Arun Yogiraj: केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा बनाने वाले MBA ग्रेजुएट से जुड़ी खास बातें जानिए
मैसुरु, 5 नवंबर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज केदारनाथ धाम में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण किया है। केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की समाधि 2013 की कुदरती त्रासदी में तबाह हो गई थी। उनकी प्रतिमा को कर्नाटक के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बनाया है, जिनका परिवार पांच पीढ़ियों से मूर्तिकला से जुड़ा हुआ है और मैसुरु के वाडियार घराने के लिए एक से बढ़कर एक मूर्तियां बनाने के लिए मशहूर है। योगीराज खुद एमबीए ग्रेजुएट हैं, लेकिन उन्होंने कुछ वर्षों तक प्राइवेट फर्म के लिए काम करने के बाद अपना पुश्तैनी पेशा अपना लिया है। उन्होंने बताया है कि उनका यह प्रोजेक्ट कितना चुनौतीपूर्ण था।

'आदि शंकराचार्य की मूर्ति बनाना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी'
कर्नाटक के मैसुरु के रहने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज केदारनाथ में स्थापित हुई आदि शंकराचार्य की प्रतिमा बनाकर बहुत ही खुश हैं। उन्होंने कहा है, 'केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की मूर्ति बनाना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। मैं बहुत ही खुश हूं कि पीएम मोदी ने इस प्रतिमा को भारत के लोगों को समर्पित किया है। इस मूर्ति के निर्माण के लिए हमने 9 महीने तक हर दिन 14 से 15 घंटे काम किया।' योगीराज की खुशी की वजह भी है। क्योंकि, भारतीय संस्कृति में आदि शंकराचार्य का अपना एक विशेष स्थान है।
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आदि शंकराचार्य की प्रतिमा बनाने वाले मूर्तिकार कौन हैं ?
37 साल के अरुण योगीराज का पत्थरों से नाता उनके जन्म के समय से ही है। क्योंकि, वह अपने परिवार की पांचवीं पीढ़ी के मूर्तिकार हैं। इनके दादा बी बसावन्ना शिल्पी को वाडियार घराने के महलों की शिल्पकाला के लिए जाना जाता है। इनके परिवार को महलों के अंदर स्थापित मंदिरों की शिल्पकला के निर्माण से पहचान मिली हुई है। गायत्री और भुवनेश्वरी मंदिरों के निर्माण के लिए भी इन्हें जाना जाता है। यही वजह है कि बचपन में जब योगीराज के साथी खेलते रहते थे, उन्होंने पत्थरों के साथ अपना समय बिताना पसंद किया। अरुण कहते हैं, 'मेरे पिता और दादा हर पत्थर को जिंदा रखना चाहते थे। पत्थरों पर उनकी हर चोट ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उन्होंने मुझे एक सुंदर मूर्ति के रूप में उकेरा। तो घर ही मेरा पहला स्कूल बन गया.....'

कैसे सेलेक्ट हुआ मूर्ति का मॉडल ?
मूर्तिकला से जुड़े होने का मतलब ये नहीं है कि अरुण योगीराज ने कभी दूसरे करियर की ओर ध्यान नहीं दिया। वह एमबीए ग्रेजुएट हैं। 2008 तक प्राइवेट फर्म में काम करते थे, लेकिन फिर उन्होंने इस्तीफा देकर हमेशा के लिए परिवार की विरासत संभालने के लिए छेनी थाम लिया। आदि शंकराचार्य की मूर्ति का प्रोजेक्ट जिंदल स्टील के पास था, जिसने अरुण और उनके पिता से इसके लिए संपर्क किया था। अरुण के मुताबिक, 'उन्हें 3डी मॉडल फोटोग्राफ दिया गया, लेकिन वो खुश नहीं थे। मैंने अपना खुद का मॉडल बनाया, 2 फीट का एक प्रोटोटाइप जिसे दूसरी मूर्तियों के साथ पीएम मोदी को भेजा गया। मेरे मॉडल को सेलेक्ट किया गया। '

आदि शंकराचार्य की प्रतिमा की विशेषता
करीब 13 फीट ऊंची और 28 टन वजन वाली आदि शंकराचार्य की प्रतिमा एक खास तरह के एक ही चट्टान से तराशकर बनाई गई है, जो हर मौसम की मार झेलने की चट्टानी ताकत रखता है। इसे कर्नाटक के मैसुरु से केदारनाथ तक 2,000 किलोमीटर से भी दूर ले जाकर स्थापित किया गया है। आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ में ही समाधि ली थी। अरुण का मॉडल श्रीचक्र (पूजा, भक्ति और ध्यान के लिए उपयोग की जाने वाले) पर है, जिसपर शंकराचार्य विराजमान हैं। इसपर 2020 के अगस्त में काम शुरू किया गया था। योगीराज की खुशी का तब और भी ठिकाना नहीं रहता, यदि उनके पिता बसवन्ना शिल्पी आज जीवित होते। दो हफ्ते पहले ही उनका निधन हुआ है और तबतक वह अपने बेटे से प्रतिमा निर्माण के बारे में यही कहते रहे थे, 'चट्टान तक तुम्हारी आवाज पहुंचनी चाहिए, तभी एक बढ़िया मूर्ति बन सकती है।'

शं करोति सः शंकरः- पीएम मोदी
आदि शंकराचार्य की मूर्ति का निर्माण शिल्पकार के लिए यूं ही चुनौतिपूर्ण नहीं था। क्योंकि, इसका जिक्र करते हुए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, "शंकर का संस्कृत में अर्थ है- 'शं करोति सः शंकरः' यानी, जो कल्याण करे, वही शंकर है। इस व्याकरण को भी आचार्य शंकर ने प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दिया। उनका पूरा जीवन जितना असाधारण था, उतना ही वो जन-साधारण के कल्याण के लिए समर्पित थे...." इसलिए उनकी प्रतिमा के लिए सिर्फ पत्थर नहीं तराशना था, उसमें उनका यह भाव भी डालना था।












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