Justice S Abdul Nazeer:'धर्म' पर संस्कृत का श्लोक पढ़कर हुए रिटायर, जानें कैसा रहा करियर
अयोध्या विवाद में हिंदुओं के पक्ष में फैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने रिटायर होने के मौके पर एक बहुत ही प्रेरणादायक बात कही है। यह है संस्कृत का श्लोक- धर्मो रक्षति रक्षितः।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस अब्दुल नजीर बुधवार को रिटायर हो गए। इस मौके पर उनकी विदाई के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने संस्कृत के एक श्लोक को पढ़कर जज के तौर पर अपना अंतिम भाषण दिया, जो न्यायपालिका की आने वाली पीढ़ियों तक के लिए नजीर बन सकता है। यह श्लोक है- धर्मो रक्षति रक्षितः। जस्टिस नजीर ने कहा कि यह श्लोक उनके जीवन में बहुत मायने रखता है। गौरतलब है कि जस्टिस नजीर अयोध्या विवाद से लेकर ट्रिपल तलाक तक के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल रहे हैं।

संघर्ष से ही शुरू हुआ जस्टिस एस अब्दुल नजर का जीवन
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के एक दूर-दराज गांव में सामान्य परिवार में जन्मे और सुप्रीम कोर्ट से बुधवार को रिटायर हुए जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर के जीवन की शुरुआत ही संघर्ष से हुआ था। वह स्कूल में ही थे, जब पिता चल बसे। परिवार के सामने चुनौतियों का अंबार था, लेकिन उन्होंने फिर भी किसी तरह से ग्रैजुएशन किया और लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। वहां उनके लॉ टीचर ने कुछ शब्द कहे, जिसे उन्होंने अपने जीवन में अक्षरश: आत्मसात कर लिया। उन्होंने कहा था, 'अगर कोई कानून के पेशे में फिट नहीं हो सकता तो वह किसी में भी नहीं हो सकता।' वे इसे अपने जीवन का मूल मंत्र बना के चले और दो दशकों तक वकालत और फिर हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में जज की भूमिका निभाई। उनका कई ऐतिहासिक फैसलों से उनका नाम जुड़ चुका है, जिसमें अयोध्या का राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद भी शामिल है।

अयोध्या पर फैसला- 'चाहते तो मुसलमानों के हीरो बन सकते थे'
जब नवंबर, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या पर सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया तो जस्टिस एस अब्दुल नजीर से कहा गया कि फैसले को प्रभावित किए बिना वे चाहते तो बाकी जजों से उलट फैसला भी दे सकते थे! ऐसा करके वह अपने समुदाय में हीरो तो बन सकते थे! जस्टिस नजीर ने मुस्कुरा कर इतना भर कहा, 'देश के लिए कुछ भी....' सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि हिंदू पक्षों की हो गई और इसके बदले मुसलमानों को शहर में दूसरी जगह 5 एकड़ का भू-खंड आवंटित किया गया।

ट्रिपल तलाक पर दिए गए फैसले में भी शामिल रहे
हालांकि, अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट में 42 दिनों तक चली सुनवाई के दौरान जस्टिस नजीर ने एक शब्द भी कुछ नहीं कहा, लेकिन सर्वसम्मति वाले ऐतिहासिक फैसले को तैयार करने में उनका रोल बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। इस फैसले की वजह से उनको और उनके परिवार को सुरक्षा का जोखिम भी उठाना पड़ा, लेकिन वे बिना विचलित हुए संविधान की रक्षा की शपथ के अनुसार काम करते रहे। हालांकि, जस्टिस नजीर ने ट्रिपल तलाक केस में बहुमत के फैसले से अलग राय रखा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने मुसलमानों में तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था।

थिएटर की दुनिया में भी जुनूनी रहे हैं जस्टिस नजीर
जस्टिस नजीर ने लॉ करने के बाद पूरे 20 साल तक वकील के तौर पर प्रैक्टिस किया। 2003 में उनकी नियुक्ति कर्नाटक हाई कोर्ट के जज के तौर पर की गई। 14 साल के बाद 2017 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त किया गया। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर उनके विदाई समारोह में CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि, 'जस्टिस नजीर जनता के जज हैं, जिन्हें कानून की हर शाखा में विशेषज्ञता हासिल थी, विशेष रूप से सिविल लॉ में और एक जज के रूप में उनका व्यवहार उत्कृष्ट रहा है।' कानून की दुनिया में इस कदर डूबे रहने के बावजूद थिएटर के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ था। उन्होंने नाटक लिखे, डायलोग लिखे और नाटक को डायरेक्ट भी किया था।

'इस दुनिया में सबकुछ धर्म पर आधारित'
सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर सर्वोच्च अदालत के वकीलों को अपने आखिरी संबोधन में जस्टिस नजीर ने एक बहुत ही प्रसिद्ध संस्कृति श्लोक को कोट किया, जो उनके मुताबिक उनके जीवन में बहुत मायने रखता है- धर्मो रक्षति रक्षितः। इसका अर्थ है- जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा करता है। जस्टिस नजीर बोले- 'इस दुनिया में सबकुछ धर्म पर आधारित है। धर्म उनका नाश कर देता है, जो इसका नाश करते हैं और धर्म उनकी रक्षा करता है, जो इसकी रक्षा करते हैं।'












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