SC Hearing CAA: सुप्रीम कोर्ट में बहस! क्या धर्म बनेगा नागरिकता का आधार? 2019 से अब तक क्या हुआ- पूरी टाइमलाइन
SC Hearing CAA Timeline: नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 को लेकर देश की सबसे बड़ी न्यायिक लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में CAA की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 200 से अधिक याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू हो गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई 5 से 7 मई और फिर 12 मई को करेगी। माना जा रहा है कि 12 मई तक बहस पूरी होने के बाद अदालत अपना फैसला सुरक्षित रख सकती है।

साल 2019 में CAA संसद में पास होने के बाद से पूरे देश में भारी विरोध हुआ था, 2026 में पूरे 6 साल हो गए लेकिन नागरिकता पर फैसला अभी भी उलझा हुआ है। विस्तार से समझिए 2019 से 2026 तक इस CAA पर कोर्ट में क्या-क्या हुआ....
What Is Citizenship Amendment Act: क्या है CAA और क्यों हो रहा है विवाद?
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। विवाद की जड़ यह है कि इस कानून में मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया, जिससे इसे धर्म आधारित भेदभाव माना जा रहा है। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यह कानून भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार इसे एक 'सौम्य कानून' बता रही है। सरकार का तर्क है कि यह किसी की नागरिकता छीनने का नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश) में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हुए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का एक विशेष प्रावधान है।
SC CAA Timeline: CAA कानूनी सफर...अब तक की पूरी टाइमलाइन
CAA का मामला पिछले 6 सालों से देश की सबसे बड़ी अदालत के गलियारों में घूम रहा है। यहां देखें इस केस के प्रमुख पड़ाव:
11 दिसंबर 2019: संसद ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित किया। इसके तुरंत बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
दिसंबर 2019: इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने सुप्रीम कोर्ट में पहली चुनौती पेश की। जल्द ही याचिकाओं की संख्या 200 के पार पहुंच गई।
20 मई 2020: सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
11 मार्च 2024: केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले CAA नियम, 2024 अधिसूचित किए, जिससे कानून औपचारिक रूप से लागू हो गया।
19 मार्च 2024: तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने नियमों पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज किया और केंद्र से जवाब मांगा।
19 फरवरी 2026: मौजूदा CJI सूर्यकांत की पीठ ने मामले को 'अंतिम सुनवाई' के लिए ट्रैक पर रखा और मई की तारीखें तय कीं।
5 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट में अंतिम बहस शुरू हुई। कोर्ट ने पहले 'अखिल भारतीय' मुद्दों पर सुनवाई शुरू की है, जिसके बाद असम और त्रिपुरा के विशेष मामलों को सुना जाएगा।
CAA को लेकर SC में कौन हैं याचिकाकर्ता? क्या हैं उनका मुख्य तर्क?
इस मामले में दायर याचिकाएं अलग-अलग राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़ी हैं। प्रमुख याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस नेता जयराम रमेश, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, असम गण परिषद, कमल हासन की पार्टी मक्कल निधि मय्यम, असम के वकीलों का संगठन, केरल की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) शामिल हैं।
याचिकाओं में CAA को कई आधारों पर चुनौती दी गई है-
- यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है
- संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है
- भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे (Secularism) के खिलाफ है
- CAA का NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) के साथ खतरनाक संबंध है
असदुद्दीन ओवैसी का तर्क है कि NRC के जरिए लोगों को अवैध प्रवासी घोषित किया जाएगा, जबकि CAA उन्हीं में से गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने का रास्ता खोलता है, जो समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
अनुच्छेद 14 पर क्यों है सबसे ज्यादा बहस?
CAA पर सबसे बड़ा कानूनी सवाल अनुच्छेद 14 को लेकर उठ रहा है। अनुच्छेद 14 सभी लोगों को 'कानून के समक्ष समानता' और 'कानून का समान संरक्षण' देने की गारंटी देता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून किसी भी वर्गीकरण (classification) के आधार पर बनाया जा सकता है, लेकिन वह 'तार्किक और गैर-भेदभावपूर्ण' होना चाहिए। CAA में धर्म के आधार पर वर्गीकरण किया गया है, जो मनमाना और असंवैधानिक है।वहीं, केंद्र का तर्क है कि यह वर्गीकरण उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के आधार पर है, न कि केवल धर्म के आधार पर है इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
19 मार्च 2024 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने CAA के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई के बाद ही लिया जाएगा। सभी पक्षों को अपने-अपने तर्क रखने का पूरा मौका दिया जाएगा यानी कोर्ट ने कानून को तुरंत रोकने से मना किया, लेकिन उसकी वैधता पर अंतिम फैसला सुरक्षित रखा।
क्या हैं कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती?
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि- क्या नागरिकता प्रदान करने के लिए 'धर्म' को एक मानदंड बनाया जा सकता है? क्या पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को दी गई यह राहत 'तर्कसंगत वर्गीकरण' के दायरे में आती है?क्या नए नियम राज्यों की शक्तियों और जिला कलेक्टरों की भूमिका को कम करते हैं? क्या CAA असम में 1971 की कट-ऑफ तारीख का उल्लंघन करता है?
12 मई तक सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख सकता है। यह फैसला भारत में नागरिकता कानून, समानता के अधिकार और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को लंबे समय तक प्रभावित करेगा। अब पूरे देश की नजर इस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि नागरिकता के सवाल पर संविधान की सीमाएं और व्याख्या क्या होगी।














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