जामियाः क्या दिल्ली पुलिस ने लगाई डीटीसी बस में आग?-फ़ैक्ट चेक

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दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर रविवार को हुए हिंसक प्रदर्शन का एक वीडियो वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में एक जलती हुई मोटर बाइक नज़र आ रही है जिसे एक शख्स फायर इक्स्टिंगग्विशर से बुझाने की कोशिश कर रहा है. पास में एक डीटीसी क्लस्टर बस खड़ी है. पुलिस के कुछ लोग प्लास्टिक के पीले डब्बों में कुछ भरकर गाड़ी में ले जा रहे हैं. 20 सेकेंड के इस वीडियो में पीछे से आवाज़ आ रही है "बुझ गया...बुझ गया."

इस वीडियो को ट्वीट करते हुए दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने दिल्ली पुलिस पर बसों में आग लगाने का आरोप लगाया. उन्होने लिखा, "चुनाव में हार के डर से बीजेपी दिल्ली में आग लगवा रही है. आप किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ है. ये बीजेपी की घटिया राजनीति है. इस वीडियो में ख़ुद देखें कि किस तरह पुलिस के संरक्षण में आग लगाई जा रही है."

इसके बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया, "इस बात की तुरंत निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि बसों में आग लगने से पहले ये वर्दी वाले लोग बसों में पीले और सफ़ेद रंग वाली केन से क्या डाल रहे हैं? और ये किसके इशारे पर किया गया? फ़ोटो में साफ़ दिख रहा है कि बीजेपी ने घटिया राजनीति करते हुए पुलिस से ये आग लगवाई है."

इसे दस हज़ार से ज्यादा लोगों ने रीट्वीट किया है.

इसके बाद सोशल मीडिया पर इस वीडियो के लेकर बहस छिड़ गई कि ये आग पुलिस ने लगाई या प्रदर्शनकारियों ने.

फ़ैक्ट चेक टीम ने इस वीडियो की हक़ीकत जानने के लिए पड़ताल शुरू की. बीबीसी को दिल्ली पुलिस के पीआरओ एमएस रंधावा ने बताया कि ''वीडियो के साथ ग़लत जानकारियां फैलाई जा रही हैं. पुलिस आग बुझाने का काम कर रही थी."

इसके बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा, "अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं कि पुलिस के लोगों ने बस को आग लगाया. वीडियो में DL1PD-0299 नंबर की बस नज़र आ रही है जिसे आग भी नहीं लगी. एक चिंगारी थी जिसे हम बुझाने में लगे थे. आपसे निवेदन है कि किसी तरह की अफ़वाहों पर यकीन न करें."

इसके बाद बीबीसी की टीम दिल्ली के न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी पुलिस स्टेशन पहुंची. यहां भारी संख्या में पुलिस बल हेलमेट पहने और हाथों में लाठियां लिए खड़ी थी. हमारी मुलाक़ात एडिशनल थाना इंचार्ज मनोज वर्मा से हुई.

जामिया का छात्र और पुलिस का टकराव
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जामिया का छात्र और पुलिस का टकराव

जब हमने उन्हें ये वीडियो दिखाया गया तो उन्होंने बताया. "ये वीडियो हमारे इलाक़े का ही है. आप देखिए कि वीडियो में जो बस खड़ी है उसमें आग नहीं लगी है. इसे तोड़ा गया है. हमारी बाइकों को आग लगा दिया गया. हम उसे बुझाने का काम कर रहे थे."

घटनास्थल पर अब ये बस मौजूद नहीं है. इसे डीटीसी डिपो भेजा जा चुका है. पुलिस के दावे के मुताबिक़ ये बात सही है कि बस में आग नहीं लगी और पास में एक बाइक जल भी रही है.

इसके बाद हमने पूछा कि क्या इस मामले में पुलिस ने कोई एफ़आईआर दर्ज की है, इस पर उन्होंने पहले तो कहा कि अभी नहीं. लेकिन जब उनसे दोबारा ये सवाल किया गया तो उन्होंने बताया, "एफ़आईआर दर्ज हुई है उसमें कुछ नाम भी शामिल हैं लेकिन हम आपको दिखा नहीं सकते क्योंकि ये मामला काफ़ी गंभीर है."

इस इलाक़े में हमें चार जली हुई डीटीसी की बसें, कुछ बाइकें और एक पूरी तरह से टूटी हुई बस और कार नज़र आई.

बीबीसी ने इस मामले पर मनीष सिसौदिया का रुख जानने के लिए उन्हें संपर्क किया लेकिन उनकी ओर से हमारी फ़ोन कॉल का कोई जवाब नहीं दिया गया.

एनडीटीवी के पत्रकार अरविंद गुनशेखर का कहना है कि वे घटनास्थल पर मौजूद थे. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "नहीं, भीड़ ने दोपहिया वाहनों पर आग लगाई. पुलिस के लोग इसे बुझाने का काम कर रहे थे. मैं वहां मौजूद था. ये एक अनियंत्रित भीड़ थी. ये प्रदर्शन करने का कोई तरीक़ा नहीं है."

इस घटना के कुछ चश्मदीदों से हमने बात की. घटनास्थल के पास एक घर के सिक्योरिटी गार्ड राहुल कुमार ने हमें बताया कि "ये घटना रविवार को लगभग दो से तीन बजे की है. बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों का हुजूम आया और तभी आग लगा दी गई. हमने नहीं देखा कि पुलिस ने आग लगाई हो."

जमिया
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हालांकि उन्होंने कैमरे पर हमसे बात करने से इनकार कर दिया.

कुल मिलाकर बीबीसी ने अपनी पड़ताल में पाया कि जिस बस का वीडियो शेयर करके पुलिस पर सार्वजनिक संपत्तियों को नुक़सान पहुंचाने का आरोप लगाया जा रहा है, वो ग़लत है.

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