क्या जी-23 को काउंटर करने के लिए राहुल कभी बना रहे रायता तो कभी मार रहे मछलियां?

क्या जी-23 को काउंटर करने के लिए राहुल कभी बना रहे रायता तो कभी मार रहे मछलियां??

नई दिल्ली। क्या राहुल गांधी ग्रुप 23 को काउंटर करने के लिए अपनी नयी छवि बना रहे हैं ? जी-23 के नेताओं ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमत पर सवाल उठया था। उन्होंने कहा था कि राहुल गांधी का जनता से सीधा जुड़ाव नहीं है इसलिए कांग्रेस को नुकसान हो रहा है। तो क्या सवाल के जवाब के लिए ही वे कभी प्याज का रायता बना रहे हैं, कभी मछुआरों संग समंदर मछलियां मार रहे हैं, कभी वनहैंड पुशअप कर रहे हैं तो कभी फोकडांस कर रहे हैं ? क्या इन बातों से राहुल गांधी की छवि बदलेगी ? क्या ऐस कर के वे जनता के नेता कहलाने लगेंगे ? फिलहाल राहुल गांधी के सामने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं जिनमें उन्हें अग्निपरीक्षा से गुजरना है। लेकिन जी-23 के नेता आनंद शर्मा ने पश्चिम बंगल में कट्टरपंथी अब्बास सिद्दीकी से चुनावी समझौते का विरोध कर कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़ कर दिया है। अगर कांग्रेस के बागी इसी तरह राहुल गांधी का विरोध करते रहेंगे तो चुनावी कश्ती का डगमगाना तय है।

बागियों पर सोनिया गांधी एक्शन क्यों नहीं लेती ?

बागियों पर सोनिया गांधी एक्शन क्यों नहीं लेती ?

बागी राहुल गांधी का खुल कर विरोध कर रहे हैं फिर भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही ? ऐस क्यों ? कभी इंदिर गांधी को भी कांग्रेस के स्थापित और बुजुर्ग नेताओं का विरोध झेलन पड़ा थ। वह भी एक नहीं दो बार। लेकिन इंदिरा गांधी ने कभी बागियों की परवाह नहीं की। उनको दरकिनार कर आगे बढ़ती गयीं। वे ऐसा इसलिए कर सकीं क्यों कि वे एक शक्तिशाली नेता थीं। वे साहसिक फैसले लेती थीं और उन्हें कामयाबी से लागू करती थीं। इसलिए जनता भी उन्हें पसंद करती थी। लेकिन राहुल गांधी के पास वैसी ताकत नहीं है। उनमें अपने दम पर पार्टी को जिताने की कुव्वत नहीं है। जब आप खुद बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हों तो ऐसे नेतृत्व करना आसान नहीं होता। चूंकि राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है इसलिए पार्टी में सवाल उठाने वालों की फौज खड़ी हो गयी है।

कांग्रेस में इंदिरा गांधी का विरोध

कांग्रेस में इंदिरा गांधी का विरोध

1964 में जब जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया तो कांग्रेस के सामने नया प्रधानमंत्री चुनने का सवाल खड़ा हुआ । नेहरू के बाद कौन ? उस समय तमिलनाडु के नेता कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष थे। पार्टी पर उनकी ऐसी मजबूत पकड़ थी कि उनकी इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं डोलता था। कामराज की इच्छा के अनुरूप लालबहादुर शास्त्री और फिर उनके बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी कामराज की बढ़ती ताकत से खुश नहीं थीं। इसी बीच 1967 का चुनाव हुआ। कांग्रेस विरोधी लहर में कामराज अपने गृहराज्य तमिलनाडु में चुनाव हार गये। तब इंदिरा गांधी ने प्रस्ताव रखा कि चुनाव हारे हुए नेता नैतिकता के आधार पर अपना पद छोड़ दें। कामराज को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन कामराज ने अपने ही समर्थक एस निजिलिंगप्पा को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया। परदे के पीछे से कामराज ही अहम फैसला लेते। तब कांग्रेस में कामराज, निजिलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, एस के पाटिल और अतुल्य घोष के गुट को सिंडिकेट के नाम से पुकारा जाता था। यह गुट इंदिरा गांधी को अपने नियंत्रण में रखना चाहता था। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी रणनीति से इनको धाराशायी कर दिया।

सिंडिकेट को चैलेंज

सिंडिकेट को चैलेंज

मई 1969 में राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मौत हो गयी। अब नये राष्ट्रपति का चुनाव जरूरी हो गया। कांग्रेस ने नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित किया। इंदिरा गांधी ने इसकी अनदेखी कर वीवी गिरी को पर्चा दाखिल करने को कह दिया। अब मतदान की नौबत आ गयी। तब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस सांसदों से अंतर्आत्मा की आवाज पर वोट देने को कहा। उनके कहने का संकेत था कि कांग्रेस के सांसद वीवी गिरी को वोट करें। यह पार्टी के शक्तिशाली गुट सिंडिकेट को खुल्लमखुल्ला चैलेंज था। चुनाव हुआ। कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी हार गये। वीवी गिरी को जीत मिली। वीवी गिरी के जीतने से कांग्रेस सिंडिकेट के नेता आगबबूला हो गये। उन्होंने कांग्रेस पार्टी की एक बैठक बुलायी। इस बैठक में इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकालने का प्रस्ताव पास कर दिया गया।

इंदिरा गांधी का साहस

इंदिरा गांधी का साहस

इसके बाद कांग्रेस संसदीय दल के नये नेता के चुनाव का आदेश जारी हुआ। यानी इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से बेदखल करने की तैयारी शुरू हो गयी। लेकिन इंदिरा गांधी ऐसी साहसिक महिला थी कि उन्होंने इस स्थिति का सामना करने का फैसला किया। उन्होंने संसदीय दल के नेता के चुनाव में अपने पक्ष में जबर्दस्त माहौल बनाया। जब वोटिंग हुई तो इंदिरा गांधी यह चुनाव जीत गयीं। इसके बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस का विभाजन हो गया। मोरारजी गुट ने कांग्रेस ओ (संगठन) के नाम से एक नया दल बनाया। लेकिन बाद में वहीं कांग्रेस जिंदा रही जिसकी अगुवाई इंदिरा गांधी ने की। इसी तरह 1978 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रह्मानंद रेड्डी से इंदिरा गांधी की ठन गयी थी। 1977 में चुनाव हारने के कारण कांग्रेस के कुछ नेता इंदिरा गांधी को हाशिये पर डालना चाहते थे। 1978 में रेड्डी ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया। इससे नाराज इंदिरा समर्थकों ने उसी दिन कांग्रेस आइ (इंदिरा) के नाम से नये दल की घोषणा कर दी। बाद में कांग्रेस आइ ने ही पार्टी की विरासत को आगे बढ़ाया। इंदिरा गांधी ने अपने विरोधियों की हर चाल को नाकाम किया। लेकिन सवाल ये है कि राहुल और सोनिया गांधी क्यों नहीं ऐसा कर पा रहे ? अगर यूं लाचार रहेंगे तो क्या कांग्रेस का भला होगा ?

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