मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: क्या कांग्रेस का असली काम दिग्विजय सिंह कर रहे हैं?

दिग्विजय सिंह
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दिग्विजय सिंह

अमित भोपाल में चिनार पार्क के सामने कांग्रेस की प्रचार सामग्रियां बेच रहे हैं. बगल में ही कांग्रेस कार्यालय है. शाम का वक़्त है और अचानक 'दिलीप भैया ज़िंदाबाद' के नारे गूंजने लगे.

ये नारे किसी स्थानीय नेता के समर्थन में कांग्रेस के कार्यकर्ता लगा रहे हैं. इन्होंने दिलीप भैया को माला पहनाई और साथ में सेल्फी ली.

अमित के बगल में रघुनाथ भी प्रचार सामग्री बेच रहे हैं. अमित के स्टॉल के सामने एक कार रुकती है और उसमें बैठे लोग कांग्रेस के झंडे की क़ीमत पूछते हैं.

अमित
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अमित

कार में बैठे लोग कहते हैं कि कपड़ा ठीक नहीं और क़ीमत ज़्यादा है. अमित झंडे को वापस मोड़कर रख लेते हैं. अमित का कहना है कि आज धंधा बहुत मंदा रहा.

वहीं खड़े एक युवक ने कहा कि बीजेपी का भी बेचो. अमित ने उस सज्जन को कहा कि यहां से मेरी दुकान उखड़वाएंगे क्या?

भोपाल का कांग्रेस दफ़्तर
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भोपाल का कांग्रेस दफ़्तर

संगठन की कमज़ोरी और आर्थिक तंगी

रघुनाथ का कहना है कि जब कमलनाथ आते हैं तो बिक्री बढ़ जाती है. वो प्रचार सामग्री ज़्यादा नहीं बिकने की एक वजह ये भी बताते हैं, ''कांग्रेस के पास पैसा कहां है. 15 साल से तो बीजेपी है. पैसा तो उन लोगों के पास है.'' उस युवक ने तभी तपाक से कहा, ''इसीलिए तो कह रहा हूं कि बीजेपी का बेचो.'' रघुनाथ कुछ जवाब नहीं देते हैं.

यहां के कांग्रेस दफ़्तर का नाम इंदिरा भवन है. दफ़्तर के बाहर इंदिरा गांधी की बड़ी सी मूर्ति लगी है. तीसरे फ्लोर पर राज्य के चुनाव प्रभारी दीपक बाबरिया एक बंद हॉल में कांग्रेस नेताओं से घिरे हैं.

कुछ ज़िला अध्यक्ष बनाने की गुज़ारिश कर रहे हैं तो कुछ लोग ज़िला अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष.

वहीं बैठे एक सज्जन बुंदेलखंड के लिए गाड़ी की मांग कर रहे हैं और वो चाहते हैं कि गाड़ी वीआईपी हो. दीपक बाबरिया ने अपने बैग से काग़ज निकाला और कहा कि नीचे चले जाइए. कुछ ही मिनट में वो फिर वापस आए गए और उनके साथ आया दूसरा आदमी बताने लगा कि गाड़ी क्यों नहीं दे सकते. तीनों के बीच बात हुई लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला.

दीपक बाबरिया
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दीपक बाबरिया

कांग्रेस का कहना है कि वो 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में वो एकजुट नहीं थी और इस बार पूरी तरह से एकजुट है. हालांकि कांग्रेस की समस्या केवल एकजुटता में कमी नहीं है. प्रदेश में कांग्रेस संगठन की कमज़ोरी और लंबे समय से सत्ता से बाहर होने के कारण आर्थिक तंगी से भी जूझ रही है. इसके साथ ही कांग्रेस के पास प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की तरह लोकप्रिय चेहरा नहीं है.

दीपक बाबरिया इस बात को स्वीकार करते हैं लेकिन कहते हैं कि प्रदेश की वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़ इतना ग़ुस्सा है कि कांग्रेस सभी चुनौतियों से निपट लेगी. वो कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान के जवाब में पार्टी ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुना है. बाबरिया का कहना है कि इन्हीं दोनों में से एक को कांग्रेस चुनाव के बाद आगे करेगी.

दिग्विजय का काम

लेकिन क्या कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर के भरोसे ही बैठी है?

वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में इस बार का चुनाव पिछले तीन चुनावों से बिल्कुल अलग है. ये बात सही है कि पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस एकजुट नहीं थी. इस बार तो दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी ने सबसे बड़ा काम दिया है. मुझे लगता है कि यह काम उनके अलावा कांग्रेस में कोई कर भी नहीं सकता है. वो हर दिन पार्टी के बाग़ियों को पकड़ दफ़्तर लाते हैं और कमलनाथ के पास भेज देते हैं. दिग्विजय सिंह की ख़ूबी ये है कि प्रदेश के हर ज़िले में उनके लोग हैं और उनमें लोगों को मनाने की क़ाबिलियत भी है.''

दिग्विज़य
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दिग्विज़य

श्रीधर मानते हैं कि इस बार के चुनाव में कांटे की टक्कर है. वो कहते हैं कि लोगों को समस्या शिवराज सिंह चौहान से नहीं है बल्कि मंत्रियों और विधायकों से है.

कांग्रेस के दफ़्तर में दिग्विजय सिंह, सिंधिया और कमलनाथ के अलग-अलग कमरे हैं. सिंधिया रैलियां कर रहे हैं इसलिए दफ़्तर में कम ही दिखते हैं. वहीं दिग्विजय सिंह का आना जाना लगा रहता है. कांग्रेस कार्यकर्ता भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि दिग्विजय सिंह ने कई बाग़ियों को मनाया है.

कांग्रेस बीजेपी के 15 साल के शासनकाल की जमकर आलोचना तो करती है लेकिन जैसे ही दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासनकाल की बात आती है तो कोई मुक़म्मल जवाब नहीं दे पाती है. हालांकि बुधनी में शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ कांग्रेसी उम्मीदवार अरुण यादव ने बातों-बातों में कह ही दिया कि उसी का ख़ामियाजा पार्टी पिछले 15 सालों से भुगत रही है.

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'दिग्विजय की छवि ख़राब की गई'

दीपक बाबरिया और शोभा ओझा से यही सवाल पूछा कि दिग्विजय सिंह ने 10 साल में ऐसा क्या कर दिया था कि कांग्रेस 15 साल तक सत्ता में नहीं लौटी?

शोभा ओझा कहती हैं कि फंड की कमी थी और छत्तीसगढ़ बनने के बाद ऊर्जा के सारे स्रोत वहीं चले गए थे. हालांकि छत्तीसगढ़ साल 2000 में बना था और दिग्विजय सिंह की सरकार 2003 में चली गई थी. दूसरी बात यह कि तब छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की ही सरकार थी. दीपक बाबरिया पार्टी में एकजुटता के अभाव को कारण मानते हैं.

मध्य प्रदेश में चुनावों पर नज़र रखने वाले इस बात को स्वीकार करते हैं कि कांग्रेस इस बार एकजुट है. लेकिन इनका कहना है कि कांग्रेस के पास शिवराज के टक्कर का कोई नेता नहीं है. कमलनाथ और सिंधिया के बारे में इनकी राय है कि ये पूरे प्रदेश को ठीक से नहीं जानते हैं और जो दिग्विजय सिंह जानते हैं उनकी छवि ठीक नहीं है.

श्रीधर भी कहते हैं कि कांग्रेस के साथ इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती यही है. वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया का भी यही मानना है कि शिवराज सिंह को चुनौती देने की क़ाबिलियत दिग्विजय सिंह में ही है, लेकिन उनकी छवि को ख़राब करने में बीजेपी ने बड़ी सफलता हासिल की है.

बीजेपी के प्रवक्ता भी नाम न छापने की शर्त पर दबी ज़ुबान में यह कहते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास असली नेता दिग्विजय सिंह ही थे. एक भाजपा प्रवक्ता ने कहा, ''कांग्रेस के बड़े नेता तो दिग्विजय सिंह ही हैं. ऐसा इसलिए कि उनकी पकड़ प्रदेश के हर ज़िलों में ही नहीं बल्कि ब्लॉक स्तर तक उनके लोग हैं. लेकिन उनकी छवि ठीक नहीं है और कांग्रेस तो उनसे रैलियां भी नहीं करवा रही है.''

मध्य प्रदेश के मुसलमान
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मध्य प्रदेश के मुसलमान

मुसलमानों को टिकट?

‏शाम के 6 बजे चुके हैं और दीपक बाबरिया अब भी उसी बंद हॉल में हैं. लोगों की संख्या और बढ़ गई है. इस बार दीपक थोड़ा झल्ला कर बोलते हैं और कहते हैं कि अभी केवल चुनाव प्रचार की बात करो.

उसी दौरान एक साथी पत्रकार ने दीपक से सवाल पूछ लिया कि इस बार कांग्रेस मुसलमानों को टिकट देने से बचती दिखी. वहां बैठे कुछ मुस्लिम नेता उनके जवाब सुनने के लिए पूरी तरह से सतर्क हो गए और उनके चेहरे देखने से साफ़ लग रहा था कि यह उनका पसंदीदा सवाल था.

बाबरिया न चाहते हुए भी जवाब देते हैं, ''कांग्रेस को लोकतंत्र के मूल्यों और चुनावी राजनीति की मज़बूरियां जैसी चुनौतियों से टकराना होता है. ज़ाहिर है आज की चुनावी राजनीति में दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं. हमारे सामने विपक्षी पार्टी की रणनीति के कारण ये दुविधा होती है.''

बीजेपी के दफ़्तर जाएं तो साफ़ अहसास होता है कि उनके पास कोई दुविधा नहीं है. बीजेपी से पूछिए कि आपने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया तो उनका साफ़ जवाब होता है, ''हम जीतने वाले उम्मीदवार को टिकट देते हैं न कि धर्म के आधार पर.''

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