समलैंगिक लड़कियाँ, एक हिंदू और एक मुसलमान, कैसी रही प्यार की राह
इस समय सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के मामले पर सुनवाई चल रही है. लेकिन कुछ समलैंगिक जोड़ों ख़ासकर लड़कियों को कई मोर्चे पर परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं.
''वो हिंदू है और मैं मुसलमान, लेकिन इससे हम दोनों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. हम केवल ये जानते हैं कि हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं और साथ रहकर ज़िंदगी की हर जंग जीत लेंगे. एक-दूसरे का धर्म हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता.''
ये कहना है मालती और रुबीना का. (इन दोनों के नाम बदले हुए हैं और उनकी पहचान छिपाई गई है.)
पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव से मालती और रुबीना कोलकाता भाग कर आई हैं.
इन दोनों की कहानी स्कूल में शुरू हुई, जब मालती की नज़र रुबीना पर पड़ी.
ये दोनों 11वीं में एक साथ पढ़ती थीं और जब भी मालती ने रुबीना को देखा गुमसुम ही पाया.
मालती बताती हैं, ''मुझे हमेशा से लड़कियाँ पसंद आती थीं, लेकिन ये पता नहीं था कि मेरी चाहत लड़की के लिए ही है. रुबीना को मैंने ही अप्रोच किया. वो मुझे अच्छी लगती थी. हम दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा.''
वो कहती हैं, ''रुबीना चुप रहती थी, मैं उससे पूछती थी कि वो बात क्यों नहीं करती, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसने मुझसे खुलना शुरू किया.''
रुबीना बताती हैं कि इस बीच उनकी एक लड़के से दोस्ती हुई और उसने संबंध बनाने का दबाव डाला.
रुबीना ने मना कर दिया और वो दोस्ती टूट गई, लेकिन उनके परिवार को लड़के के साथ दोस्ती की भनक लग गई.
इसके बाद जैसे उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
रुबीना भरे हुए गले से कहती हैं, ''मुझे बहुत ताने दिए जाते थे, गाली दी जाती, पिटाई होती थी. मुझे खाना नहीं दिया जाता था. इसी दौरान मालती मेरे जीवन में आई. मेरे जीवन में पहली बार वो एक लड़की ऐसी थी, जो दिल से जानना चाहती थी कि मैं इतनी चुप और दुखी क्यों रहती हूँ और बस बातें शुरू हुई, दोस्ती हुई और फिर प्यार.''
23 साल की रुबीना बीए (हिस्ट्री ऑनर्स) और 22 साल की मालती बीए (बांग्ला) कर रही हैं.
मालती एनसीसी की कैडेट रह चुकी हैं और पुलिस में भर्ती होने के लिए तैयारी कर रही हैं, वहीं रुबीना टीचिंग में अपना करियर बनाने की कोशिश कर रही हैं.
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दोस्ती के बाद प्यार
मालती को रुबीना से पहली नज़र में ही प्यार हो गया था.
रुबीना ने धीरे-धीरे अपने दिल की गिरह को खोलना शुरू किया और अपनी पीड़ा को साझा किया.
वो मालती की इस बात पर कायल हो गई थी कि वो उसकी केयर करती हैं, दिल से उसके दुख को दूर करना चाहती हैं और धीरज के साथ उसकी हर बात सुनना चाहती हैं.
दोनों स्कूल में ख़ूब बातें करते, एक दूसरे के घर आना-जाना शुरू हुआ. मुलाक़ातों से फासले कम होने लगे और फिर दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई.
रुबीना बताती हैं, ''पहले मेरे परिवार को लगता था कि मालती मुझे किसी और लड़के से बात करवाने और मिलवाने में मदद कर रही है, लेकिन फिर उन्हें ये पता लगा कि मैं और मालती एक दूसरे के क़रीब हैं.''
''उन्हें ये आभास हो चला था कि हममें कुछ है और उसके बाद मेरे ख़िलाफ़ हिंसा का दौर शुरू हो गया. खाना नहीं दिया जाता था और शादी का दबाव डाला जाने लगा. हमारे समाज में वैसे भी लड़की के 21 साल के होने तक शादी कर दी जाती है.''
वो बताती हैं, ''मेरे पिता ने शादी का दबाव नहीं डाला, लेकिन वे पिटाई करते थे. मेरी माँ मुझे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हर तरह की यातना देती थीं. इतना ही नहीं मेरे नाना के परिवार से भी गालियाँ, हिंसा, ताने देने का सिलसिला चलता रहता था.''
रुबीना का कहना था, ''वो मुझसे पूछते थे कि दोनों के बीच क्या है. साथ ही ये कहते कि वो हम दोनों को साथ में रहने देंगे, लेकिन पहले हम उन्हें ये बताएँ कि हमारे बीच में क्या है. मुझे ये समझ में आ गया कि अगर मैंने खुलकर उन्हें कुछ बताया, तो मेरे अम्मी-अब्बा मुझे दूर भेज देंगे.''
इस बीच हमने सोशल मीडिया पर अपने जैसे लोगों की कहानियों को देखा और फ़ैसला लिया कि हम भी अपनी मर्ज़ी से जिएँगे, लेकिन गाँव में ऐसे रहना संभव नहीं था और गाँव में छिप-छिप कर जीने में ही ज़िंदगी बीत जाएगी.
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सुप्रीम कोर्ट में हो रही है सुनवाई
- साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था.
- समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.
- 18 अप्रैल को सुनवाई शुरू हुई थी.
- इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संवैधानिक बेंच कर रही है.
- केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिका का विरोध किया है.
- जजों के एक समूह ने भी विरोध किया, तो धार्मिक सगंठनों ने समलैंगिक विवाह को 'अप्राकृतिक' बताया था.
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो पर्सनल लॉ के क्षेत्र में जाए बिना देखेगा कि क्या विशेष विवाह क़ानून के ज़रिए समलैंगिकों को अधिकार दिए जा सकते हैं.
- वहीं कोर्ट में ये भी कहा गया कि अधिकारों, इससे जुड़ी जटिलताओं और सामाजिक असर को देखते हुए इस मामले को तय करने का फ़ैसला संसद पर छोड़ दिया जाना चाहिए.
- तीन मई को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि LGBTQIA+ जोड़ों को होने वाली दिक़्क़तों के विषय पर कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की जाएगी
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घर से भागने की योजना
अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हुए मालती बताती हैं कि उन्होंने गाँव से शहर भागने का फ़ैसला किया और सभी दस्तावेज़ों को इकट्ठा करना शुरू किया, क्योंकि उन्हें पता था कि नौकरी के लिए सर्टिफ़िकेट और दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ेगी.
मालती बताती हैं, ''हमने साल 2021 में स्कॉलरशिप का पैसा इकट्ठा शुरू करना किया और वहाँ एक ट्रांसमेन से मदद मांगी. इसके बाद इस व्यक्ति ने हमारा संपर्क सेफो फ़ॉर इक्वॉलिटी नाम की संस्था से कराया, जहाँ हमें मदद का अश्वासन मिला और इस तरह से हमारा कोलकाता आने का रास्ता साफ़ हुआ.''
सेफ़ो फ़ॉर इक्वॉलिटी नाम की संस्था LGBTQI+ समुदाय के अधिकारों के लिए काम करती है.
अब मालती और रुबीना इस संस्था की पनाह में हैं और अपना भविष्य सँवारने की दिशा में काम कर रही हैं.
घर की याद
ये पूछने पर कि क्या घर की याद नहीं आती? क्या माता-पिता की फ़िक्र नहीं होती?
मालती बताती हैं कि वो अपने परिवार वालों से संपर्क में हैं और उनके गाँव से भागने के बाद रुबीना के परिवार के सदस्य उनके घर भी आए थे.
मालती रुआंसी आवाज़ में कहती हैं, ''मेरी माँ शायद रिश्ते को लेकर राज़ी भी हो जाए, लेकिन मेरे परिवार के अन्य सदस्य मेरी माँ को परेशान कर देंगे. मेरी माँ ने मुझे कहा है कि वापस तभी लौटना, जब रुबीना के परिवारवाले रज़ामंदी जता दें, नहीं तो ऐसे आरोप लगेंगे कि मैं रुबीना को भगा लाई और ये दो समुदायों के बीच का मामला बन जाएगा.''
वे कहती हैं, ''मुझे मेरे घर का खाना बहुत याद आता है. मुझे अपनी माँ और परिवार के साथ मज़ाक करना याद आता है. कई बार उनके चेहरे मेरी आँखों के सामने घूमते हैं. लेकिन मैं रुबीना के बिना घर नहीं जाऊँगी.''
मालती कहती हैं कि उनके परिवार वालों को ये रिश्ता समझ में ही नहीं आएगा.
उन्होंने कहा, "जब मैंने कहा कि हम दोनों एक साथ रहना चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि क्यों साथ में रहना चाहते हैं? ये उनकी समझ से परे है और हमारे समझाने के दायरे से भी बाहर है, क्योंकि हमें उस भाषा का ज्ञान नहीं है जिसके ज़रिए उन्हें ये समझाया जा सके."
रुबीना कहती हैं, ''मेरे अब्बा के साथ संबंध अच्छे नहीं है, लेकिन मैं उनकी बड़ी बेटी हूँ और मैंने ये महसूस किया है कि वो जब भी बाहर से आते थे तो सबसे पहले आकर मेरा चेहरा देखते थे. वो मेरी पिटाई करते थे, लेकिन प्यार भी करते थे.''
''मैंने जब अपनी बहन से इंस्टाग्राम पर बात की, तो पता चला कि वो मेरे पुराने फ़ोन नंबर पर मुझे ट्राइ करते हैं हालाँकि मैंने वो सिम फेंक दिया है. मेरी बहन ने मुझे बताया कि वो नमाज़ पढ़ते वक़्त रोते हैं और मैं भी रोती हूँ.''
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इस समय सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है.
मालती और रुबीना कहती हैं कि अगर समुदाय के लोगों को शादी करने का अधिकार मिलता है, तो बहुत अच्छा होगा. लेकिन उनकी शादी के लिए परिवार की सहमति होनी चाहिए.
मालती कहती हैं, ''हमारी शादी में सभी परिवार वाले आने चाहिए. हम बेशक शादी करना चाहेंगे लेकिन उनकी सहमति के बिना कैसे कर पाएँगे?''
इसी का जवाब देते हुए रुबीना कहती हैं कि अगर मालती के घरवाले मान जाएँगे, तो वो शादी कर लेंगी और उनके लिए धर्म मायने नहीं रखता है, वे केवल एक दूसरे से प्यार करते हैं.
फ़िलहाल मालती और रुबीना सेफ़ो फ़ॉर इक्वॉलिटी संस्था के शेल्टर होम में रह रही हैं और ये संस्था दोनों के सपने और मक़सद को पूरा करने में मदद कर रही हैं.
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