा गलत वजहों से चर्चा में आए हैं। लिंगायत समाज कर्नाटक की राजनीति में इतने अहम हो चुके हैं कि कांग्रेस हो या बीजेपी किसी के लिए भी इन्हें नजरअंदाज करना रानीतिक रूप से संभव नहीं है। जबकि, अगस्त से लेकर अब तक ही लिंगायत संतों के साथ जुड़े कम से कम चार ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनका संबंध किसी ना किसी महिला से जुडा है और फिर अप्रिय खबरें सुनने को मिली हैं।

लिंगायत संतों के साथ क्या हो रहा है
कर्नाटक में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लिंगायत मठ एक बार फिर गलत वजहों से सुर्खियों में है। इसबार रामनगर जिले के कंचुगल बंदे मठ के प्रमुख 45 वर्षीय बसावालिंगा स्वामी का शव कमरे में लटका मिला है। पुलिस के मुताबिक सुसाइड नोट से पता चला है कि उन्हें कुछ लोग उनकी एक महिला से बातचीत के ऑडियो को लेकर उन्हें ब्लैकमेल कर रहे थे। वे 1997 में 20 साल की उम्र में ही मठ प्रमुख बन गए थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इनकी मौत में एक नेता का भी नाम आ रहा है। पिछले महीने ही बेलगावी जिले में भी लिंगायत मठ के एक संत बसावा सिद्दालिंगा स्वामी का शव भी मठ में ही लटका मिला था। वे श्री गुरु मदीवालेश्वर मठ के संत थे। पुलिस सूत्रों ने तब उस घटना में भी दो महिलाओं से ऑडियो बातचीत की बात कही थी। उस घटना में मठ के अंदर यौन हमले का जिक्र आया था। ऑडियो में दो ऐसे संतों का भी नाम बताया गया था, जिनकी मौत हो चुकी है।

क्यों बदनाम हो रहे हैं लिंगायत मठ
सितंबर महीने की शुरुआत में ही कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के मुरुघा मठ के प्रमुख शिवमूर्ति मुरुघा शरणारू की बलात्कार के आरोपों में काफी विवाद के बाद गिरफ्तारी हुई थी। उनके खिलाफ आश्रम के होस्टल में रह रहीं दो नाबालिग लड़कियों ने रेप का मामला दर्ज करवाया था, जिसके बाद काफी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। 15 और 16 उम्र की दोनों बच्चियां इसी मठ की ओर से संचालित स्कूल में पढ़ती थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि लिंगायत संत उनका साढ़े तीन साल से यौन उत्पीड़न कर रहे थे। इस मठ का कर्नाटक की राजनीति में इतना प्रभाव है कि कोई आरोपी के खिलाफ मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। पॉक्सो ऐक्ट का मामला होने के बावजूद पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई करने में देर कर रही थी। यहां तक कि कुछ तो जांच से पहले ही क्लीनिट देने लगे थे। आखिरकार उन्हें कानून के शिकंजे में लाया गया था। एक शिकायत अक्टूबर महीने में कुछ दिनों पहले ही मैसूर के नजाराबाद पुलिस थाने में दर्ज कराई गई है, जिसमें लिंगायत संत पर चार नाबालिक लड़कियों से रेप का आरोप लगाया गया है। उनके खिलाफ भी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन अगेंस्ट सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) ऐक्ट के तहत मामला दर्ज करवाया गया है।

लिंगायत मठों का नेताओं पर प्रभाव
मुरुघा मठ के शिवमूर्ति मुरुघा शरणारू की गिरफ्तारी की मांग को लेकर जब पिछले अगस्त में प्रदर्शन हो रहे थे तो पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा खुलकर उनके बचाव में उतर आए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे शरणारू के बेहद करीबी रहे हैं। उन्होंने पुलिस जांच से पहले ही कह दिया था कि उन्हें 'गलत तरीके से फंसाया' गया है। बच्चियों से बलात्कार के जिस आरोपी के खिलाफ अगस्त महीने में पॉक्सो ऐक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था और सितंबर में गिरफ्तारी हुई, कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी उसी महीने की शुरुआत में उनके मुरुघा मठ में जाकर इष्ट 'लिंगदीक्षा' ली थी। कर्रनाटक में लिंगायत समाज का एक परिचय यह भी है कि प्रदेश के कई मुख्यमंत्री इसी समुदाय से जुड़े रहे हैं, जिसमें येदियुरप्पा के अलावा मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी शामिल हैं।

लिंगायत मठों का रानीति में दखल
कर्नाटक में लिंगायत समुदाय और उनके मठों का राजनीति में कितना दखल है, इसकी झलक तब भी देखने को मिली थी, जब बीएस येदियुरप्पा ने मौजूदा सरकार में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी थी। वे लिंगायतों के प्रभावशाली नेता हैं। समाज पर उनका इतना प्रभाव है कि इस संप्रदाय से जुड़े दूसरे दलों के नेता भी उनका समर्थन करते हैं। जब पिछले साल भाजपा में येदियुरप्पा को कुर्सी से किनारे करने की कवायद चल रही थी तो प्रदेश के लिंगायत मठों के सैकड़ों संत उसके पीछे लामबंद होने शुरू हो गए थे। आखिरकार इसी दबाव ने काम किया और दूसरे लिंगायत नेता बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद पर बिठाया गया।

कौन हैं लिंगायत
कर्नाटक में लिंगायत सबसे बड़ा समुदाय है, जिनकी आबादी 17-18 प्रतिशत बताई जाती है। ये मूल रूप से उत्तर कर्नाटक क्षेत्र में हैं और आमतौर पर भाजपा के समर्थक बताए जाते रहे हैं। इनके सबसे बड़े संत बसवेश्वर थे, जो बहुत ही श्रेष्ठ संघटनकर्ता और समाज सुधारक माने जाते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक समाज के संकल्प के साथ 'वीरशैव संप्रदाय' की स्थापना की थी, जो आगे चलकर लिंगायत कहलाया। आज की तारीख में इस हिंदू शैव संप्रदाय का प्रभाव प्रदेश की 224 विधानसभा सीटों में से 90 से लेकर 100 तक पर माना जाता है।

कर्नाटक में 500 से ज्यादा लिंगायत मठ हैं
कर्नाटक में लिंगायत समाज के 500 से ज्यादा मठ हैं। इनका एक संगठन ऑल इंडिया वीरशैव महासभा राज्य के 22 जिलों में बहुत ही प्रभावशाली भूमिका में है। उत्तर कर्नाटक इनका गढ़ माना जाता है। 1990 के दशक तक यह संप्रदाय मुख्य रूप से कांग्रेस समर्थक था। लेकिन, तत्कालीन कांग्रेस आलाकमान की ओर से पार्टी के लिंगायत नेताओं के साथ बर्ताव ने इस समुदाय को विकल्प के रूप में बीजेपी की ओर देखने को मजबूर किया और येदियुरप्पा जैसे नेताओं के प्रभावशाली बनने में भी इसने खास भूमिका निभाई है। (तस्वीरें- फाइल)












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