झूलन गोस्वामी: जुनून और लगन का दो दशक लंबा सफ़र

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चकदा एक्सप्रेस यानी भारत की दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ी झूलन गोस्वामी लॉर्ड्स पर शनिवार को अपना आख़िरी मैच खेलने जा रही हैं. लेकिन क्रिकेट, जुनून और लगन का ये सफ़र दो दशक से ज़्यादा पुराना है.

ईडन गार्डन्स, भारत में क्रिकेट का मक्का. 29 दिसंबर 1997 के दिन मैदान में काफ़ी उत्साह था. महिला क्रिकेट विश्व कप के फ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला चल रहा था. ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क चारों तरफ़ चौके छक्के लगा रही थीं.

उसी फ़ाइनल मैच में 15 साल की एक भारतीय लड़की भी थी, जो बंगाल के एक गाँव से आई थी और बॉल गर्ल की ड्यूटी पर थी. विश्व कप की चकाचौंध और महिला क्रिकेट के धुरंधरों को देख उस युवा लड़की के आँखों में भी एक नया सपना संजो दिया- एक दिन वर्ल्ड कप में खेलने का सपना.

यही वो पल था जिसने हमेशा के लिए झूलन गोस्वामी नाम की उस लड़की की ज़िंदगी बदल दी.

{image-"बंगाल के एक छोटे से गाँव चकदा में मैं पली बढ़ी. आंगन में घर के सब लड़के क्रिकेट खेलते थे, जैसे अक्सर गांव-मोहल्लों में होता है. मैं उनकी बॉल गर्ल होती थी.", Source: , Source description: , Image: hindi.oneindia.com}

आज जब 20 साल लंबे करियर के बाद वो रियाटर हो रही हैं तो उसी झूलन गोस्वामी की गिनती दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला क्रिकेटरों में होती है. लॉर्ड्स मैदान पर अपना आख़िरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने से पहले 20 सितंबर तक झूलन के नाम वनडे क्रिकेट में 253 विकेट हैं.

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए झूलन बताती हैं, "बंगाल के एक छोटे से गाँव चकदा में मैं पली बढ़ी. आंगन में घर के सब लड़के क्रिकेट खेलते थे, जैसे अक्सर गांव-मोहल्लों में होता है. मैं उनकी बॉल गर्ल होती थी जिसका काम था आंगन के बाहर गई गेंद को उठाकर लाना और भाइयों को देना. दोपहर में जब सब सो जाते थे तो मैं अकेले प्रेक्टिस करती थी."

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कोच ने जब झूलन के घरवालों को मनाया


"मैं दस साल की थी. मुझे याद है कि 1992 का पुरुष क्रिकेट वर्ल्ड कप टीवी पर देखा था और क्रिकेट को लेकर अचानक मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी. सचिन सर को टीवी पर खेलते हुए देखना आज तक याद है. वो सचिन-सचिन की आवाज़ें. वो जादुई था. तब वर्ल्ड कप को प्रमोट करने के लिए एक विज्ञापन आता था- ईट क्रिकेट, स्लीप क्रिकेट, ड्रीम क्रिकेट. कुछ इस तरह का. हमारी उम्र के बच्चों को बहुत प्रेरणा मिली थी."

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लेकिन गाँव में लड़कों को मनाना आसान नहीं था कि वो झूलन को भी अपने साथ खेलने दें. झूलन याद करते हुए बताती हैं, "लड़के कहा करते थे कि मैं धीमी गेंद डालती हूँ. साथ ही अगर आपको उनकी नज़र में जगह बनानी है तो ऑलराउंडर बनना पड़ता था. तो मैंने भी ये चैलेंज ख़ुद पर ले लिया कि मैं तेज़ गेंदबाज़ी कर सकूँ."

लेकिन गाँव में न तो कोई सुविधा थी, न ही कोचिंग इसलिए झूलन ने ट्रेनिंग के लिए रोज़ गाँव से कोलकाता जाना शुरू कर दिया.

झूलन बताती हैं, "मैं सुबह सुबह बहुत जल्दी उठकर ट्रेन लेकर गाँव से कोलकाता आती थी और ट्रेनिंग के बाद फिर से ट्रेन लेकर गाँव में स्कूल. मेरी गेंदबाज़ी और मेरे कद को देखकर वहाँ के कोच ने मुझसे कहा कि मैं अपनी गेंदबाज़ी पर ध्यान दूँ."

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स्वप्न साधू कोचिंग सेंटर चलाते थे. दुबली और लंबी सी झूलन तब उनके पास आई थीं.

सवप्न साधू बताते हैं, "गाँव वाले और झूलन के घर वाले झूलन के क्रिकेट खेलने से ख़ुश नहीं थे. धीरे-धीरे झूलन का एकेडमी आना बंद हो गया. उसकी काबिलियत को देखते हुए मैं झूलन के गाँव गया और सबको मनाया कि वो झूलन को खेलने दें. बाकी तो आपके सामने हैं."

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आज झूलन दुनिया की सबसे तेज़ गेंदबाज़ों में से एक हैं. 2002 में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेलने वाली झूलन आगे जाकर टीम की कप्तान भी बनीं.

वरिष्ठ क्रिकेट पत्रकार अयाज़ मेमन कहते हैं कि जिस तरह की सफलता झूलन को मिली है वो तब ही संभव है अगर कोई बिना ध्यान भटकाए , सिर्फ़ गेम पर फ़ोकस करके खेलता रहे और लगातार खेलता रहे.


अयाज़ कहते हैं, "झूलन गोस्वामी का ज़बरदस्त करियर रहा. उनके करियर की कन्सिस्टेंसी दर्शाती है कि वो कितनी हुनरमंद हैं और उनका मोटिवेशन लेवल कितना ग़ज़ब का रहा. उन दिनों महिला क्रिकेटरों को कोई नहीं पूछता था. लेकिन झूलन ने हार नहीं मानी, तब भी नहीं जब हालात बहुत मुश्किल थे. मज़बूत इच्छाशक्ति और लगातार अपनी मोटिवेशन बनाए रखने का गुर झूलन की सफलता का अहम कारण रहा है. जब आप उन्हें खेलते हुए देखते हैं तो आपको लगता है कि इनका जन्म मानो क्रिकेट खेलने के लिए ही हुआ हो."


झूलन के करियर पर नज़र डालें तो नए-नए रिकॉर्ड बनाना तो जैसे झूलन की आदत ही रही. महिला वनडे क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने का रिकॉर्ड झूलन के नाम है. आईसीसी रैंकिंग में वो गेंदबाज़ी में नंबर वन रह चुकी हैं. रिटायरमेंट के वक़्त भी वो पाँचवें पायदान पर हैं.

2007 में आईसीसी वुमन्स प्लेयर ऑफ़ द ईयर की विजेता बन झूलन ने इतिहास रच दिया था. ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय महिला क्रिकेटर थी.

"पुरुषों के वर्ग में भारत का कोई नामांकन नहीं था. इसलिए ये जीत मेरे लिए और भी ख़ास है. महिला क्रिकेट के लिए ये अवॉर्ड बहुत अहम है. महिला क्रिकेट धीरे धीरे बढ़ रहा है. मीडिया में हमें कवरेज मिलने लगा है. इससे और लड़कियाँ क्रिकेट में आगे आएँगी", उम्मीदों से भरी झूलन ने ये बात 2007 में अवॉर्ड लेने के बाद कही थी.

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ख़राब हालात को बयां करने के अनगिनत क़िस्से


और अगले कुछ सालों में बिल्कुल ऐसा ही हुआ जब कस्बों में, शहरों में लड़कियाँ क्रिकेट में आगे आ रही हैं- एक बदलाव जो झूलन ने ख़ुद महसूस किया है.

झूलन बताती हैं कि अब जब भी वो कोलकाता के विवेकानंद पार्क जाती हैं जहाँ वो खेलती थीं तो बहुत सारी लड़कियां वहाँ क्रिकेट खेलती हुई नज़र आती हैं, कुछ तो इतनी छोटी होती हैं कि अपना किटबैग भी नहीं उठा पातीं.

समाज में आ रहे इस बदलाव को झूलन समाज में एक अच्छा योगदान मानती हैं, ख़ासकर तब जब उनके जैसी कई लड़कियों को सोसाइटी और परिवार का विरोध झेलना पड़ा था.

90 का दशक और 2000 का दशक वो समय था जब भारत में वुमन क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया को अभी बीसीसीआई ने अपने अधीन नहीं लिया था. मिताली राज और झूलन गोस्वामी जैसी उस समय की युवा क्रिकेटरों के पास दर्जनों किस्से हैं जो उस समय के ख़राब हालात को बयां करते हैं.

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महिला क्रिकेट टीम के कोच डब्ल्यू वी रमन के साथ एक ख़ास यूट्यूब चैट में झूलन ने अपने किस्से बताए हैं, "महिला क्रिकेट एसोसिएशन के पास बहुत कम पैसा था. लड़कियाँ क्रिकेट मैच खेलने के लिए ट्रेन में सफ़र करती थीं. कभी-कभी तो रिज़र्वेशन भी नहीं होता था और साथ में बड़े-बड़े किट बैग होते थे. जिन मैदानों पर हम खेलते थे वो भी अच्छे नहीं होते थे."

"अगर हवाई यात्रा के लिए टिकट मिल जाता था तो एक्सट्रा बैगेज या सामान के लिए ख़ुद ही पैसा देना पड़ता था. बैग का वज़न कम करने के लिए हम लोग अपने कपड़े निकाल देते थे और बस फ़ील्ड में पहनने वाले कपड़े रखते थे. पहनने के लिए अच्छे जूते भी नहीं होते थे और हम जुगाड़ से काम चलाते थे.. दिल्ली में तारक सिन्हा तब बहुत से क्रिकेटरों की मदद किया करते थे. जैसे उस वक्त आशीष नेहरा से जूते लेकर किसी और को दे दिए और किसी और के जूते मुझे दे दिए ताकि हम मैच खेल सकें."

तब से लेकर अब तक हालात काफ़ी बदले हैं और इस परिपेक्ष में झूलन जैसी महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के योगदान की अलग अहमियत है.

झूलन के साथी खिलाड़ी ही नहीं, उनके विरोधी खिलाड़ी भी झूलन का लोहा मानते थे. पाकिस्तान की पूर्व क्रिकेट कप्तान रहीं सना मीर ने भारत के खिलाफ़ कई मैच खेले हैं और झूलन का सामना किया है.

झूलन गोस्वामी
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"एक तेज़ गेंदबाज़ होने के नाते हमने कभी नहीं देखा कि वो किसी बल्लेबाज़ से उलझ पड़ी हों. मैदान पर उतना बर्ताव बहुत शालीन रहा. बीस साल तक टिके रहना कोई छोटी बात नहीं है. उनकी स्पीड और उनका कद ऐसा था कि जब 5 फुट 11 इंच की झूलन गेंदबाज़ी करती थी तो हमारे पसीने छूट जाते थे. हमें यूँ गर्दन उठाकर देखना पड़ता था कि झूलन गेंद फ़ेंक रही हैं. हमें ही पता है कि हम कैसे झूलन के खिलाफ़ बल्लेबाज़ी करते थे", झूलन की तारीफ़ करते हुए सना हँसते हुए कहती हैं.


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तो ऐसा क्या है जिसने झूलन को मैदान पर इतना घातक, प्रभावशाली बनाया कि वो लगातार दो देशक तक टिकी रहीं? झूलन के बचपन के कोच स्वप्न साधू कहते हैं कि उनकी फ़िटनेस और गेम के प्रति उनकी निष्ठा ने झूलन को सबसे अलग बनाया.

खेल पत्रकार आदेश कुमार गुप्त ने झूलन के सफ़र को लंबे समय से कवर किया है.

वे कहते हैं, "2002 में जब झूलन ने टीम में अपनी जगह बनाई तो बहुत कम भारतीय महिला क्रिकेट को फॉलो किया करते थे. डायना एडुलजी और शांता रंगास्वामी जैसी कुछ चुनिंदा महिला क्रिकेटरों के नाम ही लोग जानते थे. और अगर गेंदबाज़ों की बात करें तो कितने ही धुरंधर भारतीय पुरुष खिलाड़ियों के नाम आप गिना सकते हैं. लेकिन अगर भारतीय महिला तेज़ गेंदबाज़ों की बात करें तो झूलन जैसे कितने नाम गिना सकते हैं?"

"वनडे मैचों में वो 250 से ज़्यादा विकेट ले चुकी हैं. ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि झूलन ने सिर्फ 12 टेस्ट मैच खेले और 44 विकेट लिए क्योंकि महिला क्रिकेटरों को टेस्ट मैच खेलने के लिए नहीं मिलते रहे हैं. मुझे याद है कि मैं दिल्ली में क्रिकेट अकैडमी में जाता था तो बहुत कम लड़कियाँ दिखती थीं. आज नज़ारा अलग है. झूलन जैसी खिलाड़ियों की यही असली विरासत है."

कई मायनों में झूलन गोस्वामी की क्रिकेटर वाली ज़िंदगी घूमकर उसी मुहाने पर आकर ख़त्म हो रही है जहाँ से शुरू हुई थी.

कुछ महीने पहले झूलन को ईडन गार्ड्न्स आमंत्रित किया गया ताकि आईपीएल एलिमिनेटर मैचों के लिए वो पारंपरिक घंटी बजाने की रस्म कर सकें. ये वही मैदान है जहाँ 15 साल की झूलन ने 1997 के वर्ल्ड कप में बॉल गर्ल का काम किया था. और 2002 में इंग्लैंड के खिलाफ़ अपने करियर की शुरुआत करने वाली झूलन ने लॉर्ड्स मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ़ अपना आख़िरी मैच खेल क्रिकेट को अलविदा कहा.

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एक ऐसी खिलाड़ी जिसे उसके अपने साथी, विरोधी और फ़ैंस सब सलाम करते हैं. मुझे याद है कि दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला स्टेडियम का वो क्रिकेट मैच जो पाकिस्तान के खिलाफ़ था. हारा हुआ मैच कैसे झूलन ने लगभग भारत को जितवा ही दिया था लेकिन बारिश के कारण वो मैच रोक देना पड़ा और पाकिस्तान विजेता घोषित हुआ.

और मैदान पर आए एक पाकिस्तानी फ़ैन ने मुझसे कहा था कि हम भले जीत गए लेकिन अपने ज़ज्बे से झूलन ने दिलों को जीता है.


झूलन गोस्वामी

अंतरराष्ट्रीय डेब्यू - 6 जनवरी 2002

टेस्ट मैच में सबसे अधिक विकेट लेने वाली सबसे युवा क्रिकेटर - 2006

आईसीसी विमेन्स प्लेयर ऑफ़ द ईयर - 2007

आईसीसी गेंदबाज़ों की रैंकिन में नंबर 1 - 2017,2019

आख़िरी अंतरराष्ट्रीय मैच - 24 सितंबर 2022


वनडे में सबसे अधिक विकेट - 253

सभी फ़ॉर्मेट में कुल विकेट - 353

महिला विश्व कप में सबसे अधिक विकेट - 40

भारतीय टीम की कप्तान - 2008


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