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जानिए, एसपी-बीएसपी गठबंधन पर क्या सोचते हैं बुआ और बबुआ के वोटर?

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नई दिल्ली- लोकसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी बहुत ही तेज है। रोजाना नए-नए समीकरण बनने और बिगड़ने की खबरें आ रही हैं। लेकिन,अभी भी सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है बुआ-बबुआ की पार्टियों का सियासी गठबंधन। इस सबंध में कभी ढाई दशक बाद राज्य की राजनीति की दो अहम धुरी मुलायम सिंह यादव और मायावती के एक मंच पर पहुंचने की चर्चा होती है, तो कभी दोनों दलों के सम्मानित महापुरुषों को बराबर सम्मान देने की गाइडलाइंस जारी होने की। जाहिर है कि करीब 24 साल बाद अगर दोनों पार्टियां साथ आई हैं, तो उनके लिए अपने बीच की कड़वाहटें खत्म हो जाने का संदेश आगे बढ़ाना भी जरूरी है। लेकिन, इन सबके बीच एक सबसे बड़ा सवाल जो पीछे छूट रहा है, वह ये कि इन दोनों दलों के वोटर क्या सोचते हैं? क्या उन्होंने भी नेताओं के बीच हुई चुनावी तालमेल को आसानी से अपना लिया है? या उनके मन में अभी भी घाव बाकी हैं?

क्या कहती है ग्राउंड रिपोर्ट?

क्या कहती है ग्राउंड रिपोर्ट?

दोनों दल के नेता महागठबंधन की सफलतला के लिए चाहे जितना भी जोर लगा रहे हों, लेकिन सच्चाई ये है कि 24 साल की कड़वाहट 24 घंटे या 24 दिनों में खत्म नहीं की जा सकती। बात एक-दूसरे की सम्मान की है, जिसे जमीनी स्तर पर हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती है। 1995 के गेस्ट हाउस कांड ने यादवों और जाटवों में अभी भी बहुत दूर बना रखी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इटावा जिले के कोठी बिचारपुरा गांव के 60 साल के बुजुर्ग राम दास जो कि जाटव हैं, मायावती के फैसले से नाखुश दिखते हैं। उन्होंने कहा है कि "समाजवादी पार्टी की सरकार में गुंडों को खुली छूट थी।......अगर गुंडाराज फिर से लौटता है, तो दलित न्याय के लिए कहां जाएंगे।" दलितों के उसी गांव के उपदेश कुमार नाम के युवा कहते हैं- "यादव और जाटव की दोस्ती आज तक नहीं चल पाई। इस गठबंधन में बहनजी को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला है, क्योंकि अखिलेश को कहीं ज्यादा सीटें मिलेंगी। हमारा वोट तो उन्हें मिलता है, लेकिन उनका नहीं मिल पाता।" उन्होंने ये भी माना है कि 2017 में कुछ दलितों ने बीजेपी को वोट दिया था। उन्होंने यहां तक कहा कि एसपी को समर्थन देना फ्राइंग पैन या आग में से एक को चुनने जैसा होगा। उनके शब्दों में- "इसलिए, अच्छा है कि फ्राइंग पैन के साथ रहा जाए। कम से कम मौजूदा सरकार में यादवों का डर तो नहीं है।"

हालांकि, सभी की राय एक जैसी नहीं है। आगरा के एक मजदूर राधे श्याम जो कि खुद दलित हैं, कहते हैं- "यह गठबंधन उतना ही प्रभावशाली होगा, जितना यह 1993 में था।" अपनी राय का कारण बताते हुए वे कहते हैं कि पिछले दो वर्षों में उनका जूते बनाने कारोबार चौपट हो गया है। उनका दावा है कि नोटबंदी ने सबसे ज्यादा दलितों और पिछड़ों को तबाह किया है। यादवों के एक वर्ग की भी अपनी चिंताएं हैं। हालांकि सराई एसार गांव के शिशुपाल सिंह यादव कहते हैं कि उन्हें मायावती से कोई दिक्कत नहीं है। उनकी सरकार कम से कम मोदी-योगी सरकार से तो अच्छी ही थी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जब भी बीएसपी सत्ता में आती है, तो गैर-दलितों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के मामले बढ़ जाते हैं। यादवों और जाटवों में ऐसे और भी लोग हैं, जो मानते हैं कि इसबार दोनों एक होकर वोट करेंगे।

दुविधा दूर करने के लिए बनानी पड़ रही है रणनीति

दुविधा दूर करने के लिए बनानी पड़ रही है रणनीति

दोनों दलों के नेतृत्व को शायद जमीनी हकीकत की पुख्ता जानकारी है। इसलिए, वो लोग कोई जोखिम नहीं लेना चाह रहे हैं। प्रचार के लिए साझा झंडे को हरी झंडी दिखाने के बाद दोनों नेताओं की साझा रैली की भी योजना बन चुकी है। पहली रैली 7 अप्रैल को देवबंद में होगी, जिसमें बुआ-बबुआ के साथ मिलकर महागठबंधन के लिए प्रचार करेंगे। माया और अखिलेश इस तरह की कुल 12 रैलियां करने की तैयारी में हैं। निचले स्तर के नेता इसका तानाबाना अभी से बुनना शुरू कर चुके हैं। मसलन अब बीएसपी के नेता सिर्फ 'जय भीम, जय भारत' का ही नारा नहीं लगाते। उसके बाद वो 'जय लोहिया और जय समाजवाद' का नारा भी बुलंद करते हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी के लोग लोहिया की तरह डॉक्टर अंबेडकर और कांशीराम से लेकर मायावती तक के नारे लगाना नहीं भूलते। आगरा के एक दलित नेता रवींद्र पारस वाल्मीकि कहते हैं- "हमें आगे बढ़ना है। आखिर यह गठबंधन जनता के दबाव के कारण ही बना है। हमें एक-दूसरे के महापुरुषों का सम्मान करना है।"

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गठबंधन की क्या है टेंशन?

गठबंधन की क्या है टेंशन?

दरअसल, एसपी और बीएसपी को बीजेपी से जितनी बड़ी चुनौती मिल रही है, उससे अंदर की चुनौती कमतर नहीं है। उदाहरण के लिए अखिलेश यादव को चाचा शिवपाल यादव के प्रभाव की चिंता सता रही होगी, तो मायावती की परेशानी भीम आर्मी से होगी। हम पहले के एक लेख में इस पर विस्तार से बात कर चुके हैं कि सैफई और उसके आसपास यानी यादवों के गढ़ में लगने वाला नारा 'सैंतीस पर लाल और बाकी शिवपाल' एसपी के नेताओं को कितना परेशान कर रहा होगा। क्योंकि, शिवपाल यादव ने अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया से मुलायम की सीट छोड़कर सभी पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की हुई है। इसके चलते जिन यादव उम्मीदवारों को 37 सीटों पर समाजवादी पार्टी से टिकट नहीं मिलेगा, उनके प्रत्याशियों का टूटकर शिवपाल की तरफ जाने का खतरा बना हुआ है। वैसे भी समाजवादी पार्टी के संगठन में पहले उनका ही दबदबा रहा है।

यही नहीं, चर्चा है कि कुछ उम्मीदवार पाला बदलकर बीजेपी में भी जाने का मन बना रहे हैं। जबकि, मायावती का टेंशन भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद ने बढ़ा रखी होगी। मेरठ के एक अस्पताल में प्रियंका गांधी वाड्रा जिस तरह से उनसे अचानक मिलने पहुंच गईं, उसके कई सियासी मायने निकल रहे हैं। हालांकि आजाद बार-बार बीएसपी को मदद करने की बात तो करते रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी सियासी महत्वाकांक्षा कब पलटने को मजबूर कर दे कहना मुश्किल है? खासकर तब जब वो वाराणसी में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने की बात भी कह चुके हैं।

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English summary
Know what akhilesh and mayas voters thinks about sp bsp alliance
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