बिहार: लालू के 15 साल बनाम नीतीश के 10 साल

पटना (मुकुंद सिंह)। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समय का फेर महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। हालांकि यह पहले वर्ष 2005 में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ था, जब राजद के पन्द्रह वर्षों के शासनकाल को जंगलराज के रूप में स्थापित कर नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सत्तासीन हुआ था। एक बार फिर समय स्वयं को दोहरा रहा है। वर्ष 2013 के जून तक जिस नीतीश राज को भाजपा के नेतागण रामराज की संज्ञा देते अघाते नहीं थे, वे उसी नीतीश कुमार के अगले दो वर्षों के राज को जंगलराज-2 की संज्ञा दे रहे हैं।

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लिहाजा हिसाब मांगने की कवायद चल रही है। भाजपा राजद-जदयू से सत्रह वर्षों का हिसाब मांग रही है। खैर हिसाब कैसे हो, जबकि 10 में से साढ़े-सात साल नीतीश के अकेले के हैं। खैर लालू राज से तो तुलना की ही जा सकती है।

बिहार में कृष‍ि

इसमें लालू के 15 वर्षों के शासनकाल में कृष‍ि बना किसी रोडमैप के खानापूर्ति के रूप में चलती रही, जबकि नीतीश ने शुरुआत में तेजी दिखाई, लेकिन पिछले दो-तीन साल से उन्होंने भी किसानों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। बिहार भाजपा के बड़े नेता और विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता नंद किशोर यादव के मुताबिक कृषि विकास दर में लगातार गिरावट आ रही है और इसके लिये केवल नीतीश कुमार की सरकार ही जिम्मेदार है।

इंफ्रास्ट्रक्चर

ऐसे ही दावे आधारभूत संरचनाओं के विकास एवं अपराध नियंत्रण को लेकर भी किये जा रहे हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भाजपा के नेतागण साढ़े सात वर्षों को बिहार के लिए स्वर्णिम युग साबित करने पर तुले हैं और इसका सारा श्रेय वे अकेले लेना चाहते हैं।

जाहिर तौर पर यह एक चुनावी कवायद है दस वर्षों के एंटी इनकंबेंसी से बचने के लिए। इस बात को भाजपा के नेतागण अच्छी तरह समझते हैं कि जनता जब वोट करने जायेगी तो वह पिछले दस वर्षों का लेखा-जोखा भी देखेगी। वे यह भी समझते हैं कि पिछले दस वर्षों में बिहार विकास के पथ पर अग्रसर अवश्य हुआ है। हालांकि यह राजनीतिक शोध का विषय है कि लालू-राबड़ी राज में बिहार में विकास हुआ या नहीं, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक महासंग्राम के बावजूद तब भी बिहार अपने रास्ते आगे बढ़ा था।

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इसके अलावा लालू-राबड़ी शासनकाल के राजनीतिक योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता है। उस दौरान बिहार के दलितों और पिछड़ों में राजनीतिक चेतना बढ़ी और यही कारण रहा कि राजनीतिक चेतना के अनुपात में आधारभूत विकास नहीं होने के कारण लालू-राबड़ी को सत्ता से दूर होना पड़ा।

बहरहाल यह तो साफ है कि भाजपा जिन साढ़े सात वर्षों पर अपना हक जता रही है उसका श्रेय वह अकेले नहीं ले सकती है। इसकी वजह यह है कि उस समय भी मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार मौजूद थे। हालांकि यह भी कहना सही है कि आंकड़ेबाजी में माहिर राजनेताओं के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। लेकिन मौजूदा चुनावी परिदृश्य को देखते हुए यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस बार जनता के समक्ष नरेंद्र मोदी का एक साल और उनके द्वारा किये गये वायदों की पूरी फेहरिस्त भी होगी जिसके संबंध में भाजपा नेताओं के पास महज बयानबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है।

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