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झारखंड विधानसभा चुनाव 2019: पिछले चुनावों में केन्‍द्रीय मुद्दों पर फेल हुई भाजपा झारखंड में चलेगी ये दांव

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बेंगलुरु। चुनाव आयोग ने झारखंड के विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी है। झारखंड की 81 सीटों 30 नवंबर से 20 दिसंबर के बीच पांच चरण में वोट डाले जाएंगे और 23 दिसंबर तक परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। चुनावी बिगुल बजते ही सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावी महासंग्राम में कूद पड़ी हैं। सत्ताधारी और विपक्षी दल अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी तो कई महीनों से कर रहे थे क्योंकि झारखंड यहां के भी चुनाव हरियाणा और महाराष्‍ट्र के साथ होने का प्रस्‍ताव था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियां अब मोर्चे पर आकर डट चुकी हैं। पिछले चुनाव के परिणाम को जारी रखने या फिर इसको बदलने के लिए सभी पार्टियां अपने-अपने तरीके से जोर लगा रही हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी झारखंड चुनाव में हरियाणा और महाराष्‍ट्र के परिणामों से सबक लेते हुए फूंक फूंक कदम रख रही है ताकि वहां त्रिशंकु के बजाय बहुमत की सरकार बनाने का सुख प्राप्‍त कर सके। भाजपा ने जनता का मूड भांप चुकी है और वह उसी हिसाब से झारखंड चुनाव में दांव चलेगी।

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गौरतलब है कि हरियाणा में सबसे अधिक बहुमत मिलने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए काफी जद्दोजेहद करनी पड़ी। वहीं महाराष्‍ट्र में भी सर्वाधिक बहुमत मिलने के बाद शिवसेना के साथ गठबंधन की सरकार बनाने के लिए अभी तक पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। जबकि इन दोनों राज्यों के चुनाव से पहले भाजपा अपनी जीत के लिए पूरी तरह आश्‍वस्‍त थी और उसे लगा थी कि अनुच्‍छेद 370, तीन तलाक समेत अन्‍य केन्‍द्र सरकार के फैसले पर जनता वोट देगी इसलिए बीजेपी ने चुनावाों में स्‍थानीय मुद्दों को नजरदांज कर दिया। जिसका खामियाजा बीजेपी को परिणामों में झेलना पड़ा। दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम ने सिद्ध कर दिया कि राष्‍ट्रवाद, अनुच्‍छेद 370, पाकिस्‍तान जैसे मुद्दे चुनावी थाली का जायका तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन जनता की जरुरतें और स्‍थानीय मुद्दे को नकार नही सकते। भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह और वरिष्‍ठ नेताओं को अच्‍छे से समझ आ चुका है कि स्‍थानीय समस्‍याओं को नकार कर केवल राष्‍ट्रवाद के दम पर बहुमत हासिल नहीं किया जा सकता है।

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झारखंड में भी क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी फैक्टर खड़ा हुआ है। ऐसे में बीजेपी ने स्थानीय समस्याओं और आम जनता को लाभान्वित करने वाले मुद्दों पर ही चुनाव लड़ेगी। बीजेपी चुनाव में स्थानीय मुद्दों को वरीयता देते हुए चुनावी एजेंडा तैयार कर रही है। मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में झारखंड पिछले पांच वर्षों में काफी कार्य हुए। हालांकि मॉब लिंचिंग में तबरेज की हत्‍या के मामले में प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया जिसको विपक्ष हर हाल में चुनावी मुद्दा बनाएगी। इसके अलावा भाजपा को विपक्ष देश में छायी मंदी और मंहगाई के मुद्दे भी घसीटेगी। जिसके मुकाबले में भाजपा को जनता से जुड़े ऐसे मुद्दे पर वादा करना होगा जिससे जनता के दिल पर राज कर सके। बीजेपी ने झारखंड में इस बार मिशन 65 का नारा दिया है और इस लक्ष्‍य हो हासिल करने के लिए स्थानीय मुद्दें जिनमें रोजगार, बिजली, पानी बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा समेत अन्‍य मुद्दों को फोकस करके वोट बैंक साधने की कोशिश करेंगी।

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गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में 14 में से 12 सीटें तो भाजपा के पक्ष में रही हीं, राज्य की 81 विधानसभा सीटों में से पार्टी ने 63 पर विपक्षी गठबंधन से बढ़त बनाने में सफलता पाई। विपक्ष को लोकसभा की दो ही सीट हासिल हो सकी। पिछले लोकसभा चुनाव परिणाम से उत्साहित होकर भाजपा ने मिशन 65 के साथ चुनाव की तैयारियां शुरू की हैं। बीजेपी का लक्ष्य है कि आम चुनाव के रिकार्ड को कायम रखते हुए 81 सीटों में से 65 से अधिक पर कब्जा जमा लिया जाए। भाजपा ने अपने इस निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। चुनाव की तारीख आने से पहले से ही संगठन से लेकर मुख्यमंत्री तक लगातार विधानसभा क्षेत्रों में सक्रियता से काम कर रहे हैं।

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पूर्व की घोषणाओं को पूरी करके नयी घोषणाएं और वर्तमान सरकार के द्वारा किए गए काम के आधार पर वोट मांगने का सिलसिला शुरू हो चुका है और भाजपा इसको आगे भी जारी रखना चाहती है।पार्टी के सीनियर नेता भी आम लोगों के बीच काम के आधार पर ही पार्टी की छवि बनाने में लगे हुए हैं। चुनाव की शुरुआत से ही सत्ताधारी गठबंधन बढ़त की स्थिति में दिख रहा है लेकिन विपक्ष को कमजोर आंकना भी गलत होगा। लोकसभा चुनाव में भले ही झामुमो ने अपनी एक परंपरागत सीट जीती हो, कांग्रेस ने तो भाजपा की जीती हुई सीट छीनी है और इस कारण से सत्ताधारी दल को सतर्क रहने की जरूरत है।

बता दें विधानसभा चुनाव 2014 में लगभग 35 फीसद मत बटोरकर सत्ताधारी गठबंधन ने 42 सीटों पर कब्जा जमा लिया था। इसमें से 37 भाजपा को और पांच आजसू को मिली थीं। आजसू को प्राप्त मत 3.7 फीसदी रहा था। झारखंड विकास मोर्चा को कुल 10 फीसद वोट प्राप्त हुए थे। इसके 8 उम्मीदवार जीते लेकिन दो महीने के अंदर ही इनमें से छह भाजपा में चले गए। झामुमो को 19 सीटें, कांग्रेस को सात, बसपा को एक और अन्य सीटें छोटी पार्टियों को भी मिलीं। चुनाव के बाद के पांच वर्षों में भाजपा के पक्ष में माहौल बनता ही रहा और सीटों की संख्या में भी तब्दीली होती रही। हाल में आयोजित लोकसभा चुनाव ने भाजपा को और ताकत दी है।

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15 सालों से ऐसा रहा ट्रेंड

2000 में बिहार से अलग होकर बने झारखंड में 2005 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ था। राज्य में अभी तक रघुवर दास इकलौते ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। उनसे पहले कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। झारखंड में अब तक 3 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। इस दौरान 4 बार लोकसभा चुनाव के लिए भी मतदान हुआ है। झारखंड में पिछले 15 साल का ट्रेंड बताता है कि लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने वाली पार्टी ही विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है। राज्य में शुरू से ही भाजपा का वोट शेयर 20% से ज्यादा रहा है।

5 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा ने 11 और आजसू ने 1 सीट जीती। भाजपा का वोट शेयर पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में 10% से ज्यादा बढ़ा। इस चुनाव में पार्टी को 51.6% वोट मिले। जबकि, कांग्रेस ने राजद (राष्ट्रीय जनता दल), झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) और झाविमो (झारखंड विकास मोर्चा) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। यहां की 14 लोकसभा सीटों में से भाजपा+ ने 12 और कांग्रेस+ ने 2 सीटें जीती थीं। इन सबका वोट शेयर मिलाकर 35% होता है।

इसे भी पढ़े- महाराष्ट्र-हरियाणा नतीजों से हैरान बीजेपी अब झारखंड को लेकर है परेशान!

English summary
In the Jharkhand Assembly elections, the Bharatiya Janata Party will give preference to local issues, leaving the issue of nationalism to form a majority government. If we look at the old results, then the BJP government is going to be formed in Jharkhand.
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