Karnataka Elections: लिंगायत समुदाय को ज्यादा टिकट देकर भाजपा को कैसे मात दे सकती है कांग्रेस, जानिए?
कर्नाटक चुनाव: लिंगायत समुदाय हर बार कर्नाटक चुनाव के समय सुर्खियों में रहता है। आइए जानते हैं कांग्रेस कैसे इस समुदाय के उम्मीदवारों को अधिक संख्या में टिकट देकर भाजपा को मात देने में कामयाब हो सकती है?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां जोरों पर है। राजनीतिक दल जातिगत समीकरण के आधार पर टिकटों का बंटवारा करने की कवायद शुरू कर चुके हैं। कांग्रेस पार्टी जो कर्नाटक राज्य में सत्ता वापसी करने के लिए आतुर है उसने अपने दो अहम नेताओं डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया को शामिल करते हुए अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है। वहीं भाजपा भी अपने उम्मीदवारों की लिस्ट अब कभी भी जारी कर सकती है।

कांग्रेस की 124 उम्मीदवारों की लिस्ट बनी live-saver
याद रहे अब जब कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं उसके ठीक पहले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को सूरत की कोर्ट द्वारा उनके एक बयान के कारण दो साल की सजा सुनाई और केरल के वायनाड निर्वाचन क्षेत्र से सांसद के रूप में उनकी अयोग्यता के बाद अस्तित्व संकट में है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के द्वारा शनिवार को जारी की गई 124 उम्मीदवारों
की लिस्ट को चुनाव से पहले live-saver के तौर पर देखा जा रहा है।

कांग्रेस ने लिंगायत उम्मीदवारों को दी तबज्जों
इसकी वजह है कि कांग्रेस ने अपनी पहली सूची में कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से कम से कम 28 उम्मीदवार शामिल किए हैं, जिनकी वोटर के तौर पर बड़ी जनसंख्या है और वो कर्नाटक की राजनीति में काफी प्रभाव रखते हैं। कांग्रेस के उम्मीदवारों की लिस्ट में सात पंचमशाली लिंगायत उम्मीदवार, पांच रेड्डी लिंगायत सदस्य, तीन सदर लिंगायत, तीन वीरशैव लिंगायत, चार लिंगायत (अन्य), तीन बंजीगा लिंगायत, दो गनिगा लिंगायत और एक नोनाबा लिंगायत के अलावा 22 वोक्कालिगा उम्मीदवार शामिल हैं।

चुनावों के लिए लिंगायत क्यों महत्वपूर्ण हैं
लिंगायत और वीरशैव इसलिए चुनावों में बहुत अहम हो जाता है क्योंकि इनका कर्नाटक की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा हैं और माना जाता है कि उन्होंने पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट दिया है। अधिक लिंगायत उम्मीदवारों को शामिल करके, कांग्रेस 224 सदस्यीय विधानसभा में कम से कम 150 सीटें जीतने के अपने लक्ष्य को पूरा करना चाहती है।
भाजपा के कोर वोटरोंं में क्या सेंध लगा पाएगी कांग्रेस?
लिंगायत/वीरशैव 224 विधानसभा सीटों में से लगभग 100 में काफी संख्या में हैं जो ज्यादातर उत्तरी कर्नाटक से संबंधित हैं। कर्नाटक में इसी समुदाय से अब तक नौ मुख्यमंत्री हुए हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो उसके पास लिंगायत समुदाय से दो बड़े चेहरे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदिुरप्पा और वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई। जिनकी लिंंगायत समाज में मजबूत पैठ है। ऐसे में अधिक संख्या में कांग्रेस लिंगायत उम्मीदवारों को उतारकर भाजपा के कोर वोटरों में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है
बीजेपी ने चुनाव से पहले खेला है ये मास्टर स्ट्रोक
याद रहे लिंगायत समुदाय को भाजपा ने लुभाना शुरू कर दिया है। सीएम बसरवराज बोम्मई जो कि स्वयं भी लिंगायत समाज से ताल्लुक रखते हैं उननकी सरकार ने मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को खत्म करने का फैसला करके उस आराक्षण का लाभ लिंगायत समुदाय को देने का ऐलान किया है। वहीं लिंगायत समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांग पर विचार करते हुए, सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि मुसलमानों का 4 प्रतिशत कोटा अब वोक्कालिगा (2 प्रतिशत) और लिंगायत (2 प्रतिशत) को दिया जाएगा, जिनके लिए 2सी और 2डी की दो नई आरक्षण श्रेणियां थीं। पिछले साल बेलागवी विधानसभा सत्र के दौरान बनाया गया था।
मुसलमानों को ईडब्लूएस की श्रेणी में लाया जाएगा
मुसलमानों का आरक्षण खत्म करके उन्हें अब 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) श्रेणी में ले जाया जाएगा। इस फेरबदल के साथ, मुसलमानों को अब ईडब्ल्यूएस कोटे से मुकाबला करना होगा, जिसमें ब्राह्मण, वैश्य, मुदलियार, जैन और अन्य शामिल हैं।
कांग्रेस के सिद्धारमैया ने लिंगायत समुदाय से किया था ये वादा
वहीं बात अगर कांग्रेस की जाए तो पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने 2018 में केंद्र से सिफारिश करने की घोषणा की थी कि लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए। याद रहे कर्नाटक के पूर्व सीएम सीएम सिद्धारमैया जो वर्तमान में बागलकोट जिले में बादामी का प्रतिनिधित्व करते हैं उन्होंने कोलार से चुनाव लड़ने की जिद छोड़कर अब अपने गृह जनपद वरुणा से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। वरुणा का प्रतिनिधित्व वर्तमान समय में उनके बेटे डॉ यतींद्र सिद्धारमैया कर रहे हैं।
कौन हैं लिंगायत
12वीं सदी के दार्शनिक, कवि और समाज सुधारक बासवन्ना को बड़े पैमाने पर लिंगायतवाद की स्थापना की थी। लिंगायत शब्द की उत्पत्ति कन्नड़ शब्द "लिंगवंत" से हुई है और इसका शाब्दिक अर्थ है वह जो ईश्वरलिंग धारण करता है, (निराकार भगवान)। ईश्वरलिंग एक अंडाकार आकार के प्रतीक के रूप में होता है जिसे गले में पहना जाता है। लिंगायत शिव के उपासक हैं।
लिंगायत और वीरशैव
बासवन्ना का लिंगायतवाद, जो भक्ति आंदोलन के दौरान बढ़ा। जिन्होंने जाति पदानुक्रम और पवित्र धागा पहनने जैसे हिंदू अनुष्ठानों को खारिज कर दिया। वीरशैव शिव के उपासक हैं और बासवन्ना से पहले के हैं। वीरशैववाद वेदों से आता है, और उपासक संप्रदाय के पांच पीठों या पवित्र केंद्रों - रंभपुरी, उज्जयिनी, केदार, श्रीशैल और काशी का पालन करते हैं। वीरशैववाद के अनुयायी बड़े पैमाने पर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में केंद्रित हैं।
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