Karnataka election: कर्नाटक में दलित वोटों को मजबूत करने के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे पर निर्भर है कांग्रेस
Karnataka election: कर्नाटक में दलित वोटों को लेकर कांग्रेस आशान्वित हैं। दलित वोट कांग्रेस के खाते में आएं इसके लिए मल्लिकार्जुन खड़गे से पार्टी उम्मीद लगाई बैठी है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 में जीत हासिल करने के लिए भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। मतदान 10 मई को होगा, ऐसे में अब जब कि चुनाव प्रचार के लिए राजनीतिक दलों के पास कुछ ही दिन शेष बचे हैं ऐसे में पार्टियां चुनाव प्रचार में जमकर जुटी हुई हैं। वहीं इस चुनाव में अन्य सभी समुदायों के साथ कांग्रेस दलितों के वोटों को हासिल करने की उम्मीद कर रही है। इसके पीछे के दो खास वजह है कि कांग्रेस इस चुनाव में दलितों के वोटों को लेकर ज्यादा आशान्वित है।
इनकी है 17.5 प्रतिशत आबादी
बता दें कर्नाटक में दलित आबादी कर्नाटक की आबादी का 17.5 प्रतिशत है, जो किसी भी राजनीतिक दल के लि बहुमत हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं कांग्रेस हाल की उन कौन सी दो घटनाओं के बाद दलितों के वोटों को लेकर अधिक आशान्वित है।
खड़गे को लेकर कांग्रेस को बंधी है उम्मीद
पहली वजह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे की पदोन्नति, जो कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पद पर नियुक्त होने वाले जगजीवन राम के बाद केवल दूसरे नेता हैं। खड़गे दलित हैं और कर्नाटक से ही ताल्लुक रखते हैं। वहीं भाजपा के पारंपरिक समर्थकों के बीच आंतरिक आरक्षण की योजना के कार्यान्वयन को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।
वहीं दूसरी वजह जिसके कारण कांग्रेस को विश्वास हुआ है क्योंकि दलित संघर्ष समिति (डीएसएस) के बैनर तले 12 संगठनों ने पहले ही पार्टी को समर्थन दे दिया है।
क्यों है अहम है दलित वोट
दलित वोट इसलिए अहम है क्योंकि पिछले तीन चुनावों बार के विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक आरक्षित सीटें जीतने वाली पार्टी या तो सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
224 निर्वाचन क्षेत्रों में सभी जगहों पर दलित वोट एक बड़ी भूमिका निभाते हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी एससी के लिए आरक्षित 36 निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी संख्या में बेहतर सुधार करने की उम्मीद कर रही है।
2004 और 2008 के बीच आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की संख्या 13 से बढ़कर 22 हो गई, वहीं कांग्रेस की संख्या 2008 में आठ सीटों से बढ़कर 2013 में 17 सीटों पर पहुंच गई, जब उसने बहुमत हासिल किया। 2018 चुनाव में जब भाजपा सबसे अधिक सीटें जीती थी तो उसकी आरक्षित सीट की संख्या बढ़कर 16 हो गई। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार दलितों के बीच कांग्रेस का मजबूत समर्थन आधार पिछले एक दशक में विभिन्न कारकों के कारण सिकुड़ गया है।
बड़ा वर्ग क्यों है नाराज
दलित समुदाय के एक बड़े वर्ग में भी स्पष्ट गुस्सा है क्योंकि उनका मानना है कि पार्टी केवल उनके कल्याण के लिए जुबानी सेवा करती है, लेकिन दलित को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने जैसा कुछ भी ठोस नहीं करती है। वहीं जानकारों का मानना है कि मल्लिकार्जुन खड़गे खुद कई बार सीएम बनने से चूक चुके हैं, हालांकि खड़गे ने खुले तौर पर दलित कार्ड खेलने से परहेज करते नजर आए हैं।
जानिए कर्नाटक में क्या है दलित वोटरों की गणित
आंतरिक आरक्षण को लेकर दलितों के वामपंथी और दक्षिणपंथी संप्रदायों के बीच दरार है जिसकी कमी ने भी कांग्रेस को अलग कर दिया।
कर्नाटक में एससी के 101 उप-संप्रदायों को मोटे तौर पर चार श्रेणियों में बंटी हैं
जिनमें वामपंथी (एलएच) जो पूर्व उप प्रधान मंत्री बाबू जगजीवनराम के साथ पहचान रखते हैं।
दक्षिणपंथी (आरएच) जिसमें बीआर अंबेडकर और बौद्ध धर्म से संबंधित हैं ।
अन्य एससी, और स्पृश्य , एलएच और आरएच जातियां मिलकर समुदाय का 65 फीसदी हिस्सा हैं।
लांबनी (बंजारा) और भोवी जैसी जातियों के नेतृत्व में अस्पृश्य समूह, जो दलित आबादी का 23% से अधिक हिस्सा हैं, उनकी सरकार द्वारा केंद्र को दलितों के लिए आंतरिक कोटे को विभाजित करने का प्रस्ताव भेजे जाने के बाद अब वे भाजपा के खिलाफ हैं।
बता दें एलएच जातियों के लिए 6%, आरएच जातियों के लिए 5.5%, स्पृश्यों के लिए 4.5% और बाकी के लिए 1% आरक्षण हैं।
क्यों कांग्रेस को है इस बार अधिक दलित वोट मिलने की उम्मीद
कांग्रेस के पदाधिकारियों का तर्क है कि आंतरिक आरक्षण पर निर्णय के बाद आरएच जातियां, जो पहले से ही कांग्रेस समर्थक मानी जाती हैं वो इस बार और मजबूती से एकजुट होंगी। चूंकि वे आंतरिक आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, इसलिए उसे अछूत जाति के वोट भी मिलने की उम्मीद है।












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