Ladakh Article 371 Proposal: लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने की तैयारी? केंद्र के फैसले पर क्या बोले वांगचुक

Ladakh Article 371 Proposal: लद्दाख में जमीन, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बीच अब एक नई उम्मीद दिखाई दी है। जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख आंदोलन के प्रमुख चेहरे सोनम वांगचुक ने शनिवार, 23 मई को कहा कि केंद्र सरकार ने लद्दाख को अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक संरक्षण देने का प्रस्ताव रखा है।

हालांकि उन्होंने साफ किया कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और बातचीत का दौर जारी है। यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव नई दिल्ली में गृह मंत्रालय के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सामने आया।

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इस बैठक में लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। यही दोनों संगठन पिछले कई महीनों से लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा, राज्य का दर्जा और स्थानीय अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं।

Sixth Schedule vs Article 371 India: क्या है लद्दाख की मुख्य मांग?

लद्दाख के लोग लंबे समय से संविधान की छठी अनुसूची यानी Article 244 के तहत संरक्षण की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे स्थानीय लोगों की जमीन, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी। साथ ही लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की भी मांग लगातार उठती रही है।

लेकिन केंद्र सरकार ने अब इसके विकल्प के रूप में Article 371 जैसी विशेष व्यवस्था का प्रस्ताव दिया है। संविधान का अनुच्छेद 371 देश के कुछ राज्यों को विशेष प्रशासनिक और सांस्कृतिक अधिकार देता है, ताकि वहां की स्थानीय पहचान और संसाधनों की रक्षा की जा सके।

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सोनम वांगचुक बोले- 'अभी कोई अंतिम फैसला नहीं'

सोनम वांगचुक ने बैठक के बाद कहा कि सरकार के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है, लेकिन अभी केवल प्रस्ताव पर चर्चा हुई है। उन्होंने कहा,यह सिर्फ एक प्रस्ताव था। अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है क्योंकि इसके कई पहलुओं पर विस्तार से काम करना बाकी है। बातचीत जारी है और यह पूरा मामला अभी 'वर्क इन प्रोग्रेस' है।"

वांगचुक ने बताया कि सरकार की तरफ से अनुच्छेद 371 जैसे संरक्षण का सुझाव दिया गया, लेकिन इसे लागू करने के लिए एक निर्वाचित विधानसभा की जरूरत होगी। फिलहाल लद्दाख में कोई विधानसभा नहीं है और पूरा प्रशासन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल (LG) के अधीन चलता है।

सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के प्रतिनिधियों ने एक समझौता मॉडल पेश किया है। इसके तहत लद्दाख को फिलहाल पूर्ण राज्य का दर्जा न देकर एक सीमित अधिकारों वाली विधानसभा दी जा सकती है।

अभी कैसे चलता है लद्दाख का प्रशासन?

2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। लेकिन यहां विधानसभा नहीं बनाई गई। पिछले लगभग सात वर्षों से पूरा प्रशासन सीधे उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के नियंत्रण में चल रहा है।

स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस व्यवस्था में आम लोगों की भागीदारी बेहद सीमित हो गई है। रोजगार, भूमि उपयोग, उद्योग, पर्यटन और पर्यावरण से जुड़े फैसले स्थानीय जनता की राय के बिना लिए जाते हैं।

क्या है नया 'प्रस्तावित ट्रांजिशन मॉडल'?

यदि केंद्र सरकार और लद्दाख के नेताओं के बीच इस समझौते पर अंतिम सहमति बन जाती है, तो यह 'प्रस्तावित ट्रांजिशन मॉडल' लद्दाख की शासन व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख देगा। यह मॉडल लद्दाख को सीधे नौकरशाही के नियंत्रण से मुक्त कर स्थानीय स्वशासन (Local Self-Governance) की ओर ले जाएगा:

अधिकारी अब जनता के प्रति होंगे जवाबदेह: साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लद्दाख में कोई विधानसभा नहीं है। पूरा शासन केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल (LG) और नौकरशाही के हाथों में है। स्थानीय लोगों का आरोप था कि अफसरशाही उन्हें फैसलों से अलग रखती है। नए मॉडल के तहत पूरी नौकरशाही सीधे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के अधीन आ जाएगी।

मिलेगी विधायी शक्ति (Legislative Power): वर्तमान में लद्दाख में केवल 'हिल डेवलपमेंट काउंसिल' (Hill Development Councils) काम करती हैं, जिनके पास कानून बनाने के अधिकार बेहद सीमित हैं। वे जमीन और नौकरियों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम नहीं बना सकती थीं। नए मॉडल में एक 'हाइब्रिड असेंबली' (Hybrid Assembly) बनेगी, जिसे स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण, रोजगार और जमीन के संरक्षण के लिए विशेष कानून बनाने की संवैधानिक आजादी होगी।

कम वित्तीय बोझ वाला हाइब्रिड मॉडल: पूर्ण राज्य का दर्जा तुरंत न देकर इस अंतरिम राजस्व-लिंक्ड लोकतांत्रिक ढांचे (Revenue-Linked Democratic Structure) को लागू किया जाएगा। यह एक ऐसा रचनात्मक रास्ता है जिससे लद्दाख के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार भी मिल जाएंगे और देश के खजाने पर बिना वजह का भारी वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।

सोनम वांगचुक ने उम्मीद जताई है कि यदि इस हाइब्रिड और लचीले मॉडल पर कागजी बारीकियों को अंतिम रूप दे दिया जाता है, तो यह लद्दाख के लोगों की पहचान की रक्षा करने के साथ-साथ देश की सीमावर्ती सुरक्षा और पर्यावरण को बचाने में मील का पत्थर साबित होगा।

आर्थिक चुनौती बनी सबसे बड़ी बाधा

हालांकि लद्दाख के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की है। वर्तमान में यह क्षेत्र प्रशासनिक खर्च और सरकारी कर्मचारियों के वेतन के लिए काफी हद तक केंद्र सरकार की फंडिंग पर निर्भर है। इसी वजह से पूर्ण राज्य का दर्जा फिलहाल व्यवहारिक नहीं माना जा रहा। ऐसे में 'हाइब्रिड विधानसभा' मॉडल को एक अस्थायी समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।

आंदोलन के पीछे क्या है चिंता?

लद्दाख के लोग लगातार यह आशंका जता रहे हैं कि बिना संवैधानिक सुरक्षा के बाहरी कंपनियां और निवेशक इलाके की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर सकते हैं। इसके अलावा तेजी से बढ़ते पर्यटन और निर्माण गतिविधियों से हिमालयी पर्यावरण को भी खतरा बताया जा रहा है।

सोनम वांगचुक और अन्य सामाजिक संगठनों का कहना है कि लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली बचाने के लिए मजबूत कानूनी सुरक्षा बेहद जरूरी है।

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