मर्सिडीज, शराब सस्ती, दूध-पनीर के दाम नहीं घटेंगे? India EU FTA से इन तीन सेक्टर्स को क्यों किया गया बाहर
India EU FTA Excluded Sectors: नई दिल्ली में आज 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने आर्थिक साझेदारी के एक नए युग का आगाज किया। 18 साल के लंबे इंतजार और जटिल वार्ताओं के बाद आखिरकार इस 'मदर ऑफ ऑल डील्स' पर हस्ताक्षर हो गए। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, मुक्त व्यापार समझौता (FTA) साल 2027 से पूरी तरह प्रभावी होगा। यह डील न केवल फार्मा और टेक्सटाइल जैसे भारतीय सेक्टर्स के लिए यूरोप के दरवाजे खोलेगी, बल्कि लग्जरी कारों और प्रीमियम उत्पादों को भी किफायती बनाएगी।
हालांकि, इस ऐतिहासिक संधि के बीच भारत ने अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षा प्रदान करने के लिए डेयरी, कृषि और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को फिलहाल इस दायरे से बाहर रखा है। इस रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि इन क्षेत्रों को दूर रखने के पीछे क्या ठोस कारण हैं।

Dairy excluded from India-EU FTA: करोड़ों किसानों की सुरक्षा
भारत ने यूरोपीय डेयरी उत्पादों को इस समझौते से पूरी तरह बाहर रखा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के ग्रामीण परिवारों और सहकारी समितियों (अमूल आदि) से जुड़े करोड़ों छोटे डेयरी किसानों की आजीविका को सुरक्षित करना है। यूरोपीय संघ के सस्ते दूध, पनीर और मक्खन को अनुमति देने से घरेलू बाजार में भारतीय किसानों के लिए कीमतें गिर सकती थीं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा था।
Agriculture excluded FTA: खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता
कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए भारत ने चीनी और संवेदनशील फसलों को शुल्क कटौती के दायरे में नहीं रखा है। यूरोपीय संघ के अत्यधिक सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों से घरेलू प्रतिस्पर्धा को बचाने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। भारत अपने किसानों को वैश्विक बाजार की अस्थिरता से सुरक्षित रखते हुए कृषि उत्पादों पर अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को बनाए रखना चाहता है।
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EV sector India EU agreement: स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन
भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी घरेलू कंपनियों को सुरक्षा देना अनिवार्य है। इसीलिए ईवी को अगले 5 वर्षों तक किसी भी शुल्क कटौती से बाहर रखा गया है। सरकार चाहती है कि विदेशी कंपनियां केवल आयात न करें, बल्कि 'मेक इन इंडिया' के तहत भारत में निवेश कर यहीं उत्पादन शुरू करें। यह नीति स्वदेशी स्टार्टअप्स और स्थापित कंपनियों को तकनीकी विकास के लिए पर्याप्त समय देगी।
आयात-निर्यात का गणित और रिकॉर्ड आंकड़े
भारत और ईयू के बीच द्विपक्षीय व्यापार फिलहाल $136.53 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर है। खास बात यह है कि भारत इस साझेदारी में 'ट्रेड सरप्लस' की स्थिति में है, यानी हमारा निर्यात ($75.85 बिलियन) आयात ($60.68 बिलियन) से अधिक है। भारत मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पाद, दवाइयां और तैयार कपड़े यूरोप भेजता है, जबकि वहां से हाई-टेक मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और विमानन पुर्जे मंगवाता है। यह नया समझौता इस आंकड़ों को अगले पांच वर्षों में दोगुना करने का लक्ष्य रखता है।
किन वस्तुओं की कीमतों में आएगी बड़ी गिरावट?
इस डील का सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। भारत यूरोपीय देशों से आने वाली कारों पर आयात शुल्क 110% से घटाकर 40% तक लाएगा, जिससे मर्सिडीज, ऑडी और बीएमडब्ल्यू जैसी लग्जरी गाड़ियां काफी सस्ती हो जाएंगी। इसके अलावा, बेल्जियम के कच्चे हीरे पर शुल्क कम होने से आभूषणों के दाम गिरेंगे। वहीं, यूरोपीय वाइन, स्पिरिट और विदेशी चॉकलेट पर लगने वाली भारी ड्यूटी में कटौती होने से ये प्रीमियम उत्पाद अब भारतीय बाजारों में किफायती कीमतों पर उपलब्ध होंगे।
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भारतीय निर्यातकों के लिए खुलेगा तरक्की का द्वार
भारतीय कपड़ा (Textile) और फार्मास्यूटिकल्स सेक्टर के लिए यह समझौता किसी वरदान से कम नहीं है। अब तक भारतीय कपड़ों को यूरोपीय बाजारों में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब 'जीरो-ड्यूटी' एक्सेस मिलने से भारतीय परिधान बांग्लादेश और वियतनाम को कड़ी टक्कर देंगे। फार्मा सेक्टर में भारत की जेनेरिक दवाओं की पहुंच आसान होगी, जिससे यूरोप के स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी। साथ ही, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग सामानों के लिए भी व्यापारिक बाधाएं कम होंगी।
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