Wayanad: 37 साल पहले पिता ने तोड़ा था पुलिस का सपना, अब वायनाड त्रासदी में 'देवदूत' बनीं आंगनवाड़ी शिक्षक
Kerala Wayanad Landslide: केरल के वायनाड में आधी रात भारी बारिश के बाद 30 जुलाई को आई लैंडस्लाइड से भारी तबाही की चीखें अभी भी गूंज रही हैं। लैंडस्लाइड की चपेट में आकर मौत की आगोश में जाने वालों की संख्या 365 पहुंच गई है। इनमें 30 मासूम बच्चे भी शामिल हैं। हादसे के 7वें दिन भी आज सोमवार (5 अगस्त) को सर्च ऑपरेशन जारी है।
वायनाड लैंडस्लाइड के बाद अभी भी 206 लोग लापता हैं। जिनकी तलाश की जा रही है। हजारों लोग बेघर हो गए हैं। कितने परिवार उजड़े गए हैं, जबकि कितनों को अपनों के मिलने का इंतजार है। इन सब के बीच एक आंगनवाड़ी शिक्षक के काम और उनकी दिलेरी को हर तरफ सलाम किया जा रहा है।

इकलौती महिला स्वयंसेवक
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपि रिपोर्ट के मुताबिक आंगनवाड़ी शिक्षक एकमात्र महिला स्वयंसेवक के तौर पर पुलिस बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शवों को मलबे से निकालने और लाने-ले जाने में युद्धस्तर पर जुटी रहीं।
उनके इस काम को प्रेरणा उनके अधूरे सपने से मिली, जो कभी उनके पिता ने पूरा नहीं होने दिया। दरअसल, विजयकुमारी एन एस, जिन्होंने कभी पुलिस बनने का सपना देखा था, लेकिन पिता के विरोध के बाद वो पूरा ना हो सका और वो फिर आंगनवाड़ी टीचर बन गईं।

पिता ने तोड़ा था पुलिस का सपना
रिपोर्ट के मुताबिक 37 साल पहले विजयकुमारी एन एस ने पुलिस बल बनने का सपना देखा था, और उसे पूरा भी किया, लेकिन आखिर वक्त में उनके पिता ने पुलिस भर्ती का ऑफर लेटर फाड़ फेंक दिया, जिसके बाद वो सपना अधूरा ही रह गया।
हालांकि जब वायनाड में भयकंर तबाही मची तो विजयकुमारी को अपने अधूरे और टूटे हुए सपने से ऐसी प्रेरणा मिली कि उन्होंने लोगों को बचाने और रेस्क्यू ऑपरेशन में अपनी भागीदारी के लिए मिशन शुरू कर दिया।
फ्रंटलाइन में आकर मदद में जुटी
वायनाड आपदा के बाद विजयकुमारी घटनास्थल पर पहुंचने वाली पहली नागरिक महिला बचावकर्ता बनकर और बरामद शवों को ले जाने में अग्निशमन बल सहित एजेंसियों की मदद करके फ्रंटलाइन में आकर सेवा करने की अपनी इच्छा को पूरा किया।
4 बजे बजी फोन की घंटी, और फिर...
57 वर्षीय विजयकुमारी मुप्पयनाड पंचायत में आंगनवाड़ी शिक्षिका है, जिनको मंगलवार (30 जुलाई) को सुबह 4 बजे एक फोन आया, जिसमें मुंदक्कई में भूस्खलन की सूचना दी गई और वह भारी बारिश के बीच स्कूटर से आपदा स्थल के लिए रवाना हुईं और सुबह 5 बजे चूरलमाला पहुंचीं तो देखा कि शहर कीचड़ और कीचड़ का ढेर बन गया है।

बिना थके किया काम
बिना रुके विजयकुमारी ने आधिकारिक बचाव एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया। पूरे दिन, उन्होंने मृतकों की बरामदगी और परिवहन में सहायता की और रात 8 बजे तक लगभग 17 शवों को निकालने में सहायता की। उन्होंने वहां अधिकारियों को बताया कि वो प्रशिक्षित सिविल डिफेंस स्वयंसेवक हैं, जो कि काफी मददगार साबित हुई।
'मैं रात 8 बजे तक वहां रही और...'
विजयकुमारी ने बताया, "मैं स्थानीय लोगों को बचाव कार्य करते हुए देख सकती थी, लेकिन कोई भी नागरिक महिला बचावकर्मी वहां नहीं थी। हालांकि यह दृश्य बहुत परेशान करने वाला था, लेकिन मुझे लगा कि यह एक ऐसा क्षण था, जब मुझे एक महिला होने के नाते पीछे नहीं रहना चाहिए, खासकर जब मैं इतनी बड़ी आपदा का सामना कर रही थी। इसलिए, मैं भी बचाव प्रयासों में शामिल हो गई और दिन के दौरान विभिन्न आधिकारिक एजेंसियों के बचावकर्मियों के साथ रास्ते पर चली और शवों को निकालने में मदद की। मैं रात 8 बजे तक वहां रही और लगभग 17 शवों को लाने में मदद की।"
मैं लंबे समय से समाज सेवा में सक्रिय
अगले दो दिनों के दौरान विजयकुमारी ने मेप्पाडी जीएचएसएस में स्थापित अस्थायी मुर्दाघर में काम करने के लिए स्वेच्छा से काम किया, जहां नीलांबुर से लाए गए शव रखे गए थे। इस दौरान विजयकुमारी ने कहा, "एक महिला होने के कारण मुझे जरा भी असुरक्षित महसूस नहीं हुआ। मैं लंबे समय से समाज सेवा में सक्रिय रही हूं।"












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