शहरी नक्सलवाद- फिल्म निर्माता, लेखक, शिक्षक कर रहे नक्सलवाद का प्रचार
नई दिल्ली। अगर आपको लगता है कि नक्सलवाद की समस्या से जंगलों में निपटा जा सकता है और नक्सली सिर्फ जंगलों में रहते हैं तो आप गलत है। जंगलों में बसने वाले नक्सली सिर्फ एक जंगलों तक ही नहीं सिमटे हैं बल्कि अब शहरों की ओर भी तेजी से बढ़ गये हैं जिसे अर्बन नक्सलवाद कहते हैं।
ऐसे संगठनों के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़नी हमेशा से मुश्किल भरा होता है बल्कि इनके खिलाफ संवेदनशीलता और भावनाओं के साथ लड़ना पड़ता है। इसकी वजह यह है कि ये संगठन लोगों को उनकी विचारधारा और भावनाओं से जोड़ते हैं। ऐसे में इन संगठनों भावना और विचार पर हमला बेहद जरूरी होती है।
जानिये कैसे दक्षिण भारत में पैर जमा रहे नक्सली
कौन होते हैं अर्बन या शहरी नक्सली?
शहरी नक्सलियों का मुख्य एजेंडा होता है नक्सलवाद का शहरों में गुणगान करना। खुफिया विभाग की मानें तो दिखावटी बुद्धिजीवी जो 1940 के दौर को ही सच मानते हैं और विकास के किसी भी दावे को झुठलाते हैं यह समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
ये शहरी नक्सली लेखक, शिक्षक, प्रोफेसर, फिल्म निर्माता हो सकते हैं। इन सभी लोगों का नक्सलवाद के समर्थन में शहरों में लोगों की भावना को जोड़ने में अहम योगदान है। ये लोग या तो खुद समाजसेवी संस्था के जरिए या फिर नक्सलियों को अपेक्षित मंच देकर उन्हें बढ़ावा देते हैं।
लेकिन जिस तरह से कई एनजीओ सरकार के निशाने पर हैं वो सरकार के खिलाफ अपने संसाधनों को भरपूर प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ये संस्थायें ग्रामीणों को उनकी भावनायों को भड़काकर उन्हें गलत तथ्य बताकर गुमराह करते हैं।
शहरों में बढ़ता नक्सलवाद
शहरों में नक्सलवाद के बढ़ने का सबसे पहला मामला केरल में लोगों के सामने आया जब एक नक्सल वर्ग को पुलिस ने पकड़ा था। जिसमें यह बात सामने निकलकर आयी थी कि ये लोग शहरों की ओर अपना रुख कर रहे हैं। यही नहीं इन नक्सलियों की आगे की योजना चेन्नई में अपने काम को मजबूत करना और नेटवर्क का विस्तार करना था।
इस कदम के जरिए ये नक्सली ना सिर्फ शहरों में अपना विस्तार करते हैं बल्कि लोगों को अपनी विचारधारा से भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। नक्सलियों का अगला मिशन शहर के लोगों को हथियार उठाने के लिए प्रेरित करना होता है। वहीं खुफिया विभाग की जांच में इस बात का भी खुलासा हुआ कि कई बुद्धिजीवी इन नक्सलियों की मदद करते हैं।
शहरी नक्सलियों का मुख्य उद्देश्य शहरों में उनके नेटवर्क को मजबूत करना होता है। नक्सल विरोधी एक अभियान से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि शहरी नक्सलियों की त्वरित उद्देश्य यह नहीं होता कि लोग तुरंत हथियार उठाये बल्कि वो कोशिश करते हैं को लोग उनकी विचारधारा से समहमत हो और समय के साथ व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठाये।
हालांकि यह समस्या कुछ लगों की विचारधारा तक ही सिमटी है लेकिन अब इसका विस्तार देखने को मिल रहा है। हैदराबाद, बेंगलुरू, चेन्नई, के कॉलेज में कई छात्र खुलेआमह नक्सली विचाराधारा का समर्थन करते हैं तो वहीं एक ऐसा तबका भी है कि पर्दे के पीछे से काम कर रहा है।
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