ITBP ने पहली बार बदली रणनीति, क्यों लिया LAC पर खुद सड़क निर्माण का फैसला ? जानिए

नई दिल्ली, 7 नवंबर: भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने पहली बार भारत-चीन सीमा पर सड़कें और फुट ट्रैक बनाने का फैसला किया है। इसके लिए आईटीबीपी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास अपने विशेष इंजीनियरिंग विंग को तैनात करेगा। पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी गतिरोध के बीच में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उसकी योजना को मंजूरी भी दे दी है। अबतक सीमावर्ती इलाकों में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों का निर्माण मुख्य रूप से सीमा सड़क संगठन के जिम्मे रहता था और पिछले कुछ वर्षों में उसने इस काम में ऐतिहासिक सफलता भी हासिल करके दिखाई है।

चीन की सीमा पर कुछ जगह आईटीबीपी खुद बनाएगी सड़क

चीन की सीमा पर कुछ जगह आईटीबीपी खुद बनाएगी सड़क

आईटीबीपी के अफसरों ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा है कि उसने भारत-चीन सीमा सड़क प्रोजेक्ट(आईसीबीआर) के फेज-2 की 32 सड़कों में से चार के निर्माण की चुनौती अपने हाथों में ली है। इसके अलावा सरकार ने जो कुल 18 फुट ट्रैक को मंजूरी दी हुई है, उसमें से भी दो का निर्माण अब खुद भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का इंजीनियरिंग विंग करेगा। उन्होंने कहा है कि हिमालय के इलाके में 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी पर लद्दाख क्षेत्र में आईटीबीपी के बॉर्डर पोस्ट को जोड़ने वाली इन सड़कों की लंबाई 1 से 2 किलोमीटर के बीच की होगी। जबकि, फुट ट्रैक का निर्माण अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में होना है, जिसका ये फोर्स पेट्रोलिंग के लिए इस्तेमाल करती है। सूत्रों के मुताबिक इन सड़कों और फुट ट्रैक के निर्माण की योजना बनाने और निगरानी का जिम्मा आईटीबीपी के इंजीनियर और सुपरवाइजर खुद संभालेंगे। जबकि निर्माण कार्यों में इस्तेमाल किए जाने वाले मजदूरों और राजमिस्त्रियों को सरकारी मानकों के मुताबिक काम पर लगाया जाएगा।

बॉर्डर पोस्ट पर तेजी से कनेक्टिविटी बढ़ाना है मकसद

बॉर्डर पोस्ट पर तेजी से कनेक्टिविटी बढ़ाना है मकसद

गौरतलब है कि परंपरागत तौर पर सीमावर्ती इलाकों में सड़कों के निर्माण का जिम्मा सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) और सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (सीपीडब्ल्यूड) जैसी एंजेंसियां करती हैं। लेकिन, आईटीबीपी के अधिकारियों के मुताबिक इस काम में उसके इंजीनियरिंग विंग को इसलिए लगाया जा रहा है ताकि बॉर्डर पोस्ट की कनेक्टिविटी के काम में तेजी लाई जा सके। यह इंजीनियरिंग विंग आईटीबीपी की 1962 में हुई स्थापना के साथ ही से उसका अहम हिस्सा रहा है। दरअसल, ऊंचाई वाले स्थानों और दूर-दराज के क्षेत्रों में निर्माण के लिए ठेकेदारों और निर्माणकर्मियों का उपलब्ध होना आसान नहीं रहता, इसी के चलते सड़क निर्माण का काम भी धीमा रहा है।

आईटीबीपी का इंजीनियरिंग विंग क्या करता है ?

आईटीबीपी का इंजीनियरिंग विंग क्या करता है ?

सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़े, ताकि राशन, जवानों की तैनाती और एलएसी पर लॉजिस्टिक पहुंचाने में आसानी हो। अधिकारियों के मुताबिक इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। आमतौर पर आईटीबीपी का इंजीनियरिंग विंग इसके ऑपरेशन स्ट्रक्चर के निर्माण का काम देखता है, जिसमें 'सीमावर्ती आउटपोस्ट बनाना, आवासीय और कार्यालय भवनों का निर्माण, सोलर लाइट लगाना, पावर यूनिट स्थापित करना, वॉटर हीटिंग सिस्टम की व्यवस्था, सीमा चौकी के आसपास सामरिक सुरक्षा के लिए विशेष निर्माण करना और बर्फ से ढके सीमावर्ती क्षेत्रों में ग्रीन हाउस और सूक्ष्म जल विद्युत जैसी परियोजनाएं तैयार करने जैसे काम शामिल हैं।'

1962 में चीन के हमले के बाद हुआ था गठन

1962 में चीन के हमले के बाद हुआ था गठन

भारत-चीन सीमा सड़क प्रोजेक्ट (आईसीबीआर) के फेज-1 की शुरुआत 2005 में की गई थी, जिसमें गृह मंत्रालय की निगरानी में कई सारी सड़कें, हेलीपैड और सैनिक अड्डे बनने थे और उसपर भी काम जारी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल नवंबर तक चीन सीमा पर 538.50 किलोमीटर सड़क बनाई जा चुकी हैं। 1962 में चीन के हमले का बाद आईटीबीपी का गठन किया गया था और यह 90,000 कर्मियों वाला यह फोर्स देश का महत्वपूर्ण अर्धसैनिक बल है।

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