डॉक्टर कफील खान ने UNHRC को लिखा पत्र, भारत की ये शिकायत की
डॉक्टर कफील खान ने UNHRC को लिखा पत्र, भारत की ये शिकायत की
नई दिल्ली। गोरखपुर के निलंबित बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफील खान और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विवाद अब यूएनएचआरसी में पहुंच चुका है। कफील खान ने अपने ही भारत देश को मानवअधिकारों का उलंघन करने वाला देश बताते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UN Human Rights Commission) को एक लेटर लिखा है। कफील खान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) भारत में असहमति की आवाज को दबाने के लिए और मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए NSA और UAPA जैसे सख्त कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है।

डॉक्टर कफील खान इस आरोप में गए थे जेल
डॉक्टर कफील खान वहीं डाक्टर है जिन्हें पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत लगे आरोपों के बाद जेल से रिहा किया गया है। विरोध प्रदर्शनों में भाग लेते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में दिए गए भाषण के लिए सात महीने के लिए जेल में डाल दिया गया था। उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ आरोपों को खारिज करते हुए उनके भाषण के बारे में कहा था कि यह "घृणा या हिंसा को बढ़ावा देने के किसी भी प्रयास का खुलासा नहीं करता है"। बाद में उन्हें 2 सितंबर को मथुरा जेल से रिहा कर दिया गया।
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संयुक्त राष्ट्र को कफील खान ने दिया धन्यवाद
कफील खान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखने के साथ ही मानवाधिकार रक्षकों को रिहा करने के लिए भारत सरकार को फोन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र को धन्यवाद दिया है। अपने पत्र में खान ने ‘शांतिपूर्ण तरीके से सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने' वाले कार्यकर्ताओं को छोड़ने का आग्रह भारत सरकार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का धन्यवाद दिया खान ने लिखा, ‘मानव अधिकार के रक्षकों के खिलाफ पुलिस शक्तियों का उपयोग करते हुए आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत आरोप लगाए जा रहे हैं। इससे भारत का गरीब और हाशिए पर रहने वाला समुदाय प्रभावित होगा

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने भारत सरकार को पत्र लिखा था।
बता दें संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने 26 जून को संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने भारत सरकार को पत्र लिखा था। मानवाधिकार निकाय ने डाक्टर कफील खान और शर्जील इमाम समेत अन्य लोगों पर लगाए गए 11 मामलों का उल्लेख करते हुए भारत सरकार को लिखा था, ‘मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप, जिनमें से कई गिरफ्तारी के दौरान यातना और दुर्व्यवहार करने के हैं। '

‘मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया
कफील खान ने यूएनएचआरसी को लिखे पत्र में जेल में बिताए दिनों के बारे में भी लिखा है। खान ने लिखा कि , ‘मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया और कई दिनों तक भोजन-पानी से भी वंचित रखा गया और क्षमता से अधिक कैदियों वाली मथुरा जेल में 7 महीने की कैद के दौरान मुझसे अमानवीय व्यवहार भी किया गया। ये मेरा सौभाग्य था कि कोर्ट ने मुझ पर लगाए गए एनएसए और 3 एक्सटेंशन को खारिज कर दिया और मैं रिहा हो गया।

घटनाओं की जांच सीबीआई द्वारा की जानी चाहिए
कफील खान ने संयुक्त राष्ट्र को लिखे पत्र में लिखा है, "मैं चाहता हूं कि इन घटनाओं की जांच सीबीआई द्वारा की जानी चाहिए। खान ने कहा कि उसे सलाखों के पीछे डालने से उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करके मेरी आवाज को दबाने की कोशिश मेरे उत्साह, मेरे उत्साह, मेरे देश के प्रति मेरी प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक मूल्यों को तोड़ने वाली नहीं है। कफील खान ने लिखा "मेरे परिवार को जो कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है वह मुझे अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने और सभी बाधाओं के खिलाफ जीतने के लिए और अधिक दृढ़ बना रहा है।

लड़ाई को जारी रखने की भी अपील की
मानवाधिकार रक्षकों / सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों द्वारा लड़ाई को जारी रखने की भी अपील की। उन्होंने कहा, "हिंसा के लिए किसी भी अपील के अभाव में राजनीतिक असंतोष के खिलाफ कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों / यूएपीए का उपयोग, सभी मामलों में निंदा की जानी चाहिए।"

यूएनएचआरसी को भेजे गए पत्र में गोरखपुर की घटना का भी किया जिक्र
बता दें डॉक्टर कफील खान को पहली बार गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के कारण अगस्त 2017 को नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। अस्पताल में ऑक्सीजन की अनुपलब्धता के कारण कई बच्चों की जान चली गई थी। इस कारण से निलंबित किए गए डॉक्टर कफील को राज्य सेवाओं से राहत नहीं मिली है और इस प्रकार वे कहीं और पैक्टिस नहीं कर सकते हैं। हालांकि कफील का कहना है कि इस मामले में उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है। खान ने यूएनएचआरसी को भेजे गए पत्र में 10 अगस्त, 2017 को गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई बच्चों की जान जाने का भी उल्लेख किया है। उच्च न्यायालय ने 25 अप्रैल, 2018 के अपने आदेश में कहा था कि ‘उसके खिलाफ चिकित्सा लापरवाही का कोई सबूत नहीं मिला और वह ऑक्सीजन की टेंडर प्रक्रिया में भी शामिल नहीं थे।
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