झारखंड चुनाव परिणाम: क्या NRC और CAA ने बचाई भाजपा की इज्जत?

नई दिल्ली। झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा। उसे 25 से भी कम सीटें मिलती हुईं दिख रही हैं। इनमें से करीब 15 सीटें वे हैं जहां चौथे और पांचवें चरण में चुनाव हुआ था। इस दौर के चुनाव के समय देश में सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट और नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजंस का मुद्दा छाया रहा था। देश भर में विरोध भी शुरू हो गया था। इसके बावजूद भाजपा ने संथाल परगना के चुनाव में सीआरसी लागू कर घुसपैठ की समस्या खत्म करने का नारा दिया था। चौथे और पांचवें चरण में कुल 31 सीटों पर चुनाव हुआ था। इसमें भाजपा को 15 सीटें मिलती हुईं दिख रही हैं। यानी भाजपा को शुरू के तीन चरण के चुनाव में बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। पहले, दूसरे और तीसरे फेज की 50 सीटों में से भाजपा को कम सीटें ही मिलती दिख रही हैं। वैसे भाजपा की हार के कई कारण हैं।

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    चौथे और पांचवें चरण में भाजपा को फायदा

    चौथे और पांचवें चरण में भाजपा को फायदा

    चौथे चरण में 15 सीटों पर चुनाव हुआ था। दूसरे दलों के विधायकों के आने के बाद इन 15 से 12 सीटों पर भाजपा के विधायक हो गये थे। अंतिम चरण में 16 सीटों पर चुनाव हुआ था जिसमें पांच सीटें भाजपा की थीं। इन 31 में से अब 15 सीटें भाजपी को मिलती दिख रही हैं। यानी अगर CAA और NRC का मुद्दा भाजपा ने नहीं उठाया होता तो उसकी और दुर्गति हो सकती थी। पहले के तीन चरणों की तरह ही अगर भाजपा अंतिम के दो चरणों में प्रदर्शन करती तो उसकी सीटें 20 से कम पर सिमट जातीं। झारखंड चुनाव में भाजपा को स्थानीय मुद्दों पर भले निराश हाथ लगी हो लेकिन इन दो राष्ट्रीय मुद्दों ने इसकी रिजल्ट टैली को थोड़ा सुधार दिया। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भाजपा अब भविष्य में भी इन मुद्दों को और मजबूती से आगे बढ़ाएगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ये ट्रंप कार्ड चल सकती है।

    भाजपा में कलह से नुकसान

    भाजपा में कलह से नुकसान

    टिकट बंटवारे के समय भाजपा में गहरा असंतोष उभरा था। भाजपा ने इंटरनल रिपोर्ट कार्ड के नाम पर 10 विधायकों के टिकट काट दिये थे। दूसरे दलों के 11 विधायकों को भाजपा ने इज्जत के साथ पार्टी में जगह दी। इससे भाजपा के समर्पित कैडरों में बहुत नाराजगी थी। शीर्ष नेतृत्व ने इस नाराजगी को नजरअंदाज कर दिया था। चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। बरही में कांग्रेस के विधायक मनोज यादव को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था। भाजपा के ही पूर्व विधायक उमाशंकर अकेला नाराज हो कर कांग्रेस में चले गये। वोटों की गिनती में मनोज यादव पिछड़ गये हैं और उमाशंकर आगे चल रहे हैं। कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाल सुखदेव भगत भी लोहरदगा में पीछे चल रहे हैं। इसी तरह झाविमो से भाजपा में शामिल होने वाले अमर कुमार बाउरी चंदन क्यारी में पीछे चल रहे हैं। अमर का मंत्री पद पर रहना भी काम न आया। झाविमो से भाजपा में आने वाले रणधीर कुमार सिंह भी सारठ में पिछड़ रहे हैं। मंत्री रहते उनकी भी नैया डूबती लग रही है। सरयू राय प्रकरण से भाजपा को हानि उठानी पड़ी।

    आजसू से गठबंधन तोड़ना महंगा पड़ा

    आजसू से गठबंधन तोड़ना महंगा पड़ा

    आजसू से गठबंधन तोड़ना भाजपा के लिए महंगा पड़ा। अगर भाजपा ने आजसू की 19 सीटों की मांग मान ली होती तो उसकी स्थिति आज इतनी खराब न होती। 50 से अधिक सीटों पर आजसू के चुनाव लड़ने की वजह से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। आजसू अलग लड़ कर भी अपने पुराने प्रदर्शन के आसपास ही है। उसे चार या पांच सीटें मिलती दिख रही हैं। टिकट बंटवारे के समय जब आजसू प्रमुख सुदेश महतो ने जब अपनी मांग रखी थी तो भाजपा के चुनाव प्रभारी ओम माथुर ने 10 से अधिक सीटें देने से इनकार कर दिया था। ओम माथुर ने अतिआत्मविश्वस में यहां तक कह दिया था कि आज तक किसी चुनाव में उनकी रणनीतियां फेल नहीं हुई हैं। आजसू के अलग चुनाव लड़ने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन अब वोटों के रुझान ने ओम माथुर को गलत साबित कर दिया है।

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