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Womens Day 2026: जहां लगते थे पंचर,वहां सुलझने लगे गणित के सवाल! मिलिए महाराष्ट्र की शिक्षिका उज्वला वाडेकर से

International Womens Day 2026: 8 मार्च का दिन दुनिया भर में महिलाओं के संघर्ष और उनकी सफलता के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लेकिन असली 'महिला सशक्तिकरण' की कहानी महानगरों के एयर-कंडीशन दफ्तरों में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के जलगांव जिले के एक सरकारी स्कूल (Zilla Parishad School) की उन गलियों में छिपी है, जहां उज्वला वाडेकर (Ujjwala Wadekar) पिछले 30 सालों से बच्चों का भविष्य संवार रही हैं।

उज्वला वाडेकर केवल एक शिक्षिका नहीं हैं बल्कि वह एक #ForceForGoodHero हैं, जिन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे बुलंद हों, तो संसाधनों की कमी कभी शिक्षा के आड़े नहीं आती।

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अपने 30 साल के शिक्षण अनुभव में उन्होंने ग्रामीण बच्चों को पढ़ाने के लिए ऐसी अनोखी और रचनात्मक पद्धतियां अपनाईं, जिनकी आज देशभर में चर्चा हो रही है।

Who Is Ujjwala Wadekar Jalgaon Teacher: कौन हैं उज्ज्वला वाडेकर जिन्होंने बदल दी गांव की तस्वीर

उज्ज्वला वाडेकर महाराष्ट्र के जलगांव जिले की जिला परिषद (ZP) स्कूल की शिक्षिका हैं। उन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक ग्रामीण बच्चों को पढ़ाया है और अपने अनोखे शिक्षण तरीकों के कारण शिक्षा के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनाई है। उनके काम को देखते हुए उन्हें 2014 में 'आदर्श शिक्षिका' सम्मान से भी नवाजा गया था।

उज्ज्वला वाडेकर का मानना है कि शिक्षा का असली उद्देश्य सिर्फ किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास, जिज्ञासा और जीवन के प्रति साहस पैदा करना है। इसी सोच के साथ उन्होंने पारंपरिक पढ़ाई के तरीकों से हटकर बच्चों को जीवन से जोड़कर सीखने का मौका दिया।

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Zilla Parishad School Maharashtra Teacher: क्लासरूम की दीवारों को तोड़ती शिक्षा

उज्ज्वला वाडेकर की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने शिक्षा को कक्षा की सीमाओं से बाहर निकाल दिया। उज्वला ताई (जैसा कि उन्हें उनके छात्र प्यार से बुलाते हैं) का मानना है कि शिक्षा किताबों के पन्नों में कैद नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जलगांव के ग्रामीण इलाकों में पढ़ाई को मज़ेदार और व्यावहारिक बनाने के लिए जो तरीके अपनाए, वे आज पूरे देश के लिए मिसाल हैं।

पंचर की दुकान बनी लैब: जब बच्चों को गणित के जटिल सूत्र समझ नहीं आए, तो उज्वला उन्हें गांव की पंचर की दुकान पर ले गईं। वहाँ टायर के घेरे (Circumference) और हवा के दबाव (Pressure) के जरिए उन्होंने गणित और विज्ञान के पाठ पढ़ाए। आग कैसे लगती है और उसे कैसे बुझाया जाता है, यह समझाने के लिए उन्होंने पूरे फायर स्टेशन को ही अपना क्लासरूम बना लिया।

30 साल का अनुभव को मिला 'आदर्श शिक्षिका 2014' का सम्मान

उज्वला वाडेकर का सफर चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी 'कम्फर्ट' को नहीं चुना। स्कॉलरशिप और नवोदय सरकारी स्कूलों के बच्चों को अक्सर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं से डर लगता है। उज्वला ने अपनी अनूठी शिक्षण पद्धति (Activity-based learning) से सैंकड़ों बच्चों को स्कॉलरशिप और नवोदय परीक्षाओं के लिए तैयार किया है। उनके लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि बच्चों में साहस, आत्मविश्वास और संभावनाओं को जगाना है।

उनकी इसी तपस्या का परिणाम है कि उन्हें 'आदर्श शिक्षिका 2014' के सम्मान से नवाजा गया। आज 30 साल बाद भी उनकी ऊर्जा वैसी ही है, जैसे उनके करियर के पहले दिन थी। वह आज भी कृतीयुक्त मार्गदर्शन (Action-oriented guidance) और जीवंत उदाहरणों (Live examples) के जरिए बच्चों को रटने के बजाय समझने के लिए प्रेरित करती हैं।

हर घर की 'उज्वला' के लिए संदेश

इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, उज्वला वाडेकर की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक शिक्षित और सशक्त महिला न केवल अपना परिवार, बल्कि पूरी पीढ़ी और समाज की दिशा बदल सकती है। उज्वला ताई ने गांव की धूल भरी सड़कों से निकलकर जो ज्ञान का प्रकाश फैलाया है, वह उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो सुविधाओं के अभाव में भी कुछ बड़ा करने का जज़्बा रखती हैं।

उज्वला वाडेकर कहती हैं कि-शिक्षा वह नहीं जो आपको सिर्फ पढ़ना सिखाए, शिक्षा वह है जो आपको दुनिया से लड़ना सिखाए। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उज्ज्वला वाडेकर की कहानी यह संदेश देती है कि अगर नीयत मजबूत हो और उद्देश्य साफ हो, तो एक व्यक्ति भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। एक साधारण गांव की शिक्षिका ने यह साबित कर दिया कि सही शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं, बल्कि पीढ़ियों का भविष्य गढ़ता है।

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