Kisan Andolan: सिर्फ MSP की कानूनी गारंटी ही नहीं, किसानों की इन मांगों पर भी फंस रहा है पेच
Kisan Andolan Latest News: किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच में बातचीत का सिलसिला लगातार जारी है। किसी सर्वमान्य समाधान के लिए इससे अच्छा तरीका भी नहीं हो सकता। लेकिन, हम यहां किसानों की उन मांगों की बात करेंगे, जिसे स्वीकार करने में दिक्कत आ सकती है।
आंदोलनकारी किसानों की सबसे पहली मांग सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी देना है, जैसा कि डॉ स्वामीनाथ आयोग ने वर्षों पहले सुझाया था।

आंदोलनकारियों को खुश करने के लिए सरकार कहां से लाएगी पैसे?
इन बातों की जानकारी रखने वाले सरकारी अधिकारियों की मानें तो इस मांग को मानना संभव नहीं है। इसे एक उदाहरण की मदद से समझा जा सकता है।
वित्त वर्ष 2020 में देश के कुल कृषि उत्पादों का अनुमानित मूल्य 40 लाख करोड़ रुपए का था। जबकि, एमएसपी के तहत खरीदे जाने वाले 24 फसलों का बाजार मूल्य अनुमानित 10 लाख करोड़ रुपए था।
वहीं साल 2023-24 में केंद्र सरकार का कुल खर्च 45 लाख करोड़ का रहा। अगर इस हिसाब से कुल कृषि उत्पादों की खरीद एमएसपी पर करने के लिए जनता का खजाना खोल दिया जाए, तो भारत जैसे दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यस्था में सरकार के पास अन्य विकास कार्यों और सामाजिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कोई पैसे ही नहीं बचेंगे।
मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 की सरकार ने भी इसी वजह से 2010 में इसे ठुकरा दिया था।
सी2+50% क्या है?
आंदोलनकारियों की मांग एमएसपी तय करने के लिए फॉर्मूला सी2+50% लागू करने की है। इस फार्मूले के तहत सभी तरह की लागत को जोड़ना है, जैसे कि खेती में लगाई गई सभी तरह की पूंजी की लागत और किसानों की अपनी जमीन का किराया भी जोड़ने की मांग हो रही है।
एमसीपी पर कानूनी गारंटी के अलावा ये भी हैं आंदोलनकारियों की मांग
आंदोलनकारियों की एक मांग ये भी है कि उन्हें सरकार पूरी तरह से कर्ज मुक्त कर दे। इसी तरह से वे बिजली की कीमतों में किसी तरह की बढ़ोतरी न होने और नई इलेक्ट्रिसिटी बिल के तहत स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता खत्म करने की भी मांग कर रहे हैं।
खेती से लेकर घरेलू इस्तेमाल और दुकानों तक में 300 यूनिट फ्री बिजली देने की भी मांग आंदोलनकारियों की ओर से की जा रही है।
पेंशन देने की भी मांग कर रहे हैं आंदोलनकारी
आंदोलनकारियों की ओर से किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए पेंशन देने की भी मांग उठाई गई है। साथ ही साथ मनरेगा (MNREGA) के तहत 100 दिनों के न्यूनतम रोजगार की गारंटी को भी 200 दिन करने की मांग हो रही है और इसके लिए दैनिक वेतन बढ़ाकर 700 रुपए करने की वकालत की जा रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी 26,000 रुपए करना भी आंदोलनकारियों की मांग का हिस्सा है।
संपत्ति कर और उत्तराधिकार कर बहाल करने की भी मांग
वह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण का विरोध भी कर रहे हैं। संपत्ति कर और उत्तराधिकार कर फिर से बहाल किए जाने की भी मांग हो रही है।
आंदोलनकारी किसान नेताओं की मांग ये भी है कि भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) से निकल जाए और सभी मुक्त व्यापार समझौतों पर प्रतिबंध लगा दे। इनमें से ज्यादातर मांगें ऐसी हैं, जिसके लिए तैयार होने में केंद्र सरकार को दिक्कत हो सकती है।
आंदोलनकारियों की कुछ मांगों पर निकल सकता है बीच का रास्ता
अलबत्ता किसानों की कुछ ऐसी मांगें है, जिनपर सरकार जरूर विचार कर सकती है। जैसे कि भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों की लिखित सहमति ली जा सकती है। लेकिन, जब देश की सुरक्षा और बहुत व्यापक जनहित की बात आएगी तो उसके लिए अपपाद का प्रावधान रखना पड़ेगा।
मुआवजे और सरकार नौकरी की भी मांग कर रहे हैं प्रदर्शनकारी
पिछले आंदोलन के दौरान जिन किसानों की किसी वजह से मौत हो गई थी, किसान उनके लिए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी की भी मांग कर रहे हैं। लखीमपुर खीरी कांड के साजिशकर्ताओं को भी सजा दिलाने की मांग कर रहे हैं और यह प्रक्रिया संभवत: चल भी रही है।
किसानों की कुछ मांगों कार्रवाई की आवश्यकता
किसानों की कुछ मांगें ऐसी हैं, जिसपर सरकार को निश्चित रूप से गंभीरता से कार्रवाई करने की जरूरत है। जैसे कि नकली बीज और कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों पर कार्रवाई की मांग।
इसी तरह से किसान मीर्च और हल्दी जैसे मसालों के लिए अलग राष्ट्रीय आयोग बनाने की मांग कर रहे हैं, सरकार इसपर भी राजी हो सकती है।
आंदोलकारियों की मांगों में आदिवासियों की जमीन पर कॉर्पोरेट कंपनियों के कथित कब्जे का भी विरोध शामिल है और यह आदिवासियों के अधिकारियों में शामिल है, इसलिए सरकार की ओर से इसपर आपत्ति जताने की कोई वजह भी नहीं लगती।












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