Laser angioplasty क्या है? स्टेंट के बिना खत्म कर दिया हार्ट अटैक वाल ब्लॉकेज
Laser angioplasty vs stent: इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के वैज्ञानिक इस बारे में रिसर्च कर रहे हैं कि कोविड के बाद से देश में युवाओं में हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक की घटना क्यों बढ़ी हैं। 16 वर्ष के उम्र के किशोरों में भी हार्ट अटैक होने की घटनाएं देखी गई हैं। यह बहुत ही असामान्य है।
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में 23 साल के एक युवक को भी जब पिछले चार जुलाई को दिल का दौरा पड़ा तो यकीन करना नामुकिन था कि उसे हार्ट अटैक आया होगा। उसे सुबह उठने के साथ ही सीने में तकलीफ महसूस हुई और कुछ ही घंटे में वह असहनीय दर्द के बाद जमीन पर गिर गया।

मुंबई में 30 लोगों रोज होती है हार्ट अटैक से मौत
इस रिपोर्ट के मुताबिक मायानगरी में रोजाना करीब 30 लोगों की मौत हार्ट अटैक से मौत होती है। मरीज की 23 साल की उम्र को देखकर हैरानी स्वाभाविक थी कि उसे हार्ट अटैक आया है। लेकिन, वह सौभाग्यशाली रहा कि डॉक्टर लेजर एंजियोप्लास्टी से ही उसकी आर्टरी के ब्लॉकेज को दूर करने में सफल हो गए। उसकी लेजर एंजियोप्लास्टी करने वाले पवई स्थित एलएच हीरानंदानी अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर गणेश कुमार ने कहा वह शहर के उन 100 मरीजों में शामिल है, जिसक ब्लॉकेज को इस प्रक्रिया से 'वाष्पीकृत' किया गया है।
बिना स्टेंट के खत्म हो गई ब्लॉकेज
डॉक्टर गणेश का कहना है, 'जो ब्लड वेसल पूरी तरह से बंद हो गई थी, वह अब बिल्कुल नई जैसी लगती है।' वह मरीज न सिर्फ स्मोक करता था, बल्कि हार्ट अटैक का उसके परिवार में इतिहास रहा है। उसके पिता को 38 साल की उम्र में ही जानलेवा दिल का दौरा पड़ा था। लेजर एंजियोप्लास्टी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हार्ट अटैक या हार्ट की बीमारी वाले कई मरीजों को स्टेंट लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ताजा मामले में यही हुआ। जबकि, ब्लॉकेज खत्म करने की प्रक्रिया बाकियों के मुकाबले ज्यादा आसान होती है। खासकर युवा मरीजों के लिए यह ज्यादा कारगार तकनीक मानी जारी है।
कम उम्र की वजह से स्टेंट का विकल्प नहीं चुना
डॉक्टर कुमार ने कहा, 'हमने स्टेंट नहीं लगाना चाहा, क्योंकि उनकी उम्र बहुत कम है। इसके अलावा इस केस में जो क्लॉटिंग था, वह उम्रदराज मरीजों की तुलना में संभवत: नया और छोटा था।' हीरानंदानी अस्पताली में दो महीने पहले ही यह लेजर मशीन लगी है और तब से डॉक्टर कुमार 10 मरीजों का ब्लॉकेज लेजर एंजियोप्लास्टी से ही खत्म कर चुके हैं। स्टेंट की आवश्यकता ही नहीं पड़ी है। मुंबई में इसकी शुरुआत 2021 के फरवरी में मशहूर ब्रीच कैंडी अस्पताल से हुई थी।
लेजर एंजियोप्लास्टी क्या है?
कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर कीर्ति पुनमिया ने 75 मरीजों में 90 बार लेजर एंजियोप्लास्टरी पर एक शोध पत्र प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि लेजर आर्टरी ब्लॉकेज दूर करने की मेडिकल प्रक्रिया को आसान बना देता है। उन्होंने कहा, 'यह थक्के को जला देता है और मरीजों के लिए एंजियोप्लास्टी आसान कर देता है। आर्टरी के प्रभावित हिस्से में थक्के का हिस्सा या थक्का हटाने के बाद स्टेंट भी आसानी से लगाया जा सकता है।' आर्टरी को साफ करने के लिए डॉक्टर अन्य तरीके भी अपनाते हैं, लेकिन मरीज के लिए यह तकीनीक बहुत आसान है।
लेजर का इस्तेमाल और कब होता है?
हालांकि, डॉक्टर पुनमिया का कहना है कि लेजर बलून या स्टेंट का विकल्प नहीं है, जो आर्टरी ब्लॉकेज पूरी तरह से खत्म करने का स्टैंडर्ड तरीका है। वह कहती हैं, 'जब डॉक्टरों को जटिल एंजियाप्लास्टी करनी होती है या पहले से इस्तेमाल हो चुके स्टेंट वाली आर्टरी में रेस्टेनोसिस विकसित हो जाए तो लेजर से मदद मिलती है।'
वैसे लेजर एंजियोप्लास्टी कोई नई तकनीक नहीं है। यह 1980 के दशक में ही लॉन्च हो गई थी। शुरुआत में इसका इस्तेमाल मूल रूप से आर्टरी को मैनेज करने के लिए किया जाता था, जो परंपरागत तरीके से करने में दिक्कत होती थी। लेकिन, ज्यादा लागत, अपेक्षाकृत बहुत अच्छा परिणाम न आना और तकीनीकी दिक्कतों की वजह से यह लोकप्रिय नहीं हो पाया था।
तकनीक बेहतर होने से लेजर का प्रचलन बढ़ा
लेकिन, एक दशक बाद लेजर तकनीक बेहतर होने से इसका लाभ दिखाई पड़ा। लेजर लाइट की मदद से कोरोनरी आर्टरी की रुकावटें दूर की जाने लगीं, जिसे एंजियोप्लास्टी की मदद से परंपरागत तरीके में लाइलाज माना जाता था।
लेजर एंजियोप्लास्टी के लाभ
- कम परेशानी
- तेज प्रक्रिया
- अस्पताल में ज्यादा समय रहने की जरूरत नहीं
लेजर एंजियोप्लास्टी की चुनौतियां
- खर्चीली प्रक्रिया
- इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं किया जाता
- यह सिर्फ ब्लॉकेज दूर करने में डॉक्टरों की मदद करता है, ताकि बलून या स्टेंट लगाई जा सके
भारत में हृदय संबंधी रोगों की वजह से 1 लाख आबादी में 272 लोगों की मौत होती है। वैश्विक औसत 235 है। पश्चिमी देशों में जितनी उम्र में लोग हृदय रोग से पीड़ित होते हैं, भारतीय उससे एक दशक पहले ही प्रभावित हो जाते हैं। 2016 में 28.1% लोगों की मौत भारत में हृदय रोगों की वजह से हुई थी।












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