जानिए, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में सियासी दुश्मन की ओर क्यों बढ़ाया दोस्ती का हाथ?
नई दिल्ली- 2011 में ममता बनर्जी लेफ्ट फ्रंट के तीन दशकों का राज खत्म करके पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई थीं। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें जो सियासी संघर्ष करना पड़ा था, उसकी पीड़ा समय के साथ शायद अब कम हो चुकी होगी। अगर दीदी के दिल में वामपंथियों के साथ लड़ाई के जख्म अभी भी बचे होंगे, तब भी शायद उनको बीजेपी के मौजूदा सियासी संकट के सामने वह कम ही महसूस होती होगी। लिहाजा, वो पुराने जख्म पर मरहम लगाकर, नए घाव को नासूर बनने से पहले ही सर्जरी चाहती हैं। क्योंकि, दीदी के रवैये में बदलाव नजर आने लगा है। बीजेपी को रोकने के लिए उन्होंने वामपंथियों को पुचकारना शुरू कर दिया है। लगता है कि दीदी ने यह राजनीतिक प्रेरणा भी उन्हीं वामपंथियों से ली है, जिनसे लड़कर वो लगातार दो बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं।

दीदी ने बदल ली है रणनीति
द हिंदू अखबार की खबर के मुताबिक ममता बनर्जी मौजूदा लोकसभा चुनाव में बीजेपी को रोकने के लिए सीपीएम के साथ बहुत ही नरमी बरत रही हैं। खासकर 2018 के पंचायत चुनावों के बाद उन्हें यह डर सताने लगा है कि राज्य में बीजेपी का प्रभाव जिस कदर बढ़ रहा है, उससे उनकी सारी राजनीति धरी की धरी रह जाएगी। बीजेपी की काट में पिछले कुछ महीनों से उन्होंने लेफ्ट और कांग्रेस की सहायता करनी शुरू कर दी है। नई रणनीति के तहत अब टीएमसी की कोशिश है कि किसी भी कीमत पर आगे एक भी सीपीएम नेता और कैडर बीजेपी से न जुड़ें। अखबार से स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के पूर्व एक्टिविस्ट और वकील तथागत मजूमदार ने कहा कि "निश्चित रूप से टीएमसी ने पहलीबार ब्रिग्रेड परेड ग्राउंड में सीपीएम की अंतिम बड़ी रैली शायद इसी वजह से नहीं रोकी।" उन्होंने आगे एक और बड़ी जानकारी देते हुए कहा कि "मैंने देखा है कि सीपीएम के जो पार्टी दफ्तर 2011 से बंद पड़े थे, अब धीरे-धीरे खुलने लगे हैं। यह टीएमसी के मौन समर्थन के बिना संभव नहीं है।"
यही नहीं पार्टी ने मुस्लिम बहुल तीन जिलों में विपक्ष के नेताओं को भी उसने अपने पाले में लाकर मुसलमानों के वोट बंटने से रोकने की कोशिश भी की है। लेकिन, ममता बनर्जी को यह भी पता है कि राज्य में 30% मुस्लिम वोट उनके साथ रहने का उल्टा असर भी पड़ सकता है। इसलिए, हाल के कुछ समय से उन्होंने हिंदुओं को रिझाने की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं। जैसे कई पूजा समितियों को आर्थिक मदद दी गई है, हिदुओं के त्योहारों में वो खुद शामिल होने लगी हैं और राज्य सरकार की ओर से डायरेक्ट कैश ट्रांसफर वाली योजनाओं को भी ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया गया है।

सियासी चूक से सबक लेने की कोशिश
दरअसल, दीदी ने पिछले चुनावों से ये सबक ली है कि अगर लेफ्ट या कांग्रेस के वोट कटेंगे, तो इसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा, टीएमसी को नहीं। इससे पहले 2011 में सत्ता में आने के बाद से वह 'विपक्ष-विहीन राजनीति' को आगे बढ़ा रही थीं। 2018 के पंचायत चुनाव तक वो सत्ता के प्रभाव में इस कदर रहीं कि वामपंथी खत्म होते गए और बीजेपी का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ता गया और उन्हें इसका पता ही नहीं चला। टीएमसी में ममता के बाद सबसे प्रभावी माने जाने वाले मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पंचायत चुनाव से पहले स्पष्ट तौर पर कहा था, "हमारा मकसद विपक्ष-विहीन पंचायत बोर्ड के गठन का है।" इसका परिणाम ये हुआ कि बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ने लगा और सीपीएम का उसके सबसे कम स्तर पर पहुंच गया। वैसे तो बीजेपी के वोट शेयर में ये बढ़त 2001 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हो गई थी, लेकिन वह अभी तक उस हिसाब से सीटों में परिवर्तित नहीं हो सका है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना बेहतर प्रदर्शन करते हुए 2 सीटें हासिल की थी।
इसका कारण ये है कि जमीनी स्तर पर सीपीएम के मजबूत कैडर काफी हद तक बीजेपी की ओर शिफ्ट हो चुके हैं। मसलन उत्तर 24 परगना के तेलतुलिया ब्लॉक के यूनुस अली को ही लीजिए। वो पहले फॉर्वर्ड ब्लॉक की ओर से लेफ्ट फ्रंट के लिए बूथ मैनेज करते थे। लेकिन, उनके ऑफिस को जला दिया गया। उनके बड़े भाई जो सीपीएम के लोकल कमिटी के मेंबर थे, उन्हें कथित रूप से झूठे केस में फंसाकर जेल में डाल दिया गया। लिहाजा, अब वो बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। अली बीजेपी के स्थानीय यूनिट में अस्पसंख्यक सेल के उपाध्यक्ष हैं। ममता बनर्जी को इसका अहसास हो चुका है कि सीपीएम के कैडर के खिलाफ कार्रवाई उन्हें बीजेपी की ओर जाने को मजबूर कर रहा है, जिससे बीजेपी बड़ी ताकत बनकर उभर रही है।

दीदी का नया सियासी गणित
राजनीतिक जानकारों की मानें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 17% से ऊपर बढ़ना तय है। 2018 में एक विधानसभा उपचुनाव में तो वह 33% तक पहुंच गया था। इसलिए टीएमसी की कोशिश है कि हर हाल में बीजेपी की बढ़त को 25% वोट शेयर तक रोका जाए। एक राजनीतिक विशेषज्ञ गौतम रॉय का कहना है कि "अगर लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन ने 25% वोट हासिल कर लिए, तो बीजेपी 25% तक सिमट जाएगी, जो कि टीएमसी के लिए अच्छी खबर होग। लेकिन, अगर लेफ्ट-कांग्रेस का (वोट शेयर) और गिरा, तो बीजेपी 30% के आंकड़े को पार कर जाएगी, जो टीएमसी को बहुत ही ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा।" इसलिए, ममता बनर्जी आज बीजेपी को रोकने के लिए सीपीएम को भी आगे बढ़ाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं, जो कि कभी उनकी एकमात्र सियासी दुश्मन हुआ करती थी।

दीदी को इतिहास से उम्मीद
दरअसल, दीदी के बर्ताव में आए बदलाव का इतिहास जनसंघ के जमाने से लेकर ज्योति बसु के समय तक से जुड़ा हुआ है। एक वरिष्ठ सांसद ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर अखबार से कहा है कि शायद ममता बनर्जी आज सीपीएम नेता ज्योति बसु को बहुत ज्यादा याद कर रही होंगी। बातचीत में उन्होंने इसका कारण ये बताया कि बसु ने कभी भी विपक्ष को मिटाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि उनके समय में कांग्रेस से सत्ता छीने जाने के दो दशक बाद भी उसका वोट शेयर करीब 40% पर कायम रहा। जबकि, सीपीएम 5 साल में ही 40% से गिरकर 20% तक पहुंच गई,क्योंकि टीएमसी विपक्ष को मिटाने की रणनीति पर चल रही थी।
शायद बसु के जमाने में कांग्रेस से नरमी बरते जाने का कारण राज्य के सियासी इतिहास से भी जुड़ा है। 1951-52 के विधानसभा चुनाव में हिंदू महासभा और जनसंघ ने मिलकर राज्य की 13 सीटें जीती थीं। यह आंकड़ा मौजूदा समय की भारतीय जनता पार्टी के 3 विधायकों से चार गुना से ज्यादा था। भाजपा जनसंघ से ही बनी है, जिसका 50 के शुरुआती वर्षों में बंगाल में काफी प्रभाव था। लेकिन, 1953 में जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक मौत और वामपंथियों के विस्तार ने वहां दक्षिणपंथी पार्टियों का प्रभाव लगभग मिटा ही दिया था। इसका कारण लेफ्ट फ्रंट ने पश्चिम बंगाल में विपक्ष के तौर पर कांग्रेस का वजूद मिटाने का कभी भी प्रयास नहीं किया। अब शायद दीदी को उस सियासी गलती का इल्म हो चुका है, इसलिए वो बीजेपी को रोकने के लिए सीपीएम को भी स्वीकार करने के लिए तैयार हो चुकी हैं। लेकिन, दीदी के इतने दांव की जमीन पर कितना असर पड़ता है, यह देखना बहुत ही रोचक होगा, क्योंकि यह न 1950 का दशक है और न ही उस दौर के लोगों को वोट करना है।












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