Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

हीरा ज़रूरी या जंगल: 55,000 करोड़ वाली डायमंड माइन्स की पड़ताल

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

एक डरावना सा जंगल कैसा होता है, सिर्फ़ किताबों में पढ़ा और डिस्कवरी चैनल पर ही देखा था.

कहानियाँ भी सुनी थीं, उनकी, जिनकी ज़िंदगी में इस जंगल के सिवा कुछ नहीं होता.

एक दोपहर, सन्नाटे को चीरते हुए, उस घने जंगल में सागौन के दरख़्तों से निकल कर थोड़ी रौशनी में पहुँचे तो फटे-पुराने कपड़े पहने हुए एक व्यक्ति को कुछ पत्तियाँ और टहनियाँ बीनते हुए पाया.

पता चला ये भगवान दास हैं, जिनके पास जंगल और इर्द-गिर्द बसे गाँवों के लोग इलाज के लिए आते हैं क्योंकि ये जड़ी-बूटियाँ इकट्ठी कर बीमार लोगों को देते हैं.

मैंने पूछा, अगर इस जंगल में खनन होने लगेगा तो उसके बाद क्या होगा?

भगवान दास
BBC
भगवान दास

कुछ सेकंड ठहर कर भगवान दास ने कहा, "उसके बाद जनता मरेगी, यही होगा जी. क्योंकि औषधी वाली पत्तियाँ और पेड़ तो इसी जंगल में मिलती हैं. अब जनता सोचे की हमको क्या करना है. पंडा ऐसी बूटी ले आता है जो जान बचाती है, वो कहाँ से आएगी. जनता लड़ाई लड़े तो लड़े, हमारे अकेले से क्या होगा".

जंगल में खनन?

जिस जंगल की बात हो रही है उसे बक्सवाहा का जंगल कहा जाता है जो मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के बीचोंबीच मौजूद है.

इस कहानी की शुरुआत 2002 में हुई.

आस्ट्रेलिया की नामचीन रियो-टिंटो कंपनी को बक्सवाहा जंगल के नीचे हीरे ढूँढने का काम मिला.

इस सिलसिले में कंपनी ने यहाँ अपना प्लांट लगाया.

सालों की खोज के बाद पता चला कि ज़मीन के नीचे 55 हज़ार करोड़ रुपए तक के हीरे दबे हो सकते हैं.

शुरुआत में 950 हेक्टेयर जंगल को माइनिंग के लिए छाँटा गया था जिसके तहत तमाम गाँव आते थे.

मगर स्थानीय विरोध और पर्यावरण मामलों के चलते 2016 में रियो टिंटो ने प्रोजेक्ट छड़ दिया.

उस समय भी इस बात पर कई सवाल उठे थे कि आख़िर सैंकड़ों करोड़ लगाने के बाद कंपनी ने एकाएक इस प्रोजेक्ट से 'पल्ला क्यों झाड़ लिया'.

जानकारों का यही मत है कि एक विदेशी कंपनी ने लिए "स्थानीय अड़चनें ज़्यादा होती जा रहीं थी".

बहराल, एक नए ऑक्शन के बाद 2019 में हीरों की खदान का नया लाइसेंस मिला आदित्य बिड़ला ग्रुप की एसेल माइनिंग कंपनी को. इस बार 382 करोड़ हेक्टेयर में डायमंड माइनिंग होनी थी.

दिलचस्प ये भी है कि इलाक़े में रियो टिंटो के समय में कुछ स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिला था और वो आज भी इन्हीं जंगलों के बीच बसे गावों में रहते हैं.

गणेश यादव
BBC
गणेश यादव

गणेश यादव ने कई साल उस विदेशी माइनिंग कंपनी के लिए काम किया लेकिन आज भी उनके दिल में एक मलाल है.

उन्होंने बताया, "अगर 2004 या 2005 से ही हमारे बच्चों को सरकार और कंपनियाँ तैयारी करवाती कि उस काम को करने के लायक बन सकें, उस पर तो काम किया नहीं. तब से अब तक जो अट्ठारह वर्ष के बच्चे हो चुके होते उनकी कोई डिग्री होती या टेक्निकल काम सीख कर इस क्षेत्र के बच्चे उसके अंदर काम कर सकते थे. अब अगर यहाँ नया प्लांट लग भी जाएगा तो हमारे बच्चे उसमें नौकरी करने के लिए सक्षम ही नहीं हैं".

आमदनी पर ख़तरा

बीड़ी के पत्ते हों या महुवा और आँवले के फल, इन्हें बीन और बेच कर जंगल और इर्द-गिर्द, क़रीब दस हज़ार लोग पेट भरते हैं. गाँव वालों से पता चला कि महुवा-आँवला मिलाकर, बाज़ार में बेचने पर, एक साधारण परिवार भी सालाना 60,000-70,000 रुपए कमा लेता है.

जंगल किनारे एक गाँव शह्पुरा पहुँचे तो मिट्टी से पुते अपने घरों से मोहब्बत और गहरी मिली.

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

लेकिन ज़्यादातर चेहरों की रौनक़ फीकी है क्योंकि आमदनी का सिलसिला बंद भी हो सकता है.

तीन बच्चों की माँ पार्वती अपनी खपड़ैल वाली कुटिया की साफ़-सफ़ाई में तो लगीं थी, लेकिन उनके मन के भीतर जैसे एक समुद्र-मंथन जारी था.

नम आँखों के साथ उन्होंने कहा, "हम सभी जाते हैं जंगल में बीनने के लिए तभी ख़र्च चलता है, कट जाएगा तो फिर हम लोग क्या करेंगे? हमारे पास कोई खेती-बाड़ी तो है नहीं कि उसमें धंधा चलाएँगे, की बच्चे पाल सके. हम तो जंगल के भरोसे पर हैं.

बक्सवाहा में कुछ ऐसे भी लोग मिले जिन्हें हीरों में न पहले दिलचस्पी थी, न आज है.

मुलाक़ात कीर्ति ठाकुर से हुई जो अपने जंगल की सीमा पर बने एक मंदिर पर दान-पुण्य के लिए पहुँची थी.

उनके मुताबिक़, "जंगल खुदेगा तो जो धूल उड़ेगी वो ही मिलेगी हमें. हीरे थोड़ी मिलने वाले हैं हमें. और जितने इस इलाक़े के लोग हैं उन्हें वहाँ नौकरी थोड़ी मिलने वाली है. हमें तो सिर्फ़ उसकी धूल मिलेगी"

बक्सवाहा का जंगल

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

डायमंड माइनिंग

इस बीच 'बंदर माइनिंग प्रोजेक्ट' या बक्सवाहा डायमंड माइंस के प्रस्तावित खनन पर मध्य प्रदेश सरकार की राय और सोच बेहद अलग है.

हमारी बातचीत राज्य के खनिज मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह से हुई जिनके मुताबिक़, "सभी गाँव वालों के बीच हम गए थे, एक भी आदमी ने विरोध नहीं किया है. सब लोग जानते हैं कि इससे रोज़गार मिलेगा".

बीबीसी के इस सवाल पर कि काफ़ी लोगों ने खुल कर कैमरे पर कहा है कि वो लोग डरे हुए हैं की जंगल काट जाएगा, खनिज मंत्री ने जवाब दिया, "ऐसी बात हमारे सामने तो नहीं आई, अब आपके सामने कहा है तो मुझे नहीं मालूम. क्योंकि माननीय मुख्यमंत्री जी ने भी अपनी तरफ़ से टीम भेजी थी, हम लोग भी गए थे और व्यक्तिगत और खुले रूप से भी पूछा गया था. बाहर के लोग ज़रूर कह रहे हैं लेकिन स्थानीय विरोध नहीं कर रहे हैं".

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

बहराल, हीरों की खुदाई के लिए एसेल माइनिंग को दो लाख से भी ज़्यादा पेड़ काटने होंगे.

मध्य प्रदेश सरकार के खनिज मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह का एक और दावा ये भी है कि, "आपने देखा होगा, आपने लोकल में विज़िट किया है, ज़मीन जंगल की ज़रूर है लेकिन फ़ॉरेस्ट उतना घना नहीं हैं, घनत्व नहीं है. और फिर हम लोग दस लाख नए पेड़ भी लगा रहे हैं'.

हक़ीक़त इस बयान से बिलकुल विपरीत है.

बीबीसी की टीम कई घंटों का ट्रेक करके जंगल के बीचोंबीच उस जगह पर पहुँची जहाँ से डायमंड माइनिंग की शुरुआत होनी है.

जिस जंगल को सरकार कम घना बता रही है वो दरअसल इतना घना है कि तीन-चार किलोमीटर भीतर दाख़िल होने के लिए आपको घंटों चलना पड़ता है, वो भी जंगली जानवरों के बीच.

भालू के खोदे हुए गड्ढों के अलावा नीलगाय, जंगली बैल और सैंकड़ों क़िस्म की चिड़िया तो हमने ख़ुद देखी.

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

बुंदेलखंड और पानी

डायमंड माइनिंग में रोज़ाना लाखों लीटर पानी की ज़रूरत होती है.

अनुमान है कि प्रस्तावित डायमंड माइन को प्रतिदिन 16,050 क्यूबिक मीटर पानी की ज़रूरत होगी और ग़ौरतलब है कि ये प्रोजेक्ट जिस दिन से शुरू होगा उसके बाद पूरे 14 वर्ष तक चलेगा.

राज्य सरकार जंगल काटने के बदले दस लाख पेड़ लगाने की बात तो कह रही है लेकिन उन्हें भी तो पानी चाहिए.

सबसे बड़ा मसला यही है कि पूरे बुंदेलखंड इलाक़े में पानी का ज़बरदस्त अभाव है और लोगों को डर है कि अखरिकार माइनिंग में ग्राउंडवॉटर हाई इस्तेमाल किया जा सकता है 'जिसके परिणाम भयावह होंगे'.

बक्सवाहा जंगलों में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक लंबे अरसे से काम करने वाले कार्यकर्ता अमित भटनागर से हमारी मुलाक़ात बक्सवाहा के पास बिजावर में हुई.

उन्होंने कहा, "इस एरिया को अगर पानी के लिहाज़ से देखें तो इसे सेमी-क्रिटिकल एरिया घोषित किया गया है. और इस प्रोजेक्ट में साठ लाख लीटर पानी लगना है जिसके लिए गेल नदी को बाँध बना कर डायवर्ट किया जा रहा है. इससे गेल नदी ख़त्म हो जाएगी, और आप ये देखिए इसमें दो लाख पंद्रह हज़ार आठ सौ पछत्तर पेड़ काटने हैं, जिससे यहाँ के कई झरने ख़त्म हो जाएँगे और पानी को लेकर ज़बरदस्त क़िल्लत झेलनी पड़ेगी".

हज़ारों जानवरों के साथ-साथ इस जंगल में कई आदिवासी जनजातियाँ भी सैंकडों वर्षों से रहती रही हैं और अब विस्थापन के डर से सशंकित हैं.

पेड़ काटने से लेकर पानी, आदिवासी लोगों से लेकर जानवरों तक के विस्थापन से जुड़े अहम सवाल लिए हमने एसेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड का दरवाज़ा खटखटाया.

लेकिन उन्होंने मामले पर बात करने से इनकार कर दिया.

एसेल माइनिंग को मिले कांट्रैक्ट के ख़िलाफ़ फ़िलहाल कई मामले अदालतों और नैशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल में सुने जा रहे हैं. माइनिंग होनी है या नहीं ये फ़ैसले पर निर्भर है.

तमाम याचिकाकर्ताओं में से एक नेहा सिंह से हमारी मुलाक़ात दिल्ली में हुई जो कुछ महीनों पहले ही कोविड-19 से ग्रसित होकर ठीक हुई हैं.

बक्सवाहा में खनन के ख़िलाफ़ एनजीटी में दायर अपनी याचिका की बात से पहले ही उन्होंने कहा, "कोविड होने के बाद मुझे साफ़ हवा और ऑक्सिजन की अहमियत का और ज़्यादा एहसास हो चुका है. वैसे एनजीटी पहले ही एक ऐतिहासिक फ़ैसला दे चुकी है कि इंसानों की क़ब्र पर नहीं हो सकता औद्योगिक विकास".

बक्सवाहा का जंगल
BBC
बक्सवाहा का जंगल

अनोखी धरोहर

इन जंगलो में कुछ ऐसा भी हैं जो ख़त्म हो गया तो हमेशा के लिए होगा. ज़ाहिर है, अगर बड़े पैमाने पर माइनिंग हुई तो इनके भविष्य का पता नहीं.

भारत के पुरातत्व विभाग के मुताबिक़ बक्सवाहा का जंगलों से सटी गुफ़ाओं पर मिली चित्रकारी पच्चीस हज़ार साल पुरानी हो सकती है.

अच्छा या बुरा, पूर्व ऐतिहासिक काल के लोगों का हर पहलू यहाँ पेंटिंग की शक़्ल में मौजूद है.

हर तस्वीर जैसे आपसे कह रही हो, यहाँ हज़ारों साल पहले भी इंसान थे और आज भी हैं.

कब तक रहेंगे, पता नहीं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+