Language War: बिहार, UP के लिए क्यों छलका तमिलनाडु CM का दर्द? हिंदी के खिलाफ स्टालिन का मास्टरस्ट्रोक!
Language War: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके (DMK) चीफ एमके स्टालिन ने अपने हिंदी विरोधी अभियान को लेकर गुरुवार (27 फरवरी, 2025) को नई दलील पेश की है। उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दावा किया है कि हिंदी ने अपनी अखंड पहचान स्थापित करने के चक्कर में 'प्राचीन मातृ भाषाओं की हत्या कर दी है।'
तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने हिंदी के कथित वर्चस्व को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उनका दावा है कि हिंदी की एकरूपता की अवधारणा ने भारत की प्राचीन मातृ भाषाओं को नष्ट कर दिया है। उन्होंने अपनी इस टिप्पणी के माध्यम से उत्तर प्रदेश और बिहार में भाषा को लेकर एक नई चर्चा शुरू कराने का दांव खेला है। सवाल यह उठता है कि क्या यह उनकी हिंदी के खिलाफ एक राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है या फिर भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा की कोशिश?

Language War: स्टालिन का बिहार, उत्तर प्रदेश वाला भाषाई दांव
विविधता भारत की पहचान है, जिसमें भाषाई विविधता भी शामिल है। भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं, लेकिन बोलचाल की सैकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं। स्टालिन के मुताबिक, हिंदी के बढ़ते प्रभाव ने कई क्षेत्रीय भाषाओं जैसे भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, कुरुख, मुंडारी जैसों को कमजोर कर दिया है।
उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार पहले 'हिंदी हार्टलैंड' नहीं थे,बल्कि इनकी अपनी समृद्ध भाषाई पहचान थी,जो अब विलुप्त होने की कगार पर हैं।
Language War Tamil Nadu: हिंदी के खिलाफ द्रविड़ राजनीति का इतिहास
तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन का एक लंबा इतिहास रहा है। डीएमके (DMK) और इससे जुड़े द्रविड़ आंदोलन ने हमेशा हिंदी के जबरन थोपे जाने का आरोप लगाते हुए इसका विरोध किया है। 1965 में हिंदी को अनिवार्य करने की केंद्र की योजना के खिलाफ हुए व्यापक विरोध प्रदर्शन के बाद, तमिलनाडु में दो-भाषा नीति लागू की गई, जिसमें केवल तमिल और अंग्रेजी को प्राथमिकता दी गई।
स्टालिन ने अपने एक्स पोस्ट में कहा है कि तमिलनाडु इस खतरे को पहले ही समझ चुका है और वह अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए लड़ रहा है। उनका मानना है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक वर्चस्ववादी नीति का हिस्सा है, जो अन्य भाषाओं और संस्कृतियों को कमजोर कर सकती है।
Language Row Tamil Nadu: हिंदी और संस्कृत के माध्यम से 'सांस्कृतिक वर्चस्व' थोपे जाने के आरोप
भाषा विवाद केवल सांस्कृतिक या क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका राजनीतिक महत्त्व भी है। हिंदी को बढ़ावा देने की नीति को दक्षिण के कुछ राज्यों की ओर से केंद्र की बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की 'सांस्कृतिक वर्चस्व' की योजना के रूप में देखा जा रहा है।
स्टालिन का आरोप है कि केंद्र सरकार हिंदी और संस्कृत को प्राथमिकता देकर क्षेत्रीय भाषाओं को हाशिए पर धकेलना चाहती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि हिंदी थोपने से केवल भाषा नहीं, बल्कि संबंधित संस्कृतियों को भी नुकसान होगा।
Language War: कई क्षेत्रीय भाषाओं को मिली है अहमियत
दरअसल, बिहार और उत्तर प्रदेश में हिंदी का व्यापक रूप में प्रचलन होता है, लेकिन यहां अनेकों बोलियां और भाषाएं भी हैं, जो सदियों से प्रचलित रही हैं। इन इलाकों में एक कहावत भी है- 'कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी।'
बिहार के मिथिलांचल में मैथिली बोली जाती है, जो अब संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो चुकी है। लेकिन, अब भी यह अपनी समृद्ध पहचान बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। खासकर इसकी लिपि विलुप्त होती जा रही है और साहित्य भी कमजोर पड़ा है। इसी तरह, भोजपुरी, अवधी, और ब्रज भाषाएं और बोलियां भी जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें हिंदी ने प्रभावित कर दिया है।
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