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शहीदों को सलाम: बाल गंगाधर तिलक ने अपने इस हथियार से उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद!

Saheedo Ko Salam: 'बाल गंगाधर तिलक', जिनके मजबूत हौंसलों से थरथर कांप उठा था बिट्रिश शासन। इनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को 'स्वराज' का नारा दिया था। तिलक का जन्म तो महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में हुआ था। लेकिन, उन्होंने देश की आजादी में अहम रोल निभाया। तिलक एक महान विचारक, शिक्षक, समाज सुधारक और राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्हें 'लोकमान्य' तिलक के नाम से भी जाना जाता है।

भारत की आजादी के संघर्ष में जनक्रांति, विद्रोह और आंदोलन के साथ-साथ पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अपने 'अस्त्रों' के बल पर तिलक ने अंग्रेजों की नींद उडा दी थी। जिसके कारण, उन्हें 6 साल जेल में कैद रहना पडा। वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए तिलक के योगदान से रूबरू करा रहा है...

Bal Gangadhar Tilak

कैसा था तिलक का बचपन?
बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। तिलक का परिवार एक शिक्षित और धार्मिक परिवार था। उनके पिता, गंगाधर रामचंद्र तिलक, एक स्कूल शिक्षक और संस्कृत के विद्वान थे। बचपन से ही तिलक ने शिक्षा के महत्व को समझा और विद्या के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त की। वे उस दौर की पहली पीढ़ी थे, जिन्होंने कॉलेज में जाकर आधुनिक शिक्षा की पढ़ाई की।

हमेशा पिता की सीख पर चले
तिलक की प्रारंभिक शिक्षा पुणे में हुई। उन्होंने दक्कन कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और बाद में लॉ की डिग्री भी हासिल की। बाल गंगाधर तिलक के बचपन में ही उनकी मां पार्वती बाई तिलक का देहांत हो गया, जिससे उनका जीवन संघर्षमय हो गया। उनके पिता ने उन्हें अनुशासन और शिक्षा के महत्व को सिखाया, जिससे तिलक का व्यक्तित्व मजबूत और दृढ़ निश्चयी बना।

Bal Gangadhar Tilak

1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े
बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय राजनीति में कदम 1879 में रखा, जब उन्होंने दक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की। इसका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सुधार करना था। साल 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने कांग्रेस के भीतर गरम दल (उग्रवादी धारा) का नेतृत्व किया। उन्होंने नरम दल (मध्यमार्गी धारा) की नीतियों की आलोचना की और स्वराज (स्व-शासन) की मांग को जोर-शोर से उठाया। तिलक का मानना था कि भारतीय जनता को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
बाल गंगाधर तिलक का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण था। उन्होंने स्वराज्य, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। आइए जानें उनके प्रमुख योगदान....

  • स्वतंत्रता संग्राम को दी दिशा: बाल गंगाधर तिलक का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण था। उन्होंने स्वराज्य, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। उन्होंने अपने नारे "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" से स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी।
  • स्वदेशी आंदोलन: तिलक ने स्वदेशी वस्त्रों और उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित किया और ब्रिटिश वस्त्रों और उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान किया।
  • लोकमान्य तिलक: तिलक ने गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती जैसे सार्वजनिक त्योहारों का आयोजन किया, जिससे राष्ट्रीय एकता और जागरूकता बढ़ी।
  • असहयोग आंदोलन: तिलक ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और जनता को इसके लिए प्रेरित किया।
  • संपादक और लेखक: तिलक ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के विचारों को फैलाया और जनता को जागरूक किया। उन्होंने 'गीता रहस्य' नामक पुस्तक भी लिखी, जिसमें उन्होंने भगवद गीता के कर्मयोग के सिद्धांतों का वर्णन किया।

'मराठा' और 'केसरी' बने हथियार
तिलक के नारों ने असर दिखाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे तिलक की सोच लगभग पूरे भारत की सोच बन गई। उन्होंने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को उजागर करने के लिए 1881 में, तिलक ने अपने दो अखबार, 'केसरी' (मराठी) और 'मराठा' (अंग्रेजी) शुरू किए।

6 साल की जेल की सजा
1908 में, बाल गंगाधर तिलक को क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के कार्यों का बचाव करने के लिए राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया और मंडाले (अब म्यांमार) की जेल में 6 साल की सजा सुनाई गई। जेल में रहते हुए उन्होंने 'गीता रहस्य' लिखी। 1914 में जेल से रिहा होने के बाद, तिलक ने फिर से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुई। उनकी मृत्यु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक बड़ी क्षति थी।

परिवार में कौन-कौन?

  • पिता: गंगाधर रामचंद्र तिलक (स्कूल शिक्षक)
  • मां: पार्वती बाई तिलक
  • पत्नी: तापीबाई (सत्यभामा तिलक)
  • बच्चे: उनके तीन बच्चे थे - श्रीधर, राव और यमुना।

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