जब कोठों से निकलीं क्रांति की मशालें, जानें एक तवायफ कैसे बनीं नवाब की बेगम? पढ़ें भारत की 7 वेश्याओं की कहानी
International Whores Day 2025: आज 2 जून है - International Whores Day। ये दिन सिर्फ देह व्यापार में शामिल लोगों की बात नहीं करता, ये उनके संघर्ष, सम्मान और अस्तित्व की बात करता है। वो लोग जो समाज के किनारों पर खड़े होकर भी, वक्त पड़ने पर इतिहास के बीचोंबीच आ खड़े हुए। कुछ ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, तो कुछ ने कला और संस्कृति को नया आयाम दिया।
आइए, जानते हैं भारत की उन चर्चित वेश्याओं की असली कहानियां, जिन्होंने समय की सीमाओं को लांघकर समाज को आईना दिखाया...

अजीज़ुनबाई - विद्रोह में बंदूक उठाने वाली तवायफ
कानपुर की मशहूर तवायफ अजीज़ुनबाई अपने समय की एक बेहतरीन नर्तकी और गायिका थीं। लेकिन उनका हुनर सिर्फ सुरों में ही नहीं था, उनकी नसों में आजादी की आग भी जल रही थी। जब बाकी तवायफें ग़ज़ल और ठुमरी में व्यस्त थीं, तब अजीज़ुनबाई बंदूक और बगावत की भाषा सीख रही थीं।

कहा जाता है कि अजीज़ुनबाई की घनिष्ठता नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से थी। कानपुर विद्रोह में अजीज़ुनबाई ने तात्या टोपे के दस्ते के लिए न केवल रहने का ठिकाना, बल्कि सूचनाएं, हथियार और गोला-बारूद भी मुहैया कराए। उन्होंने क्रांतिकारियों को अपने घर में गुप्त बैठकों की इजाजत दी और कई बार गुप्त संदेशों को ब्रिटिशों से छुपाकर एक ठिकाने से दूसरे तक पहुंचाया। 1857 की क्रांति में जब देश में आग लगी थी, तब कानपुर की अजीज़ुनबाई पुरुष वेश में, हाथ में पिस्तौल लेकर सिपाहियों का हौसला बढ़ा रही थीं। उनका घर विद्रोहियों का बेस कैम्प बन गया था। ब्रिटिश फाइलों में अजीज़ुन का नाम आजादी के पहले 'महिला फाइटर' के रूप में दर्ज है।
हुसैनी - जिस पर बीबीघर हत्याकांड का आरोप लगा
1857 की क्रांति के दौरान, नाना साहेब के नेतृत्व में विद्रोही सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों, महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया। इनमें से लगभग 200 महिलाओं और बच्चों को बीबीघर नामक एक भवन में कैद किया गया। यह भवन मूल रूप से सर जॉर्ज पार्कर का निवास था, जिसे बाद में बंदियों को रखने के लिए उपयोग में लाया गया।
हुसैनी बेगम, जिन्हें हुसैनी खानम के नाम से भी जाना जाता है, एक तवायफ थीं जिन्हें बीबीघर में बंदियों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जब विद्रोही सैनिकों को महिलाओं और बच्चों की हत्या का आदेश दिया गया, तो कई सैनिकों ने इसे मानने से इनकार कर दिया। ऐसे में, हुसैनी बेगम ने अपने प्रेमी की मदद से कसाइयों को बुलवाया, जिन्होंने बंदियों की निर्मम हत्या की। हुसैनी को बीबीघर हत्याकांड का मास्टरमाइंड माना गया। ये वो समय था जब तवायफें सिर्फ नाचने-गाने वाली नहीं, बल्कि राजनीतिक साजिशों का हिस्सा भी बन चुकी थीं।
बेगम हजरत महल - नवाब की बेगम, एक समय की तवायफ
आज जब हम बेगम हज़रत महल का नाम सुनते हैं, तो हमारे सामने 1857 के गदर में झांसी की रानी के समकक्ष एक वीरांगना की छवि आती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हजरत महल का असली नाम मुहम्मदी ख़ातून था - और उनका जीवन लखनऊ के कोठों से शुरू हुआ था।

13-14 साल की उम्र में ही वे एक तवायफ के रूप में अवध के दरबार में लाई गईं। नृत्य, संगीत, शायरी और अदाओं की ये मिसाल जब वाजिद अली शाह के नजरों में आई, तो उन्हें दरबारी रखैल के रूप में चुन लिया गया। बाद में, नवाब ने उन्हें अपनी बेगम बना लिया और नाम दिया गया - हजरत महल। 1856 में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध (लखनऊ) को हड़प लिया, तो नवाब वाजिद अली शाह को कोलकाता निर्वासित कर दिया गया। ऐसे समय में लखनऊ में जनता की भावनाओं को संभालने और अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए कोई नेतृत्व नहीं था। तब हज़रत महल ने गद्दी संभाली और अपने नाबालिग बेटे बिरजिस क़द्र को नवाब घोषित किया।
1857 का विद्रोह: जब बेग़म बनी 'लखनऊ की झांसी'
- हजरत महल ने क्रांतिकारियों के लिए हथियार और रणनीति मुहैया कराई।
- उन्होंने अंग्रेजी छावनियों पर हमला किया, जनता को एकजुट किया और लखनऊ को अस्थायी रूप से ब्रिटिश शासन से मुक्त कराया।
- वो न सिर्फ राजनीतिक रणनीतिकार थीं, बल्कि कई बार खुद घोड़े पर सवार होकर युद्धभूमि में भी नजर आईं।
- लखनऊ की लड़ाई हारने के बाद हजरत महल नेपाल चली गईं, जहां उन्हें राजनीतिक शरण मिली, लेकिन पहचान नहीं। 1879 में नेपाल में ही उनकी मृत्यु हो गई - गुमनामी में, लेकिन इज्जत के साथ।
गौहर जान - संगीत, संस्कृति और स्वराज का संगम
गौहर जान का असली नाम- 'एंजेलिना योवर्ड' था। उनका जन्म 26 जून 1873, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इसकी मां 'विक्टोरिया हेमिंग्स', जो एक अंग्रेज महिला थी। जिसने इस्लाम स्वीकार कर लिया और खुद को मलका जान नाम से तवायफों के पेशे में स्थापित किया।

1902 में, जब भारत में रिकॉर्डिंग तकनीक आई, तब फ्रेडरिक विलियम गाइस्बर्ग ने कलाकारों की तलाश शुरू की। तब कलकत्ता की मशहूर गायिका गौहर जान सामने आईं। उन्होंने एक 3 मिनट का खयाल गाया - और यह भारत का पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड बना। गाने के अंत में उन्होंने कहा- 'My name is Gauhar Jaan!'
हुस्ना बाई - जिसने वाराणसी में तवायफ सभा को क्रांतिकारी बना दिया
19वीं सदी का बनारस - संगीत, आध्यात्म और गंगा किनारे की संस्कृति से भरा हुआ शहर। लेकिन इसी शहर की तवायफें, जिन्हें 'कला' के नाम पर सजाया गया था, एक ऐसा विद्रोह बन गईं जिसे ब्रिटिश हुकूमत दबा नहीं सकी। इसमें सबसे आगे थीं - हुस्ना बाई, वाराणसी की 'सुरों की मल्लिका' और 'अदाओं की रानी', जिसने कोठे को क्रांतिकारियों की बैठक में बदल दिया।
हुस्ना बाई का जन्म 1830 के दशक में वाराणसी के मशहूर कला-परिवार में हुआ। संगीत, कथक, गजल और राजनीति - चारों में दक्ष। बनारस की सबसे प्रसिद्ध तवायफों में शुमार। लेकिन सिर्फ नाचने-गाने तक सीमित नहीं - उसके कोठे से निकलती थी गुप्त संदेशों की चिट्ठियां, और पहुंचती थीं अंग्रेजों को चुनौती देने वाली योजनाएं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुस्ना बाई ने वाराणसी में 'तवायफ सभा' नाम की एक बैठक शुरू की - जिसमें बनारस, लखनऊ, पटना और इलाहाबाद की कई नामी तवायफें शामिल थीं।
इस सभा का असली मकसद क्या था?
- क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद देना - कोठे पर आए पैसे से हथियार खरीदे जाते थे।
- ब्रिटिश अधिकारियों की जासूसी करना - अंग्रेज अफसर जब मनोरंजन के लिए आते, तो वहीं से उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जाती।
- गुप्त संदेश पहुंचाना - संगीत के बोलों में कोड वर्ड्स होते थे।
गंगूबाई काठियावाड़ी - जो बदनाम गलियों की देवी बन गईं
गंगूबाई का जन्म 1939 में काठियावाड़ (गुजरात) के एक संभ्रांत गुजराती परिवार में हुआ था। असली नाम था - गंगा हरजीवनदास। महज 16 साल की उम्र में वह अपने प्रेमी रामनिख लाल के प्यार में पड़ गईं, जो उन्हें बॉलीवुड में अभिनेत्री बनाने के वादे से बॉम्बे ले आया... लेकिन कुछ ही दिनों में उसने गंगूबाई को मात्र 500 रुपए में कमाठीपुरा के एक कोठे पर बेच दिया।
जिस गंगूबाई ने कभी आईना सिर्फ हीरोइन बनने के लिए देखा था, वह अब बदनाम गली में एक वेश्या बन चुकी थी। लेकिन... वह टूटी नहीं। उसने अपने हालात को स्वीकारा - मजबूरी को ताकत में बदला। धीरे-धीरे, वह कमाठीपुरा की सबसे तेज़, सबसे समझदार और सबसे दबंग तवायफ बन गई। गंगूबाई ने न सिर्फ अपने इलाके की महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई लड़ी, बल्कि पुलिस, माफिया और नेताओं से भी टकराईं। कमाठीपुरा के माफिया सरगना करीम लाला ने गंगूबाई को अपनी 'राखी बहन' बना लिया था।
इस रिश्ते ने उन्हें कमाठीपुरा में असीम ताक़त दी - उन्होंने उस ताकत का इस्तेमाल कभी निजी लालच के लिए नहीं किया, बल्कि औरतों की सुरक्षा और सम्मान के लिए किया। मुंबई की अंडरवर्ल्ड की दुनिया तक उनसे डरती थी, लेकिन लड़कियां उन्हें 'मां' कहती थीं। गंगूबाई ने ज़िंदगी भर शादी नहीं की। उन्होंने अपने इलाके की वेश्याओं, अनाथ बच्चों और बेसहारा लड़कियों को अपनी औलाद माना। 1970 के दशक के अंत में उनका देहांत हो गया।
उमराव जान - लखनऊ की शाम, नवाबों की जान
अमीरन से उमराव जान बनी यह तवायफ सिर्फ मुजरे या शायरी की ही नहीं, समाज के दोहरे मापदंडों की गवाह भी थी। मिर्ज़ा हादी रुस्वा की किताब 'उमराव जान अदा' में उनके जीवन के हर रंग हैं - दर्द, प्रेम, उपेक्षा और अंत में अकेलापन। बनारस में गुमनाम जिंदगी बिताने वाली उमराव जान की कब्र अब एक सांस्कृतिक स्मारक बन चुकी है।
कहानी शुरू होती है फ़ैज़ाबाद से - एक मासूम लड़की के अपहरण से, जिसे परिवार से जुदा कर के लखनऊ के कोठे पर बेच दिया गया। जहां बाकी लड़कियां टूटीं, वहीं अमीरन बनी - उमराव जान 'अदा'। बहुत जल्दी ही वह बन गईं - लखनऊ के नवाबों की महफिल की जान, शेरो-शायरी की मल्लिका और कोठे की सबसे आकर्षक 'फनकारा'।
उमराव जान को एक नवाब से प्यार हो गया - नवाब सुलतान। लेकिन यह रिश्ता इश्क की तकदीर नहीं, धोखे की तहरीर बन गया। नवाब ने शादी से इनकार कर दिया - क्योंकि उमराव 'एक तवायफ थी'। उमराव जान की सबसे खास बात थी - उनकी जुबान। वो जो बोलती थीं, वो क़सीदा भी होता था और क़हर भी। उनकी शायरी में औरत की मजबूरी, समाज की दोगली सोच और मोहब्बत की त्रासदी सब कुछ होता था।
ये सभी औरतें वेश्यावृत्ति में थीं - लेकिन उनकी पहचान सिर्फ उनके पेशे से नहीं थी। उन्होंने अपने समय की सत्ता को चुनौती दी, समाज को आईना दिखाया और यह साबित किया कि कोई भी इंसान सिर्फ 'जो वो करता है' नहीं, बल्कि जो वो बनता है, वही उसकी असली पहचान है।
नोट- खबर मीडिया सोर्स के मुताबिक है। वनइंडिया किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है।












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