Governor Vs governments: केरल में अबकी बार आर या पार? सुप्रीम कोर्ट पर अटकी नजर
दिल्ली के बाद केरल के राज्यपाल और राज्य की एलडीएफ सरकार का विवाद भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने वाला है। दिल्ली में उपराज्यपाल और आम आदमी पार्टी की सरकार के बीच तकरार का एक हल तो निकला है, लेकिन यह भी स्थायी है, यह कहना अभी जल्दबाजी है। लेकिन, ऐसे सिर्फ दो ही मामले नहीं हैं। ज्यादातर राज्यों में जहां बीजेपी-विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं, वहा भिड़ंत की स्थिति बनी हुई है।
गवर्नर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी केरल सरकार
केरल सरकार ने बुधवार को फैसला किया है कि वह राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। एलडीएफ की पिनराई विजयन सरकार का आरोप है कि राजभवन बिना वजह के राज्य विधानसभा से पारित कई कानूनों को लटकाए हुए है।

केरल के गवर्नर पर जानबूझकर बिल लटाए रखने का आरोप
केरल की लेफ्ट डेमोक्रैटिक फ्रंट की सरकार का आरोप है कि गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान विधानसभा से पास कई कानूनों पर हस्ताक्षर नहीं करके जनता की इच्छा का सम्मान तो नहीं ही कर रहे हैं, उनका कार्य असंवैधानिक और संसदीय लोकतंत्र की भावना के भी खिलाफ है। कम्युनिस्ट सरकार के मुताबिक मोहम्मद खान का इस तरह का बर्ताव पिछले करीब डेढ़ साल से चल रहा है।
केरल सरकार का दावा है कि अपने विवेकाधीन शक्तियों के नाम पर राजभवन बिना वजह विधानसभा से पारित कई विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए रोकना चाहता है, लिहाजा उसके पास अदालत में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
केरल सरकार के फैसले पर गवर्नर का पलटवार
राज्य सरकार ने पहले इस मसले पर वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन की राय ली थी। अब वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल को सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए तैयार किया है। उधर गवर्नर खान ने इन मामलों को लेकर कानूनी सलाह के लिए राज्य सरकार पर 40 लाख रुपए खर्च करने का आरोप लगाते हुए उसकी आलोचना की है।
गवर्नर खान का कहना है कि खासकर जब सरकार वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रही है, कर्मचारियों को वेतन देने में दिक्कत आ रही है, ऐसे में कानूनी मसलों के नाम पर इतने पैसे खर्च करना कहां तक उचित है। उन्होंने मीडिया पर भी सवाल उठाया है कि वह सरकार के कार्यों की छानबीन से तो परहेज करते हैं, लेकिन उनसे सवाल पूछना ज्यादा पसंद करते हैं।
इन राज्यों में भी टकराते रहे हैं राजभवन और राज्य सरकार
राजभवन और राज्य सरकारों में पिछले कुछ वर्षों से शुरू हुआ यह विवाद सिर्फ केरल और दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और तमिलनाडु से भी इस तरह की बातें आए दिन सुनाई पड़ती हैं। पंजाब और झारखंड में भी कई मौकों पर सरकार और राज्यपाल के बीच में टकराव की नौबत आते देखी गई है।
महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही बदल गया सीन
पिछले साल जून तक महाराष्ट्र तो इस मामले में सियासी अखाड़े का केंद्र बना हुआ था। तत्कालीन उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महा विकास अघाड़ी सरकार और उस समय के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के बीच का लफड़ा तो कई बार अप्रिय मोड़ ले चुका था। लेकिन, जबसे वहां सरकार बदली है, इस तरह का सीन बीते जमाने की बात हो चुकी है।
कुछ विपक्षी राज्यों में अलग दिखती है परिस्थिति
वैसे कई और विपक्षी दलों की शासित राज्य सरकारें हैं, लेकिन वहां शायद ही कभी इस तरह के टकराव सुनाई पड़ते हैं। इनमें ओडिशा और आंध्र प्रदेश भी शामिल है। राजस्थान में जब अशोक गहलोत सरकार के मौजूदा कार्यकाल के दौरान सचिन पायलट का विवाद चल रहा था, तो उस समय भी राजभवन को लेकर विवाद देखने को मिला था।
बिहार में आमतौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजभवन से अच्छे रिश्ते रहते हैं, चाहे गवर्नर कोई भी हो। लेकिन, जब भी वह पाला बदलकर बीजेपी से दूर होते हैं तो कभी-कभार ही सही ऐसी स्थितियां पैदा होती देखी गई हैं।
इस तरह के विवाद का स्थायी समाधान क्या?
संविधान में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है और वह एक केंद्र शासित प्रदेश है। जब सेवा मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी की सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया तो लगा कि शायद इस तरह के विवाद का अब अंत हो चुका है। लेकिन, फिर केंद्र सरकार ने पहले अध्यादेश से फिर कानून बनाकर उसे पलट दिया। फिलहाल के लिए विवाद तो है, लेकिन टकराव की स्थिति टली हुई लग रही है। अब केरल का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच रहा है, जहां से यह स्थिति साफ हो सकती है कि इस तरह के संवैधानिक टकराव का स्थायी हल आखिर क्या है?












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