मोदी से भाजपा.. भाजपा से मोदी नहीं

बैंगलोर। देश में लोकसभा चुनावों को लेकर सरगर्मियां जारी हैं, भारत की दोनों बड़ी पार्टियों के नेता देश भर में रैलियों का आयोजन कर रहे हैं। जहां कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के रूप में अपना भविष्‍य देख रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी को अपने प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी से काफी उम्‍मीदें हैं। मोदी इन दिनों देश के अलग अलग हिस्‍सों में दौरा कर व्‍यापारियों, छात्र और आम मतदाताओं को सम्‍बोधित कर रहे हैं। उनकी रैलियों में भीड़ भी देखने को मिल रही है, इसे भाजपा के लिए एक अच्‍छा संकेत माना जा रहा है, पर एक सच यह भी है कि देश के युवा मोदी को तो सुन रहे हैं लेकिन उन्‍हें भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिंह नहीं पता है।

जी हां, ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि भाजपा और संघ परिवार द्वारा कराये गये सर्वे के परिणाम बता रहे हैं। जिसमें मोदी की लोकप्रियता पार्टी से अधिक है। यह संभवत: पहली बार है जब व्‍यक्ति दल से बड़ा नजर आ रहा है, मतलब जो काम लाल कृष्‍ण आडवाणी पांच दशकों में नहीं कर सके, उसे मोदी ने तीन दशकों में ही करके दिखा दिया। अब यही बात भाजपा के अन्‍य नेताओं को चुभ रही है जो कि पहले भी कह चुके हैं कि चुनाव किसी एक व्‍यक्ति के नेतृत्‍व में नहीं बल्कि पार्टी को आगे रखकर लड़ा जाना चाहिए।

इस पर राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि मोदी ही वह शख्‍स हैं जो कि इन दिनों भाजपा की पहचान बने हुए हैं, अगर उन्‍हें पार्टी से अलग कर दिया जाए तो भाजपा के सत्‍ता में आने का सपना और मुश्किल हो सकता है। भले ही पार्टी नेताओं और संघ को यह बात चुभती हो कि लोग मोदी को पहचानते हैं लेकिन पार्टी के चुनाव चिह्न 'कमल' को नहीं, इस बात का दर्द होता है उनको, लेकिन इसी दर्द को जीने में उन्हें मजा मिलेगा क्योंकि वह जानते हैं कि किसी बीमारी के इलाज की शुरूआत दर्द से ही होती है।

देखिए ऐसे कौन से कारण हैं जो कि मोदी को पार्टी से ऊपर दिखाते हैं-

दृढ़ व्‍यक्तित्‍व

दृढ़ व्‍यक्तित्‍व

काफी लंबे समय बाद भारतीय राजनीति में एक ऐसा नेता दिख रहा है कि जो कि दृढ़ दिखता है और प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार है। वहीं वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 'कमजोर प्रधानमंत्री' की छवि भी मोदी के लिए 'प्‍लस प्‍वाइंट' बन गयी है। मतलब देश की जनता को उम्‍मीद है कि मोदी भारत को एक मजबूत नेतृत्‍व दे सकते हैं जो कि देश को वर्तमान समस्‍याओं से निजात दिला सकते हैं।

कार्यकर्ताओं की पसंद

कार्यकर्ताओं की पसंद

गोवा की कार्यकारिणी बैठक में मोदी को जब चुनाव प्रचार समिति का अध्‍यक्ष घोषित किया गया तो इससे आडवाणी नाराज हो गये। मतलब कार्यकर्ता आज मोदी को आडवाणी से ज्‍यादा प्रमुखता देते हैं। यह बात कई अन्‍य नेताओं को भी सालती है कि वह आज पार्टी बड़े दिख रहे हैं।

देश की जरूरत को समझते हैं

देश की जरूरत को समझते हैं

मोदी इस बात को बेहतर ढंग से समझते हैं कि देश का पचास फीसदी से ज्‍यादा मतदाता युवा है, जो कि विकास चाहता है कि उसे किसी खास मजहब से कोई लेना देना नहीं है। वहीं मोदी भी अपने भाषणों से जाहिर कर चुके हैं कि उनके लिए विकास ही एकमात्र मुद्दा है वह अपनी तथाकथित हिंदुत्‍ववादी नेता की छवि से भी इतर दिख रहे हैं।

तानाशाही व्‍यक्तित्‍व

तानाशाही व्‍यक्तित्‍व

मोदी पर विपक्षी दल फासिस्‍ट और तानाशाही होने के आरोप लगा रहे हैं, लेकिन उनकी यही छवि देश के मतदाताओं को लुभा रही है। युवाओं को लगता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा समस्‍याओं को वहीं व्‍यक्ति हल कर सकता है, जो स्‍वतंत्रता से कड़े फैसले कर सके, हर बात के लिए उसे पार्टी आलाकमान की इजाजत न लेनी पड़े, जैसा कि मनमोहन सिंह को बतौर प्रधानमंत्री करना पड़ता है।

नयी सोच नयी उम्‍मीद

नयी सोच नयी उम्‍मीद

भाजपा ने अपने पोस्‍टरों में भी मोदी को नयी सोच के व्‍यक्ति के रूप में दिखाया है। जिसके पास देश को लेकर एक विकास मॉडल है। जो कि मतदाताओं में नई उम्‍मीद भी पैदा करता है।

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