Kalyan Singh: जानिए आखिर क्यों राम मंदिर निर्माण के लिए अहम माने जाते हैं कल्याण सिंह
Kalyan Singh: कल्याण सिंह को हमेशा अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए याद किया जाएगा। जिस तरह से उन्होंने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी उसके लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।

Kalyan Singh: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को हमेशा याद किया जाएगा। कल्याण सिंह का आज के ही दिन 5 जनवरी 1932 को जन्म हुआ था। जिस तरह से कल्याण सिंह ने राम मंदिर निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई उसके लिए वह हमेसा याद किए जाएंगे। कल्याण सिंह राजनीति में आने से पहले अलीगढ़ में आरएसएस के स्वयंसेवक थे। वह एक पेशेवर पहलवान भी थे, अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कल्याण सिंह ने यूपी में बतौर शिक्षक नौकरी हासिल की। यूपी और मध्य प्रदेश में लोध समुदाय के सबसे बड़े नेता के तौर पर भी कल्याण सिंह को याद किया जाता है। यूपी में तकरीबन 4-5 फीसदी लोध समुदाय के वोट हैं, जिसपर कल्याण सिंह का काफी प्रभाव था।

9 बार जीत दर्ज कर बनाया रिकॉर्ड
आपात काल में जब कल्याण सिंह गिरफ्तार हुए तो 21 महीने के बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया। इसके बाद 1997 में जब जनता पार्टी की सरकार यूपी में बनी तो कल्याण सिंह सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। लेकिन 1989 में जब मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुसलमानों की जमकर पैरवी की। ऐसे समय में भाजपा के लिए कल्याण सिंह कद्दावर नेता के तौर पर सामने आए। कल्याण सिंह राम जन्मभूमि के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने एकनाथ यात्रा की आगे से अगुवाई की। कल्याण सिंह ने अतरौली से अपना पहला चुनाव 1967 में जीता और वह 9 बार विधायक चुने गए, सिर्फ एक बार 1980 में उन्हे हार का मुंह देखना पड़ा था।

ढांचा गिरा और दे दिया इस्तीफा
वर्ष 1991 में पहली बार भाजपा ने यूपी में पूर्ण बहुमत हासिल किया और 221 सीटों पर जीत दर्ज की। 23 जून को कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। जिस तरह से 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचा गिराया गया, उसमे कल्याण सिंह की भूमिका काफी अहम थी। बड़ी संख्या में कारसेवक यहां इकट्ठा हुए और विवादित ढांचा गिराने लगे। उस वक्त कल्याण सिंह ने सुरक्षाकर्मियों को निर्देश दिया था कि वह कारसेवकों पर गोली ना चलाए। ढांचा गिरने के तुरंत बाद उन्होंने अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया।

अधिकारियों को साफ निर्देश, कारसेवकों पर ना चले गोली
ढांचा गिरने के बाद एक इंटरव्यू में कल्याण सिंह ने कहा था कि उस दिन जब माहौल बिगड़ने लगा, मुझे अयोध्या के जिलाधिकारी का फोन आया, उन्होंने बताया कि तकरीबन 6 लाख कारसेवक यहां जमा हो गए हैं। सीआरपीएफ के जवान मंदिर परिसर की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन कारसेवकों ने उनका रास्ता रोक दिया। डीएम ने पूछा कि क्या कारसेवकों पर फायरिंग का आदेश दिया जा सकता है। मैंने ऐसा नहीं करने का लिखित आदेश दिया था। अगर उस वक्त फायरिंग होती तो हालात काफी बिगड़ सकते थे। कई लोगों की जान जा सकती थी। कल्याण सिंह ने कहा कि ना सिर्फ अयोध्या बल्कि पूरे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाती। मुझे अपने इस फैसले पर गर्व है, मेरी सरकार भले ही चली गई, लेकिन मैंने कारसेवकों को बचा लिया। मैं यह भी सोचता हूं कि शायद इस विध्वंस से मंदिर निर्माण का रास्ता खुला।

लिब्राहम कमीशन की रिपोर्ट कूड़े में फेंकने के लायक
अहम बात यह है कि बाबरी विध्वंश की जांच को लेकर लिब्राहन कमीशन का गठन किया गया था। लिब्राहन कमीशन ने कल्याण सिंह को इस घटना के लिए दोषी माना था। लिब्राहम कमीशन की रिपोर्ट पर कल्याण सिंह ने कहा था कि जिस रिपोर्ट को तैयार करने में लिब्राहन साहब ने 17 साल ले लिए वह सिर्फ 70 दिन में तैयार हो सकती थी। 17 साल तक पैसा बर्बाद हुआ, 8 करोड़ रुपए खर्च किया गया। इस रिपोर्ट में राजनीति की ज्यादा चर्चा की गई मैं। यही नहीं कल्याण सिंह ने कहा था कि यह रिपोर्ट कूड़ेदान में फेंकने के लायक है। यह कहना कि यह साजिश थी, बल्कि सैकड़ों साल से करोड़ों हिंदुओं की कुचली हुई भावना का स्वत: विस्फोट था, जो 6 दिसंबर 1992 को उस घटना के रूप में सामने आ गया।

ढांचा गिरने पर दिया यह तर्क
हमने सुरक्षा के सारे प्रबंध किए थे। मेरा मानना है कि कई बार सुरक्षा के इंतजाम रखे रह जाते हैं, जो घटना होनी होती है हो जाती है। मैं मजबूत मुख्यमंत्री था इसमे कोई संदेह नहीं है। कल्याण सिंह ने तीन उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति केनेडी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे, लेकिन घटना घटित हो गई। इंदिरा गांधी की सुरक्षा के पक्के इंतजाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। राजीव गांधी की सुरक्षा के पक्के इंतजाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। ऐसे ही 6 दिसंबर को सुरक्षा के पक्के इंतजाम होने के बाद भी घटना घटित हो गई। लिब्राहम साहब ने जो कहा है कि इसके पीछे साजिश हुई है यह नितांत गलत है। मैंने भी सुरक्षा के पक्के इंतजाम किए थे। मैंने अधिकारियों से साफ किया था ढांचे की सुरक्षा के लिए जो इंतजाम करना है कीजिए, लेकिन लाखों कार सेवक मौजूद है, उनपर गोली नहीं चलेगी। अगर मैं गोली चलवा देता तो हजारो लोग मारे जाते, भगदड़ में मारे जाते। फिर भी ढांचा नहीं बचता।

ढाचा गिरने का कोई पश्चाताप नहीं
यही नहीं कल्याण सिंह ने कहा था कि ढांचा नहीं बचा, मुझे इस बात का कोई गम नहीं है। ढांचे के टूटने का ना मुझे कोई खेत है, ना पश्चाताप है और ना ही प्रायश्चित है। ढांचे को गिराना मेरी इच्छा नहीं थी, इच्छा तो राम मंदिर की थी। टूटने के बाद लोग कहते हैं कि यह घटना राष्ट्रीय शर्म की बात है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह राष्ट्रीय शर्म का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय गर्व का विषय है।
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