OPINION: तेलंगाना में बीजेपी बेपरवाह है या गुटबाजी की शिकार हुई?
Telangana BJP: तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति राज्य के अधिकांश राजनीतिक पंडतों के लिए एक पहेली साबित हुई है। बेहतरीन मत के लिए 2021 से पार्टी के सफर पर गौर करना पड़ेगा। 2018 में बीआरएस (तत्कालीन टीआरएस) को दूसरा कार्यकाल मिलने के बाद, कांग्रेस पार्टी को राज्य में अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ा और उसे टीडीपी के साथ गठबंधन करने का खामियाजा भुगतना पड़ा, वो पार्टी जिसने तेलंगाना के गठन के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
2018 में 18 विधायकों में से 12 ने कांग्रेस विधायक दल का 2019 में टीआरएस में विलय कर दिया। 2019 में, बीजेपी 17 लोकसभा सीटों में से 4 सीटें हासिल करने में कामयाब रही, जिससे टीआरएस को काफी नुकसान हुआ। जिसके बाद भाजपा ने इसे अवसर के तौर पर देखा और जोरशोर से संगठन पर काम किया। 2020 में, GHMC चुनाव राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा। नगर निगम चुनावों में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कुल 6 मुख्यमंत्रियों और कई केंद्रीय मंत्रियों प्रचार मैदान में बतौर स्टार प्रचारक उतरे। इस चुनाव में बीजेपी ने अपने दमखम के अनुसार अप्रत्याशित प्रदर्शन किया और पार्टी 4 से 48 पर पहुंच गई। इसके बाद जीत का कारवां लगातार बढ़ता ही चला गया। 2020 और 2021 में दुब्बाका और हुजूराबाद उपचुनाव जीतकर भगवा लहर बरकरार रखी। साथ ही राज्य विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर स्थापित किया।

भाजपा को तेलंगाना में मजबूत होने के लिए संगठन पर काम करने की जरूरत थी, पार्टी प्रभाव के मामले में हैदराबाद तक ही सीमित थी और 119 निर्वाचन क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं और नेताओं का एक शक्तिशाली समूह तैयार करना समय की मांग थी। लेकिन इसी दौर में एक ऐसी घटना घटी और बीजेपी राज्य इकाई इसका लाभ उठाने में विफल रही और कांग्रेस पार्टी को वापसी के लिए एक और मौका दे दिया। साथ ही राज्य नेतृत्व के बीच भारी गुटबाजी और पार्टी हाई कमांड की 'रुचि' की कमी के कारण पार्टी एक बार फिर बिखर गई। चुनाव के दौरान पार्टी व्यापकता में मुद्दों को उठाने में विफल रही। 2023 चुनाव से ठीक पहले बंदी संजय की जगह किशन रेड्डी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का दांव चलने के बाद भी पार्टी कामयाब नहीं हो पाई।
2018 में बीजेपी अपनी संख्या 1 से बढ़ाकर 2023 में 8 करने में कामयाब रही, विधानसभा चुनाव से 18 महीने पहले 'प्रमुख विपक्ष' का दर्जा प्राप्त करने के लेवल तक पहुंचना और अंततः दोहरे अंकों में प्रवेश करने तक गिरना एक बड़ी निराशाजन रही। हर वक्त मार्ददर्शन के लिए दिल्ली आलाकमान पर निर्भर रहने वाली प्रदेश नेतृत्व की अक्षमता और रेवंत रेड्डी के उभार ने पार्टी की अस्तिव पर गहरा संकट डाला।
2024 आम चुनावों में, पार्टी ने 17 लोकसभा सीटों में से 8 सीटें हासिल कीं, जिससे उसकी संख्या दोगुनी हो गई। वहीं, बीआरएस अपना खाता भी नहीं खोल पाई। इतने अच्छे प्रदर्शन के बावजूद बीजेपी एकजुट नहीं दिख रही है। दोष चाहे किसी को भी दिया जाए, जब बीआरएस 2014 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर था तब कदम उठाने में असफल होना और इस स्तर तक विघटित होना किसी भी राज्य में किसी भी राजनीतिक दल के लिए हर दिन, साल या चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए आवश्यक आवश्यक सामग्री की कमी को दर्शाता है।
तेलंगाना में नए अध्यक्ष की नियुक्ति और अपेक्षित संगठनात्मक बदलावों के परिणामस्वरूप एक नई ऊर्जा का संचार हो सकता है, जिसकी पार्टी को इस वक्त सख्त जरूरत है।












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