10 सालों में घट गई नौकरियां, जुमलेबाजी से नही बदलेगी सच्चाई, मोदी सरकार के आंकड़ों पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
Congress slams Modi Govt: सोमवार को प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार के रोजगार के 8 करोड़ अवसर पैदा करने संबंधी दावे पर पलटवार किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मोदी सरकार के दावे को भी आधा सच बताकर खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि कोई भी जुमलेबाजी इस तथ्य को नहीं बदल सकती कि 2014-24 के मध्य नौकरियों में कमी आई है।
ज्ञात हो कि केंद्र की एनडीए सरकार ने अपने बयान कहा है कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच देश में रोजगार के 8 करोड़ अवसर पैदा हुए हैं। मोदी सरकार ने यह भी कहा कि ईपीएफओ डेटाबेस में 6.2 करोड़ नए ग्राहक जुड़े हैं।

रिजर्व बैंक के डेटा पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि इस डगमगाती सरकार के बीते कुछ महीनों में 'यू-टर्न और घोटालों' के बीच अपने आर्थिक रिकॉर्ड में कुछ सांत्वना खोजने का प्रयास किया है। उन्होंने आगे कहा कि 'सरकार ने जुमलेबाजी से एक और आंकड़ा प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार सितंबर 2017 से मार्च 2024 के बीच कर्मचारी भविष्य निधि संगठन डेटाबेस में 6.2 करोड़ नए सदस्य जुड़े हैं।
जयराम रमेश में आगे जोड़ा कि यह दावा सबसे पहले रिजर्व बैंक के KLEMS डेटा से सामने आया था,जबकि कांग्रेस जुलाई में ही इस दावे का खंडन कर चुकी हैं।जयराम रमेश ने कहा कि 8 करोड़ नई नौकरियों के अपने दावे में सरकार ने रोजगार की गुणवत्ता और परिस्थितियों को अनदेखा किया है। उन्होंने दावा किया कि रोजगार में बढ़ोत्तरी का एक बड़ा हिस्सा उन महिलाओं का है, जो असंगठित तौर पर घरेलू कार्य करती हैं,जबकि सरकार ने उसे रोजगार के रूप में दर्ज किया है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि श्रम बाजार में वेतनभोगी, संगठित रोजगार की हिस्सेदारी घटी है और लोग श्रमिक या कम उत्पादकता वाले अनौपचारिक क्षेत्रों जैसे खेती में कार्य कर रहे हैं, जिन्हें रिजर्व बैंक के KLEMS के डेटा में शामिल किया गया है।
जयराम रमेश ने तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि कोरोना महामारी के दौरान रोजगार में बढ़ोत्तरी इसी ओर इशारा करती है, क्योंकि उस दौरान अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बंद हो गया था। 2020-21 के बीच कई औपचारिक तौर से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नौकरियों में 12 लाख की कमी देखी गई थी। वहीं कृषि क्षेत्र में 1.8 करोड़ नई नौकरियां पैदा हुईं थी। दरअसल कारखाने और कंपनियों के बंद होने से लोग अपने घर वापस लौट आए,तब उन्होंने अपने घर पर खेती से काम शुरू किए, जिन्हें सरकार ने नई नौकरियों के तौर पर दर्ज कर लिया है।
जयराम रमेश ने कहा कि कम उत्पादकता, खराब वेतन वाली नौकरियों की ओर यह बदलाव मजाक है, किंतु सरकार इसे एक उपलब्धि के रूप में प्रदर्शित कर रही है। देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी होने का दावा करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि ईपीएफओ के संबध में किए गए दावे में इस बात की अनदेखी की जा रही है कि ईपीएफओ केवल संगठित क्षेत्र को ट्रैक करता है, जो देश में कुल रोजगार का 10 फीसदी से भी कम है। साथ ही अब ईपीएफओ में पंजीकरण प्रक्रिया सरल हो गई है। ऐसे में ईपीएफओ के सदस्य बिना अंतिम निपटान किए अब नियोक्ता बदलते वक्त अपने पीएफ खातों को स्थानांतरित कर सकते हैं।
उन्होंने आगे जोड़ा कि कई सेवानिवृत्त लोग अच्छा रिटर्न की चाह में अपना पैसा नहीं निकालते हैं, उन्हें भी ईपीएफओ के डेटा में नियोजित प्रदर्शित जाता है।
जयराम रमेश ने मोदी सरकार के दावों को आंकड़ों की बाजीगरी बताया दऔर कहा कि यह सच्चाई है कि भारत में बेरोजगारी दर 45 सालों में सबसे ज्यादा है। स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 42 फीसदी है। जयराम रमेश ने कहा कि यह संकट सरकार ने स्वयं खड़ा किया है और इसके कारण नोटबंदी जैसा तुगलकी फरमान, जल्दबाजी में जीएसटी लागू करने का निर्णय, अनियोजित कोरोना लॉकडाउन और चीन से बढ़ता आयात है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की आर्थिक नीति कुछ बड़े व्यापारिक समूहों के पक्ष में है, जिससे प्रतिस्पर्धा समाप्त हो रही है और मुद्रास्फीति पर प्रभाव पड़ रहा है ।
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