आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को टिकट क्यों देती हैं पार्टियां? कर्नाटक में दिलचस्प दलीलें दी गई हैं

कर्नाटक के चुनाव में इस बार कई आपराधिक छवि के लोगों को विधानसभा में पहुंचने का मौका मिला है। लेकिन, उनकी पार्टियों की ओर से उन्हें टिकट देने के लिए जो बहाने बनाए गए हैं, वह दिलचस्प हैं।

candidates with criminal background

कर्नाटक विधानसभा के लिए इस बार चुने गए आधे से ज्यादा एमएलए (55%) के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह हाल तब है जब सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि पार्टियां लिखित में बताएं कि आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट देने की उनकी मजबूरी क्या है। अब राजनीतिक दलों की वह दलीलें सामने आई हैं, जिससे जाहिर होता है कि कैसे सर्वोच्च अदालत के निर्दशों का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।

राजनीतिक दलों ने दी दिलचस्प दलीलें
कर्नाटक विधानसभा के लिए 10 मई को जो चुनाव हुआ है, उसमें आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने के राजनीतिक दलों की ओर से बताए गए कारणों का एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कर्नाटक इलेक्शन वॉच (केईडब्ल्यू) ने विश्लेषण किया है। इसमें पार्टियों की ओर से जो दलीलें दी गई हैं, वह दिलचस्प तो हैं, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कहीं ज्यादा गंभीर भी हैं।

सबसे ज्यादा क्या कारण क्या बताए गए ?
इन गैर-लाभकारी संस्थाओं ने इसके लिए राजनीतिक दलों की ओर से भरे जाने वाले उम्मीदवारों के फॉर्म सी7 की छानबीन की है। इसे भरकर नामांकन के समय चुनाव अधिकारियों को सौंपा जाता है। इसमें राजनीतिक दलों की ओर से आपराधिक छवि के लोगों को टिकट देने के कारण और मामले का विवरण देना होता है। इसमें पार्टियों की ओर से सबसे ज्यादा कारण- 'जाने-माने नेता' और 'लोगों की मांग पर चुने गए सबसे बेहतर प्रत्याशी' बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश क्या है?
2020 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब कोई राजनीतिक दल ऐसे लोगों को टिकट देता है, जिसके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं तो उन्हें निश्चित तौर पर 'फॉर्म सी7' भरना होगा। इसमें आरोपों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताना होगा कि स्वच्छ छवि वाले की जगह ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी क्यों बनाया जा रहा है।

फॉर्म सी7 को छापना भी जरूरी
यही नहीं इस फॉर्म सी7 को अखबारों में, सोशल मीडिया पर और पार्टियों की वेबसाइट पर भी उम्मीदवार के चयन के 48 घंटे के भीतर या नामांकन शुरू होने के पहले दिन से दो हफ्तों के अंदर (ज भी पहले हो) छापना होता है।

बहुत से उम्मीदवारों ने फॉर्म सी7 नहीं छापा
एडीआर ने 8 दलों के 1,001 उम्मीदवारों के रिकॉर्ड की पड़ताल की है। इनमें से 345 ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों का खुलासा किया है। लेकिन, फॉर्म सी7 छापने वाले उम्मीदवारों की संख्या सिर्फ 287 पाई गई। इनमें से करीब 22% के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। उनमें से 191 ने अपनी पार्टियों से फॉर्म सी7 भरने को कहा था।

राजनीतिक दलों ने ऐसी दलीलें भी रखी हैं
फॉर्म सी7 में राजनीतिक दलों की ओर से ऐसे लोगों को टिकट देने के जो और कारण बताए गए, उनमें 'सोशल वर्कर, बहुत ही आसानी से उपलब्ध और जमीन से जुड़ा व्यक्ति' के साथ-साथ 'उम्मीदवार के खिलाफ एफआईआर फर्जी है' शामिल हैं।

राजनीतिक दलों की 10 प्रमुख दलीलों की लिस्ट में 'जमीनी समर्थन वाला दूसरा अन्य उम्मीदवार नहीं' और 'इन्हें बदलने लायक कोई नहीं मिला' जैसी दलीलें भी शामिल हैं। इस तरह से उम्मीदवारों की जीत की संभावना को राजनीतिक दलों ने प्राथमिकता है, जबकि तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उपलब्धियां और योग्यता को तरजीह देने का निर्देश दिया था।

बिना फॉर्म सी7 वालों में बीजेपी के उम्मीदवार सबसे ज्यादा
शोध में यह भी पाया गया है कि ज्यादातर पार्टियों के पास ऐसा कोई सक्रिय वेबसाइट नहीं है, जिसपर इस फॉर्म को पब्लिश किया जा सके। जिन उम्मीदवारों का विश्लेषण किया गया, उनमें बिना फॉर्म सी7 वालों में बीजेपी के उम्मीदवार सबसे ज्यादा हैं। यही नहीं 70% फॉर्म में पार्टी ने एक ही रटा-रटाया कारण बताया है।

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      आम आदमी पार्टी के 90% और बीएसपी के 100% उम्मीदवारों की भी स्थिति यही है। हालांकि, बीजेपी ने तीन ऐसे उम्मीदवारों के लिए भी फॉर्म सी7 भरा है, जिनपर कोई आपराधिक मामला नहीं चल रहा है।

      2018 और 2020 में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और मार्च, 2023 के चुनाव आयोग के आदेश के तहत अगर कोई पार्टी इस तरह की जानकारी देने में नाकाम रहती है तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। लेकिन, शोध में ऐसा एक भी मामला नहीं मिला है, जिसमें किसी पार्टी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई हो।

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