जस्टिस यशवंत वर्मा से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा – इन-हाउस कमिटी के सामने क्यों पेश हुए? जानिए सुनवाई में क्या हुआ
Justice Yashwant Varma Case: कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा की दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार, 28 जुलाई को सुनवाई करेगा। न्यायाधिश वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमिटी की उस रिपोर्ट को चुनौती दी है जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया है। कमिटी की जांच के दायरे, प्रक्रिया और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा भेजी गई महाभियोग की सिफारिश को भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
इस अहम याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ कर रही है। अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने यह आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों पर सफाई देने का उचित अवसर उन्हें नहीं मिला।

उनका कहना है कि जांच समिति ने पूर्व निर्धारित सोच के साथ काम किया और जल्दबाजी में निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Fairness) की अनदेखी की।
Justice Yashwant Varma Case: क्या है पूरा मामला?
पूरा मामला 14 मार्च 2025 को दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना से जुड़ा है। आग बुझाने के लिए पहुँचे दमकल कर्मियों और पुलिसकर्मियों ने वहाँ एक स्टोररूम में से कई करोड़ रुपये की अधजली और जली हुई नकदी बरामद की। यह स्टोररूम न्यायमूर्ति वर्मा या उनके परिजनों के नियंत्रण वाले क्षेत्र में था।
नकदी मिलने के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर जांच के आदेश दिए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समिति बनाई गई, जिसने जांच कर यह निष्कर्ष निकाला कि इतनी बड़ी रकम का पाया जाना और फिर उसका चुपचाप गायब हो जाना बेहद संदेहास्पद और योजनाबद्ध प्रतीत होता है।
समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई के लिए महाभियोग (Impeachment) की सिफारिश की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कई सख्त सवाल खड़े किए। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सवाल किया- "आप जांच समिति के सामने क्यों पेश हुए? क्या आप वहां से अनुकूल आदेश की उम्मीद कर रहे थे?"
कोर्ट ने यह भी पूछा कि अगर इन-हाउस कमिटी की वैधता पर ही सवाल उठाया जा रहा है, तो जस्टिस वर्मा ने पहले ही उस पैनल के समन को चुनौती क्यों नहीं दी? कोर्ट ने तर्क दिया कि यदि वे एक संवैधानिक पदाधिकारी हैं, तो यह कहना उचित नहीं कि उन्हें पूरी प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी या अपील का अधिकार नहीं था। कोर्ट ने यह भी पूछा, "यदि आप समिति के सामने पेश हुए थे, तो आपने उस दौरान अपने सारे तर्क क्यों नहीं रखे?"
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ:
- आप अब क्यों आए हैं? जब रिपोर्ट आ चुकी है और संसद में प्रस्ताव पर विचार की संभावना है?
- ऐसे कई उदाहरण हैं जब जजों ने इन-हाउस कमिटी की कार्यवाही से खुद को दूर रखा है।
- अगर आपको लगता है कि यह मामला राजनीतिक हो चुका है, तो आपने समिति के सामने पेश होकर उसे क्यों मान्यता दी?
कपिल सिब्बल की दलील:
सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल, जो जस्टिस वर्मा की तरफ से पेश हुए, ने कहा कि न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत परिभाषित किया गया है। उन्होंने कहा कि इन-हाउस कमिटी की प्रक्रिया, अगर संसद की शक्तियों में हस्तक्षेप करती है, तो यह 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत का उल्लंघन है।
सिब्बल ने यह भी कहा कि जजों के खिलाफ मीडिया में आरोप, सार्वजनिक आक्रोश और आचरण पर चर्चा संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। महाभियोग एक राजनीतिक प्रक्रिया है, लेकिन वह संसद के भीतर होती है। यहां तो पहले ही राजनीतिक रंग दे दिया गया है।
Justice Varma का बचाव: "मैं साजिश का शिकार"
जस्टिस यशवंत वर्मा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें एक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि-
- जिस स्टोररूम से नकदी बरामद हुई, वह कोई निजी कक्ष नहीं था, बल्कि घरेलू सहायकों द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला साझा स्थान था।
- कोई CCTV फुटेज नहीं है जो उन्हें सीधे इस मामले से जोड़ता हो।
- कोई जब्ती रिपोर्ट या नकदी की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
- नकदी की उत्पत्ति, उसकी मात्रा और उसके गायब होने का कोई ठोस रिकॉर्ड या सबूत मौजूद नहीं है।
- उनका कहना है कि उन्हें जानबूझकर फंसाया जा रहा है और पूरी जांच प्रक्रिया पूर्वग्रहों से ग्रसित थी।
अब तक की कार्रवाई
- समिति की रिपोर्ट को तत्कालीन CJI संजय खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सौंप दिया।
- इसके बाद जस्टिस वर्मा से न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया और उन्हें अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ उन्होंने चुपचाप कार्यभार ग्रहण किया।
- जुलाई में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें उन्होंने समिति की निष्कर्षों और महाभियोग की सिफारिश को असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण बताया।
- मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया, जिसके बाद जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता में नई पीठ गठित की गई।
- इसी बीच, यह मामला अब संसद में भी गर्माया हुआ है। लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है। इस प्रस्ताव पर सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों के 152 सांसदों के हस्ताक्षर हैं।
इससे पहले संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 25 जुलाई को मीडिया से कहा था कि- "यह न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की धारणा से जुड़ा मुद्दा है, जिस पर सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर आगे बढ़ने का निर्णय लिया है। लोकसभा में जल्द ही इस प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा।"
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