जैश-ए-मोहमम्द के बालाकोट कैंप में थी 600 लोगों के रहने की क्षमता, जम्मू-कश्मीर में एंट्री के थे 4 रास्ते
नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना ने मंगलवार तड़के पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट में चल रहे ट्रेनिंग कैंप को नष्ट कर दिया। विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस गैर-सैन्य हमले की पुष्टि की है। जैश-ए- मोहम्मद के इस आतंकी संगठन के बारे में कई खुलासे खुफिया रिपोर्ट में हुए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद बालाकोट में एक मस्जिद की आड़ में अपना कैंप चला रहा था। यह ट्रैनिंग कैंप छह एकड़ में फैला हुआ था जहां पांच से छह इमारतें थीं। इन इमारतों में 600 से ज्यादा लोगों के रहने की क्षमता थी।

'जेहादी बनाने के लिए दिखाए जाते थे वीडियो'
अधिकारियों ने खुफिया रिपोर्टों के आधार पर जानकारी दी है कि जैश-ए-मोहम्मद बालाकोट में मस्जिद की आड़ में चलने वाले कैंप का इस्तेमाल अपना प्रोपेगैंडा चलाने के लिए करता था। यहां युवाओं को साल 2002 के गुजरात के गोधरा दंगे और आईसी 814 विमान के हाईजैकिंग से संबंधित वीडियो दिखाए जाते थे।

'चार रास्तों से घाटी में भेजे जाते थे आतंकी'
खुफिया रिपोर्टों से मिली जानकारी के आधार पर एक अधिकारी ने बताया कि ट्रेनिंग देने के बाद आतंकियों को जम्मू-कश्मीर में आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए भेज दिया जाता था। मुख्यत: चार रास्तों के जरिए आतंकियों को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कराया जाता था। बालाकोट-केल-दुधनियाल, केल-कैंथावली, केल-लोलब जिला और केल-कचामा क्रालपोरा के रास्तों से ट्रेनिंग पाए हुए आतंकी जम्मू-कश्मीर में दाखिल होते थे। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि ये सभी रास्ते घाटी में कुपवाड़ा जिले तक जाते हैं।

कैंप में कराए जाते थे कई तरह के कोर्स
खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक कैंप में आतंकियों को कई तरह के कोर्स के कराए जाते थे। इसमें तीन महीने की युद्ध करने की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसे दौरा-ए-खास नाम के नाम से बुलाया जाता था। वहीं दौरा-ए-राद नाम के कोर्स से तीन महीनों में नए लड़ाके तैयार किए जाते थे। इन आतंकियों को एके 47, मशीन गन, एलएमजी, रॉकेट लॉन्चर आदि हथियार चलाने सिखाये जाता थे। हथियारों की ट्रेनिंग के अलावा इन्हें जंगलों रहते हुए कैसे रहा जाता सकता है, ये भी सिखाया जाता था।आतंकियों को घात लगा कर कैसे हमला करें और जीपीएस व नक्शे का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग भी दी जाती थी। अधिकारियों के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद से पहले हिजबुल मुजाहिदीन इस कैंप का इस्तेमाल करता था।












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