झारखंड चुनाव:146 साल पहले जामताड़ा भारत के पुनर्जागरण का केन्द्र था, लेकिन आज क्या है?

रांची। आज झारखंड विधानसभा चुनाव का समापन हो गया। 30 नवम्बर से शुरू हुई चुनावी गहमागहमी 20 दिसम्बर को अंजाम पर पहुंच गयी। झारखंड के कई चुनाव क्षेत्र राजनीति के अलावा ऐतिहासिक महत्व के कारण भी चर्चित रहे हैं। इनमें जामताड़ा एक है। जामताड़ा पहले दुमका जिले का हिस्सा था। बाद में यह खुद जिला बन गया। आज जामताड़ा में भी चुनाव सम्पन्न हो गया। यहां कांग्रेस के मौजूदा विधायक इरफान अंसारी और भाजपा के वीरेन्द्र मंडल के बीच ही मुख्य मुकाबला है। पूर्व विधायक विष्णु भैया की पत्नी चमेली देवी और भाजपा के बागी नेता तरुण गुप्ता ने भी चुनौती पेश की। विष्णु प्रसाद भैया यहां से दो बार विधायक रहे हैं। एक बार भाजपा से और एक बार झामुमो से। विधायक बदलते रहे, पार्टियां बदलती रहीं लेकिन जामताड़ा की किस्मत नहीं बदली। आज यहां गरीबी के कारण पलायन करने वाले लोगों की तादाद झारखंड में सरेफेहरिस्त है। ये कितनी शर्मनाक बात है कि जो जामताड़ा कभी भारतवर्ष के पुनर्जागरण के केन्द्र था आज वह गरीबी और पिछड़ेपन की निशानी बन गया है। 146 साल पहले भारत के महान शिक्षाविद और समाजसुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने जमाताड़ा के करमाटांड में आश्रम बना कर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक बदलाव के लिए सशक्त आंदोलन चलाया था। भारत आजाद हुआ। चुनाव दर चुनाव वक्त गुजरता रहा लेकिन जामताड़ा मुफलिसी के जाल से मुक्त न हो सका। यहां के जागरुक लोगों का नेताओं से एक सवाल है- 146 साल पहले जामताड़ा में एक व्यक्ति ने जो कर दिखाया, वह मुलाजिमों की फौज से सजी सरकार भी क्यों नहीं कर पा रही ?

ईश्वर चंद्र विद्यासागर

ईश्वर चंद्र विद्यासागर

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 1820 में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। वे बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज थे। उनका जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इसके बावजूद उनमें पढ़ने की प्रबल लालसा थी। 9 साल की उम्र में वे अपने पिता के साथ पैदल ही कोलकाता पहुंच गये थे। वहां संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया। वे हर परीक्षा में प्रथम स्थान पाते रहे। उनकी विद्वता का तब कोलकाता में डंका बजने लगा था। प्रतिभा के धनी ईश्वर चंद्र को केवल 21 साल की उम्र में ही लेक्चरर की नौकरी मिल गयी थी। फोर्ट विलियम कॉलेज ने 1841 में उन्हें शिक्षक तो बनाया ही साथ ही साथ संस्कृत का विभागाध्यक्ष भी बना दिया। उनका मूल नाम ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय था लेकिन संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के नाते उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गयी थी। वे बहुत ही स्वाभिमानी थे। अंग्रेज अफसरों से मतभेद के कारण विद्यासागर जी ने 1858 में कॉलेज की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। फिर उन्होंने सामाजिक सुधार आंदोलन शुरू किया। स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। यहां तक कि अपने एकलौते बेटे का एक विधवा से विवाह किया था। उन्होंने बांग्ला लिपि की वर्णमाला को सरल और सुबोध बनाया। शिक्षा के प्रसार के लिए रात्रि पाठशाला शुरू की। उनकी मेहनत की वजह से गांव-गांव में संस्कृत और बांग्ला की पढ़ाई के लिए स्कूल खुले। ईश्वर चंद्र जी को आधुनिक बांग्ला गद्य का पिता का कहा जाता है।

ईश्वर चंद्र और जामताड़ा

ईश्वर चंद्र और जामताड़ा

बंगाल पुनर्जागरण के अग्रदूत ईश्वर चंद्र जी 1873 में जामताड़ा के करमाटांड आ गये थे। करमाटांड में घने पेडों के बीच एक आश्रम बनाया और उसका नाम नंदन कानन रखा। परिवार से नाता तोड़ कर उन्होंने अपना पूरा जीवन संथाली आदिवासियों के लिए समर्पित कर दिया। उस समय स्थानीय आदिवासियों का जीवन गहन अंधेरे में था। अंधविश्वास के कारण वे अपनी बीमारियों का इलाज नहीं कराते थे। विद्यासगर जी ने यहां एक होमियपौथिक चिकित्सालय स्थापित कर उनके स्वास्थ्य की देखभाल शुरू की। इस अस्पताल में इलाज की मुफ्त व्यवस्था थी। उन्होंने संथाल समाज की लड़कियों के लिए करमाटांड में एक स्कूल शुरू किया जो भारत का पहला प्राइमरी गर्ल्स स्कूल माना जाता है। आज से करीब सवा सौ साल पहले जामताड़ा स्त्री शिक्षा में अन्य जिलों से बहुत आगे था। मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों के लिए रात का स्कूल शुरु किया। ईश्वर चंद्र जी 18 साल कर करमाटांड में रहे। इन 18 सालों में वे इतने लोकप्रिय हो गये थे कि आदिवासी उन्हें भगवान की तरह पूजने लगे थे। 1891 में उनका निधन हो गया। ईश्वर चंद्र जी के गुजरने के बहुत साल बाद उनके पुत्र ने करमाटांड के नंदन कानन आश्रम को एक व्यक्ति के हाथों बेच दिया। जैसे ही तत्कालीन बिहार के बंगाली एसोसिएशन को ये बात मालूम हुई उन्होंने इस धरोहर को बचाने के लिए उस व्यक्ति से समपर्क किया। बंगाली एसोसिएशन ने बिहार के एक-एक घर से एक रुपये का चंदा इकट्ठा कर 1974 में नंदन कानन को खरीद लिया। बंद हो चुके बालिका विद्यालय को विद्यासागर जी के नाम पर फिर शुरू किया गया। उनकी स्मृति में मुफ्त होमियेपौथिक दवाखाना नये सिरे से संचालित हुआ। आज भी उनकी 146 साल पुरानी पालकी यहां रखी हुई है। बाद में झारखंड सरकार ने करमाटांड प्रखंड का नाम ईश्वर चंद्र विद्यासागर कर दिया था। भारतीय रेलवे ने भी करमाटांड स्टेशन का नामकरण उनके नाम पर कर दिया ।

वर्तमान करमाटांड

वर्तमान करमाटांड

अभी करमाटांड में आजीविका का एक मात्र साधन खेती ही है। खेती भी ऐसी नहीं है कि इससे जीवन का गुजारा हो जाए। धान की कटनी के बाद यहां के लोगों के पास कोई काम नहीं रहता। नतीजा ये है कि रोजी रोटी के लिए एक बड़ी आबादी यहां से पलायन कर रही है। विद्यासागर स्टेशन पर रोज ही पलायन करने वाले लोगों की भारी भीड़ जुटती है। दैनिक रोजगार के लिए सैकड़ों लोगों का ट्रेन से दुर्गापुर, आसनसोल, रुपनारायणपुर, सलानपुर आना जाना होता है। मनरेगा भी यहां के मजदूरों का पेट नहीं भर पाता। उन्हें पैसा कमाने के लिए नजदीक के शहरों में जाना पड़ता है। चुनाव जीतने के बाद कोई देखने नहीं आता कि यहां के लोग किस हालत में हैं। झारखंड के नेता हर साल ईश्वर चंद्र जी की जयंती मनाने करमाटांड आते हैं लेकिन उनके सपनों को सच करने में किसी को दिलचस्पी नहीं है।

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