मनमोहन सिंह: काबिल अर्थशास्त्री से कमजोर प्रधानमंत्री बनने के पीछे कौन
नई दिल्ली। नब्बे के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार में अहम योगदान देने वाले मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री के तौर पर अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम पड़ाव पर हैं। उन्हें भले ही भारत के सबसे प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री के तौर पर जाना जाता हो, पर सच तो यह है कि वह प्रधानमंत्री के तौर पर भारत का नेतृत्व नहीं कर सके और अपने कार्यकाल में होने वाले घोटालों को नहीं रोंक सके, जिससे कि उनकी छवि एक कमजोर प्रधानमंत्री की बन गयी है।
जवाहर लाल नेहरू के बाद सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुआ था। उनकी माता का अमृत कौर और पिता गुरूमुख सिंह थे। मां का निधन हो जाने के कारण उनका पालन पोषण दादा-दादी ने किया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अमृतसर के हिंदू कॉलेज में हुई, जिसके बाद स्नातक और परास्नातक की डिग्री उन्होने पंजाब विश्वविद्यालय से ली।

विश्वप्रसिद्ध आक्सफोर्ड और कैंब्रिज में अध्ययन के बाद उन्होने तीन वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र के लिए काम किया। जिसके बाद उन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने के साथ साथ विदेशी व्यापार मंत्रालय के सलाकार के तौर पर अपनी सेवाएं दी। उन्हें सन 1982 में रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया गया। उन्होने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के साथ मिलकर अर्थव्यवस्था के लाइसेंस, कोटा राज को खत्म किया और एफडीआई को आगे बढ़ाया। उन्हीं के नेतृत्व में उदारीकरण की शुरूआत हुई, जिसके परिणाम स्वरूप भारत में एक बड़ा मध्यमवर्ग उभरा। इस दौरान 1993 में हुए सिक्योरिटीज घोटाले में उन्होने वित्तमंत्री पद से इस्तीफा दिया लेकिन इसे नामंजूर कर दिया गया।
1991 में असम से राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उन्होने 1996 में दक्षिणी दिल्ली से लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन वह जीत हासिल नहीं कर सके। सन 2004 में यूपीए के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद उन्हें भारत का प्रधानमंत्री घोषित किया गया लेकिन बतौर प्रधानमंत्री एक के बाद एक घोटालों के संज्ञान में रहते हुए कोई कदम न उठाने पर आम जनता में आज उनकी छवि एक कमजोर प्रधानमंत्री की हो गयी है। यूपीए के आलोचकों का कहना है कि मनमोहन सिंह तो सिर्फ एक चेहरा मात्र हैं, असली ताकत तो यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में है क्योंकि घोटालों और घपलों के बारे में जानकारी होने के बावजूद उन्होने ऐसे कदम नहीं उठाये, जिससे कि उन्हें रोंका जा सकता हो। वहीं सीमा पर पाकिस्तान द्वारा की जा रही कायरतापूर्ण हरकतों के बावजूद वह चुप रहे। पिछले दस वर्षों में भारत ने कई बड़े आतंकी हमलों का सामना किया लेकिन सरकार की निष्क्रियता के कारण आम जनता को अब उनमें कोई उम्मीद नहीं नजर आती है।
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