Joshimath : पहाड़ के मलबे पर बसा शहर जोशीमठ, 46 साल से बज रही थी खतरे की घंटी, क्या डूब जाएगा?
उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ी शहर जोशीमठ में वैसी ही आपदा है, जिसके संकेत दशकों पहले मिलने शुरू हो गए थे। यहां अब 500 से अधिक घरों में आई दरारें डराने लगी हैं।

Joshimath Sinking Hill Town : उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ी शहर पर आई आपदा राष्ट्रीय चिंता का विषय है। यहां अब 600 से अधिक घरों में दरारें आ गई हैं। शहर को बचाने का उपाय करना एक बड़ी चुनौती है। ये शहर अब बचेगा या फिर नदी के तेज बहाव के साथ बह जाएगा। ये एक डर है, जो शहर को निवासियों के मन में बस गया है। हालांकि जोशीमठ के अस्तित्व पर ये खतरा पिछले 46 वर्षों से मंडरा रहा है। इसके संकेत इससे पहले भी मिले थे। वो बात अलग है कि इस बार स्थिति गंभीर है। लेकिन इन सब के बीच बस सवाल एक ही है कि ये शहर बचेगा, या फिर फिर डूब जाएगा। अब जोशीमठ को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?

जोशीमठ कई मायनों में अहम
उत्तराखंड का पहाड़ी शहर जोशीमठ हिमालय की तलहटी में स्थित है। ये शहर कई मायनों में अहम है। ये भगवान बद्रीनाथ का शीतकालीन निवास है। इसके अलावा भारत- चीन सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों के लिए प्रमुख स्थल है। हिमालय की चोटियों पर फतह करन के लिए ये एक आधार शिविर के रुप में है। ये शहर धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों के संगम, विष्णुप्रयाग से एक उच्च ढाल वाली धाराओं को पार करते हुए एक चलती हुई रिज पर स्थित है।

भूस्खलन के मलबे पर बसा है शहर
जोशीमठ का इतिहास बहुत पुराना नहीं कहा जा सकता। ये शहर एक प्राचीन भूस्खलन के मलबे पर स्थापित किया गया था। लेकिन अब इस शहर पर बड़ी आपदा आई है। जो एक राष्ट्रीय चिंता की विषय बन गई है। जोशीमठ नीचे की ओर खिसक रहा है। ऐसे में सड़कों से लेकर घरों तक दरारें देखी जा रही हैं।

603 घरों में आई दरार
जोशीमठ के निवासी सरकार के गुहार लगा रहे हैं। वे शहर को बचाने के ठोस उपाय की मांग कर रहे हैं, जिससे उनके घर और संपत्तियों और पहचान को बचाया जा सके। जोशीमठ के निवासियों का कहना है कि घरों में आई दरारें देखकर डर लग रहा है। वे अपने घरों को गिरने से बचाने के उपाय खोज रहे हैं। जोशीमठ में अब तक 603 घर ऐसे हैं जहां दरारें देखी जा रही हैं। वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि जोशीमठ के हालात पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

निर्माण और जनसंख्या विस्फोट बड़ी वजह
चूंकि जोशीमठ पहाड के भूस्खलन के मलबे पर टिका है। शहर बसने के बाद धीरे- धीरे यहां की जनसंख्या बड़ी और इसके साथ ही घरों की संख्या बढ़ने लगी। ऐसे में भवन निर्माण के कार्यों में तेजी देखी गई। जोकि इस शहर को इस स्तिथि की ओर ढकेलता गया। दबाब बढ़ने के साथ अब शहर नीचे की ओर खिसक रहा है।

मिश्रा आयोग की रिपोर्ट ने किया था आगाह
जोशीमठ को लेकर दशकों पहले ही भूवैज्ञानिक ने सचेत कर दिया था। ऐसी ही एक रिपोर्ट 1976 में आई थी। जिसे सरकार द्वारा नियुक्त मिश्रा आयोग ने प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट के अनुसार जोशीमठ में रहने वालो लोगों के जीवन और संपत्ति के खतरे में होने की आशंका व्यक्त की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ शहर एक प्राचीन भूस्खलन के स्थल पर स्थित है। हाल ही में विशेषज्ञों की एक टीम ने एक सर्वेक्षण किया था। रिपोर्ट में कहा गया कि जोशीमठ के निवासियों के बीच डर है। ये शहर वास्तव में अपने आधार पर डूब रहा है।

कैसे बचाएंगे जोशीमठ?
जोशीमठ को अगर बचाना है तो यहां विकास और पनबिजली परियोजनाओं को पूरी तरह से बंद करना होगा। हालांकि इससे पहले तत्काल यहां के निवासियों को एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करन की जरूरत है। अब जोशीमठ के बदलते भौगोलिक कारकों के आधार पर ही शहर के अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है। एक्पर्ट यही सलाह देते हैं। यहां ड्रेनेज योजना मौजूदा परिस्थिति का सबसे बड़े कारक है। शहर में खराब जल निकासी और सीवर प्रबंधन की भी समस्या है। राज्य सरकार ने सिंचाई विभाग इस पर ध्यान देने और जल निकासी व्यवस्था के लिए एक नई योजना बनाने के लिए कहा है। जोशीमठ को बचाने के लिए बीआरओ जैसे सैन्य संगठनों की सहायता से सरकार और नागरिक निकायों के साथ मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है।
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