मशहूर हिन्दी लेखिका कृष्णा सोबती का 93 साल की उम्र में निधन

नई दिल्ली। ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती का शुक्रवार को निधन हो गया। वो 93 साल की थीं। वो बीते कुछ समय से लगातार बीमार चल रही थीं। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम चार बजे दिल्ली के निगमबोध घाट पर होगा। सोबती को 1980 में 'जिंदगीनामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1996 में उन्हें साहित्य अकादमी का फैलो बनाया गया जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। 2017 में इन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से नवाजा गया।

ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती का शुक्रवार को निधन हो गया। वो 93 साल की थीं। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम चार बजे दिल्ली के निगमबोध घाट पर होगा। सोबती को 1980 में जिंदगीनामा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1996 में उन्हें साहित्य अकादमी का फैलो बनाया गया जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। 2017 में इन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया।

सोबती को 1981 में शिरोमणि पुरस्कार और 1982 में हिंदी अकादमी पुरस्कार मिला। कृष्णा सोबती ने यूपीए सरकार के दौरान पद्मभूषण लेने से इनकार कर दिया था। वहीं 2015 में असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने को लेकर भी वो चर्चा में रहीं।

18 फरवरी, 1925 को जन्मीं सोबती की पहचान मुखरता के साथ अपनी बातें रखने के लिए रही। अपनी लेखनी में भी उन्होंने खुलकर उन बातों को लिखा, जिन पर समाज में कम बात की जाती है। सोबती ने 1966 में लिखे अपने उपन्यास 'मित्रो मरजानी' से काफी शोहरत हासिल की थी। जिसमें एक महिला की सेक्स इच्छा को लेकर बात की गई थी। इसके अलावा दिलोदानिश, जिंदगीनामा, ऐ लड़की, समय सरगम, सूरजमुखी अंधेरे के, जैनी मेहरबान सिंह जैसी रचनाओं के लिए उन्हें जाना जाता है। कविताओं के लिए भी सोबती की पहचान है।

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