Jharkhand:अब आदिवासियों ने जैनियों से पारसनाथ पहाड़ी मुक्त कराने की शुरू की मांग, जानें क्या है विवाद
झारखंड में पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित सम्मेद शिखरजी के मामले में एक नया विवाद शुरू हो गया है। अब आदिवासी संगठनों ने कहा है कि मारंग बुरु पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे जैनियों से मुक्त कराया जाए।

झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ी को लेकर एक नया विवाद तूल पकड़ने लगा है। अब तीन राज्यों के आदिवासी संगठन इस पहाड़ी पर दावा जताते हुए आंदोलन पर उतर आए हैं। 30 जनवरी को उन्होंने बिरसा मुंडा की जन्मस्थली खूंटी में एक दिन का सामूहिक अवकास रखने की घोषणा की है। उनकी मांग है कि पारसनाथ पहाड़ी/मारंग बुरु पर उनका जन्मसिद्ध अधिकारी है और इसे जैनियों के 'कब्जे' से मुक्त कराया जाए। गौरतलब है कि इसे पर्यटन स्थल घोषित करने की झारखंड सरकार के फैसले पर केंद्र सरकार ने जैन समुदाय के विरोध के बाद हाल में रोक लगाई है।
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30 जनवरी को एक दिन का उपवास रखने का ऐलान
न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक आदिवासियों ने 30 जनवरी को झारखंड के खूंटी के उलिहातु में एक दिन का उपवास रखने का ऐलान किया है। यह स्थान आदिवासियों के आइकन भगवान बिरसा मुंडा का जन्म स्थान है। आदिवासियों के एक संयुक्त संगठन के सदस्य के मुताबिक वे पारसनाथ पहाड़ी को बचाने के लिए अभियान शुरू कर रहे हैं। इसके लिए मंगलवार को आदिवासियों ने झारखंड के गिरिडीड जिले में पारसनाथ पहाड़ी के पास बड़ी संख्या में उपस्थित होकर केंद्र और राज्य सरकार से उनके पवित्र स्थान को जैन समुदाय से मुक्त कराने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांग नहीं मानी गई तो सख्त विरोध करेंगे।

'मारंग बुरु पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार'
अपनी मांग को लेकर पारंपरिक हथियारों और ड्रमों के साथ जुटे आदिवासियों में झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल और ओड़िसा से भी लोग जुटे थे। आदिवासियों के 50 से ज्यादा संगठनों के समर्थन का दावा करने वाले झारखंड बचाओ मोर्चा के एक सदस्य ने कहा, 'मारंग बुरु (पारसनाथ) झारखंड के आदिवासियों का जन्मसिद्ध अधिकार है और दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।' उन्होंने कहा, 'अपने आंदोलन के समर्थन में आदिवासियों के मसीहा बिरसा मुंडा के जन्मस्थान खूंटी के उलिहातु में 30 जनवरी को आदिवासी एक दिन का उपवास रखेंगे। '

केंद्र ने राज्य सरकार के कदम पर लगाई है रोक
गौरतलब है कि देश भर में जैन समुदाय के लोग पारसनाथ पहाड़ी को पर्यटन स्थल घोषित करने के 2019 के झारखंड सरकार की अधिसूना को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि इससे पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी, जो कि इस पवित्र स्थान पर नॉन-वेज खाने और शराब की सेवन भी कर सकते हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने जैनियों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को देखने के बाद झारखंड सरकार के पर्टयन को बढ़ावा देने के नाम पर की गई इस कोशिश पर रोक लगा दी है, लेकिन अब आदिवासियों का संगठन इस भूमि पर दावा करने और इसे जैन समुदाय से मुक्त करने की मांग करते हुए आगे आ गया है।

देश की सबसे बड़ी जनजाति में से एक हैं संथाल
संथाल आदिवासी देश में अनुसूचित जनजाति का सबसे बड़ा वर्ग है। झारखंड में तो इनके नाम पर पूरा संथाल परगना ही बनाया गया है। झारखंड के अलावा ये बिहार,ओड़िशा, असम और पश्चिम बंगाल में भी बड़ी तादाद में मौजूद हैं। यह मूल रूप से प्रकृति के उपासक हैं। आज भी पारपंरिक हथियार चलाना और पारपंरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग इनकी संस्कृति का हिस्सा बना हुआ है।

क्यों शुरू हुआ विवाद ?
बता दें कि पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित सम्मेद शिखरजी से जैनियों की हजारों-हजार सालों की आस्था जुड़ी हुई है। वहीं आदिवासी समाज के लोग भी पारसनाथ को मरांग बुरु के तौर पर सदियों से पूजते आए हैं। संथालों के लिए मरांग का मतलब है सबसे प्रधान। लेकिन, जब से इस पवित्र स्थान को पर्यटन स्थल घोषित करके एक नए विवाद को जन्म दिया गया है, सदियों से चली आ रही दोनों समुदाओं की आस्था के बीच बेवजह के एक मतभेद के हालात पैदा होने लगे हैं। जैन समुदाय के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके 24 तीर्थकरों में से 20 तीर्थंकरों ने यहीं पर निर्वाण प्राप्त किया। दुनिया भर से जैन यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते रहे हैं। वहीं अब आदिवासियों के संगठन ने इसे उनसे मुक्त कराने की मांग शुरू कर दी है। (कुछ तस्वीरें- सांकेतिक, सम्मेद शिखरजी तस्वीर सौजन्य- सोशल मीडिया)












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