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झारखंड चुनाव: नक्सलियों ने वारदात को अंजाम देकर खोली सीएम रघुबर दास के दावों की पोल, अभी भी हैं बड़ी चुनौती

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नई दिल्ली। झारखंड में वोटिंग से पहले नक्सलियों ने खूनी वारदात से वोटरों में दहशत फैला दी है। लातेहार में चंदवा के पास नक्सलियों ने चार पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी। लातेहार समेत छह जिलों की 13 नक्सल प्रभावित सीटों पर 30 नवम्बर को मतदान है। अभी मतदान को लेकर सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं फिर भी नक्सलियों ने वारदात को अंजाम दे दिया। इस घटना ने मुख्य चुनाव आयुक्त की आशंका को सच साबित कर दिया। चुनाव आयुक्त ने 22 नवम्बर को रांची में कहा था कि अधिकारियों की रिपोर्ट से ऐसा नहीं लगता कि झारखंड में नक्सलवाद कम हुआ है। गुरुवार को झारखंड के मनिका में सभा के दौरान अमित शाह ने झारखंड में नक्सलवाद पर नियंत्रण के सीएम रघुवर दास की खूब तारीफ की थी। लेकिन एक दिन बाद ही इसकी पोल खुल गयी। नक्सली चूंकि चुनाव का विरोध करते हैं उसलिए वे पहले भी हिंसा फैलाते रहे हैं।


2009 में विधायक का अपहरण

2009 में विधायक का अपहरण

झारखंड में चुनाव के समय नक्सली अपने दबदब के लिए अक्सर हिंसा फैलाते रहे हैं ताकि सरकार उनकी हनक से इंकार न कर सके। 2009 के विधानसभा चुनाव में नक्सलियों ने लातेहार के मनिका में ही विधायक का अपहरण कर लिया था। अलग अलग घटनाओं में 10 पुलिसकर्मियों को मौत की नींद सुला दिया था। रामचंद्र सिंह मनिका (लातेहार) से राजद के विधायक थे। उस समय विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी। 12 नवम्बर 2009 को नक्सलियों ने विधायक रामचंद्र सिंह और पांच राजद कार्यकर्ताओं का नक्सलियों ने तरवाडीह गांव से अपहरण कर लिया था। विधायक का हथियार भी छीन लिया गया था। दो दिन तक विधायक नक्सलियों की कैद में रहे। पुलिस ने जब आक्रामक सर्च ऑपरेशन चलाया तब जा कर नक्सलियों ने विधायक को मुक्त किया था। इस घटना के अलावा 2009 के चुनाव में नक्सलियों ने गुमला में तीन, खूंटी में एक, गिरिडीह में एक, दुमका में दो, लोहरदगा में एक, चतरा में एक और पलामू में एक पुलिस वाले को मौत के घाट उतार दिया था।

2005 में 8 पुलिसकर्मी हुए थे शहीद

2005 में 8 पुलिसकर्मी हुए थे शहीद

2005 के विधानसभा चुनाव के समय नक्सलियों ने 8 पुलिसकर्मियों को मार डाला था। पालमू प्रमंडल के छतरपुर में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का विस्फोट कर सात पुलिसकर्मियों को मार डाला था। पालमू में ही मनातू के पास एक और बारूदी सुरंग का विस्फोट हुआ था जिसमें बीएसएफ का एक जवान शहीद हो गया था। 2014 के विधानसभा चुनाव में सबसे कम नक्सली हिंसा हुई थी। उस चुनाव में एक जवान शहीद हुआ था। झारखंड के 24 में से 19 जिले नक्सल प्रभावित हैं। इस राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव करना एक बड़ी चुनौती रही है। नक्सली चुनाव बहिष्कार को सफल बनाने के लिए हिंसा का रास्ता अपनाते रहे हैं।

फेल हुआ रघुवर का दावा

फेल हुआ रघुवर का दावा

2014 में जब रघुवर दास मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने दावा किया था कि छह महीने में नक्सली समस्या को खत्म कर देंगे। उन्होंने कहा था कि जब नक्सलवाद अपने मूल स्थान पश्चिम बंगाल से खत्म हो सकता है तो झारखंड से क्यों नहीं। इसके लिए उन्होंने प्रखंड स्तर पर सिपाहियों की नियुक्ति कर रोजगार देने की बात कही थी। लेकिन छह महीने कौन कहे पांच साल में भी नक्सलियों पर नकेल नहीं कसी जा सकी। इस तरह उनका दावा कब का फेल हो चुका है। अगस्त 2019 में नक्सलवाद के खात्मे पर चर्चा के लिए प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई थी। इस बैठक में रघुवर दास ने दावा किया था कि झारखंड में नक्सली घटना में 60 फीसदी की कमी आयी है। चार साल में नक्सलियों को ढेर करने की संख्या दोगुनी हुई है। जब 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब कोई नक्सली घटना नहीं हुई तो मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुद अपनी पीठ थपथपायी थी। सरकार नक्सलियों पर काबू पाने के भ्रम में पड़ी हुई थी। इस बीच बेरहम नक्सलियों ने वोटिंग से आठ दिन पहले चार पुलिसवासों की जान लेकर सरकार के दावों की पोल खोल दी।

English summary
jharkhand assembly elections 2019 raghubar das naxal issue
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